उद्घाटन की राजनीति और खाली कोचों का सच : इंदौर मेट्रो अब इवेंट्स की बैसाखियों पर
इंदौर मेट्रो को शहर के भविष्य की लाइफलाइन बताया गया था, लेकिन एक साल बाद यह परियोजना अपनी राइडरशिप से ज्यादा “पार्टी बुकिंग” को लेकर चर्चा में है। सवाल सिर्फ खाली कोचों का नहीं, बल्कि उस जल्दबाजी का है जिसमें सीमित उपयोग वाले कॉरिडोर का उद्घाटन तो कर दिया गया, लेकिन वास्तविक यात्रियों वाले हिस्से अब तक इंतजार में हैं। “सेलिब्रेशन on Wheels” मॉडल ने अब इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या परियोजना की प्राथमिकता जनता की जरूरत थी या राजनीतिक उद्घाटन।
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31 मई 2025 को प्रधानमंत्री Narendra Modi ने स्वयं इंदौर मेट्रो के पहले फेज का उद्घाटन किया। देशभर में इसे मध्यप्रदेश के शहरी विकास की बड़ी उपलब्धि बताया गया। 7,500 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली इस परियोजना से उम्मीद थी कि यह देश के सबसे स्वच्छ शहर को आधुनिक सार्वजनिक परिवहन की नई पहचान देगी।
लेकिन एक साल बाद तस्वीर वैसी नहीं दिखती, जैसी उद्घाटन मंचों से दिखाई गई थी।
आज स्थिति यह है कि इंदौर मेट्रो अपनी रफ्तार से ज्यादा अपनी “पार्टी बुकिंग” को लेकर चर्चा में है। जिस परियोजना को शहर की ट्रैफिक समस्या का समाधान बताया गया था, वही अब “सेलिब्रेशन ऑन व्हील्स” के नाम पर बर्थडे पार्टी, प्री-वेडिंग शूट, किटी पार्टी और फिल्म शूट के लिए कोच किराए पर देने को मजबूर दिखाई दे रही है।
‘नॉन-फेयर रेवेन्यू’ या मजबूरी का मॉडल?
मेट्रो प्रशासन इसे “नॉन-फेयर रेवेन्यू” कह रहा है। तकनीकी रूप से यह गलत भी नहीं है। दुनिया भर की मेट्रो सेवाएं टिकट के अलावा विज्ञापन, ब्रांडिंग, कमर्शियल स्पेस और इवेंट्स से भी कमाई करती हैं। भारत के कुछ दूसरे शहरों में भी ऐसे प्रयोग हुए हैं।
लेकिन इंदौर में यह मॉडल जिस परिस्थिति में सामने आया है, वही सबसे बड़ा सवाल पैदा करता है।
क्योंकि यहां मामला केवल अतिरिक्त कमाई का नहीं, बल्कि बेहद कम राइडरशिप का है।
रिपोर्ट्स के अनुसार प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटित 6 किलोमीटर के प्राथमिकता कॉरिडोर पर रोजाना यात्रियों की संख्या बेहद कम बनी हुई है, जबकि संचालन पर करीब 8 लाख रुपये प्रतिदिन खर्च हो रहे हैं। यही कारण है कि अब खाली कोचों और स्टेशनों को इवेंट स्पेस में बदलकर कमाई का रास्ता खोजा जा रहा है।
असली सवाल : मेट्रो चली, लेकिन यात्रियों के बिना क्यों?
सवाल यह नहीं कि मेट्रो में प्री-वेडिंग शूट क्यों हो रहे हैं।
सवाल यह है कि जिस मेट्रो को रोजमर्रा की सार्वजनिक जरूरत बनना था, वह अभी तक लोगों की नियमित यात्रा का हिस्सा क्यों नहीं बन सकी?
