कमिश्नर का नाम, कानून की धज्जियां: सहायक राजस्व अधिकारी मयंक जैन की ‘बेतुकी दलीलों’ से सील हुई दुकानें ,इंदौर नगर निगम एक बार फिर सवालों के घेरे मे ।
पिछले वर्ष रिकॉर्ड राजस्व वसूली के बाद अब निगम के कुछ अधिकारी नियम-कानून को ताक पर रखकर कार्रवाई करते नजर आ रहे हैं। ताजा मामला रंगपंचमी से एक दिन पहले का है, जब जोन क्रमांक-10 के सहायक राजस्व अधिकारी मयंक जैन अपने दल-बल के साथ उन जमीनों पर पहुंच गए, जिनका स्वामित्व विवाद पिछले 34 वर्षों से न्यायालय में लंबित है और मामला उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है।
द एक्सपोज़ लाइव न्यूज़ नेटवर्क इंदौर
नीरज द्विवेदी 99939 49000
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि बिना किसी लिखित नोटिस या सक्षम आदेश के मयंक जैन ने मौके पर पहुंचते ही दुकानों को सील करना शुरू कर दिया।
“कमिश्नर और महापौर के मौखिक आदेश हैं” — मयंक जैन
मौके पर मौजूद भू-स्वामियों ने जब उनसे कार्रवाई का आधार पूछा और नोटिस या आदेश की प्रतिलिपि मांगी, तो मयंक जैन सीधे दावा करते रहे कि
“कमिश्नर और महापौर के मौखिक आदेश के तहत यह कार्रवाई की जा रही है।”
यह बयान अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है—
क्या मौखिक आदेश के आधार पर निजी संपत्ति सील की जा सकती है?
क्या किसी अधिकारी को कमिश्नर और महापौर का नाम लेकर कार्रवाई करने का अधिकार है?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मौखिक आदेश का हवाला देकर संपत्ति पर ताला लगाना न केवल अवैधानिक है बल्कि पद के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है।
“विवाद स्वामित्व का है, राजस्व का नहीं” — मयंक जैन की दूसरी दलील
जब भू-स्वामियों ने उन्हें न्यायालय के आदेशों की प्रतियां दिखाईं और पूछा कि स्वामित्व विवाद न्यायालय में लंबित होने के बावजूद राजस्व वसूली कैसे की जा सकती है, तब सहायक राजस्व अधिकारी मयंक जैन ने एक और तर्क दिया। उन्होंने कहा —
“स्वामित्व संबंधी विवाद भले न्यायालय में चल रहा हो, स्वामित्य घोषणा का अधिकार है मेरे पास" जबकि कानूनी जानकारों के अनुसार यह दलील कानून की गलत व्याख्या है।
क्या कहते हैं कानून के प्रावधान
मध्यप्रदेश म्युनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट 1956 की धारा 141 और 142 स्पष्ट कहती है कि जिस भूमि का स्वामित्व विवाद न्यायालय में लंबित हो, उस पर करारोपण नहीं किया जा सकता