इसका जवाब शायद उस पहले कॉरिडोर में छिपा है, जिसे सबसे पहले चालू किया गया।
इंदौर मेट्रो का प्रारंभिक सेक्शन सुपर कॉरिडोर क्षेत्र में शुरू किया गया — ऐसा इलाका जिसे भविष्य के विकास का केंद्र माना जाता है, लेकिन जहां वर्तमान में घनी आबादी, बड़े शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल और दैनिक यात्री दबाव सीमित है।
स्वाभाविक रूप से शुरुआती उत्साह में लोग “मेट्रो देखने” पहुंचे, लेकिन कोई भी सार्वजनिक परिवहन केवल जिज्ञासा पर लंबे समय तक नहीं चल सकता।
जहां सवारियां थीं, वहां मेट्रो अभी तक नहीं पहुंची
इसके विपरीत शहर के वे हिस्से, जहां वास्तविक दैनिक राइडरशिप मौजूद है — जैसे रेडिसन स्क्वायर, विजय नगर, अरविंदो अस्पताल और कॉलेज बेल्ट — अभी तक पूर्ण रूप से मेट्रो नेटवर्क से नहीं जुड़े हैं।
यही कारण है कि जनता के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि परियोजना वहां शुरू की गई जहां उद्घाटन संभव था, न कि वहां जहां सबसे ज्यादा यात्री उपलब्ध थे।
यही वह बिंदु है जहां “उद्घाटन readiness” और “ridership readiness” के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है।
रेडिसन कॉरिडोर तैयार, फिर भी इंतजार क्यों?
विडंबना यह है कि गांधी नगर से रेडिसन स्क्वायर तक के अगले सेक्शन को मार्च 2026 में ही कमिश्नर ऑफ मेट्रो रेल सेफ्टी (CMRS) से सुरक्षा मंजूरी मिल चुकी थी।
इसके बावजूद कमर्शियल संचालन अब तक शुरू नहीं हो सका। लगातार अलग-अलग संभावित तारीखें सामने आती रहीं, लेकिन स्पष्टता नहीं आई।
इससे जनता के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर देरी की वजह तकनीकी है, प्रशासनिक है या फिर राजनीतिक प्राथमिकताएं?
क्या किसी बड़े उद्घाटन, प्रोटोकॉल या राजनीतिक समय का इंतजार किया जा रहा है?
और यदि पूरा नहीं तो पर्याप्त रूप से तैयार कॉरिडोर भी महीनों तक चालू नहीं हो पा रहा, तो फिर मई 2025 में इतनी जल्दी उद्घाटन की आवश्यकता क्या थी?
क्या योजना से ज्यादा प्राथमिकता उद्घाटन को दी गई?
यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि इंदौर जैसे तेजी से बढ़ते शहर को भविष्य में मजबूत मेट्रो नेटवर्क की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।
सवाल मेट्रो की जरूरत पर नहीं है। सवाल उसकी योजना, प्राथमिकताओं और संचालन के तरीके पर है।
यदि शहर के सबसे व्यस्त हिस्से बाद में जोड़े जाएं और कम उपयोग वाले हिस्से पहले चालू कर दिए जाएं, तो वित्तीय व्यवहार्यता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। खासकर तब, जब परियोजना की लागत भी लगातार बढ़ती दिखाई दे रही हो।
रिपोर्ट्स के अनुसार परियोजना की अनुमानित लागत अब करीब 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की चर्चा में है। यानी शुरुआती अनुमान की तुलना में भारी वृद्धि।
कानूनी सवालों ने भी बढ़ाई चिंता
इसी बीच हाई कोर्ट में मेट्रो परियोजना से जुड़ी अनुमतियों और NOC को लेकर उठे सवालों ने चिंता और बढ़ा दी है।
यदि इतने बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट में आवश्यक प्रक्रियाओं को लेकर अस्पष्टता हो, तो जनता का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।
खाली कोचों से बड़ा संकट
दरअसल, इंदौर मेट्रो का संकट सिर्फ खाली कोचों का संकट नहीं है। यह उस सोच का संकट भी है जिसमें कई बार परियोजनाओं की वास्तविक उपयोगिता से पहले उनका उद्घाटन अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
आज स्थिति यह है कि जिस मेट्रो को शहर की जीवनरेखा बनना था, वह फिलहाल अपनी उपयोगिता साबित करने की कोशिश कर रही है।
और जब किसी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को यात्रियों से पहले इवेंट्स की जरूरत पड़ने लगे, तब सवाल केवल कमाई का नहीं, योजना और प्राथमिकताओं का भी होता है।
अंतिम सवाल
सवाल यह नहीं कि इंदौर को मेट्रो चाहिए या नहीं।
सवाल यह है कि क्या इंदौर को ऐसी मेट्रो चाहिए थी, जो यात्रियों से पहले उद्घाटन और फिर इवेंट्स खोजती दिखाई दे।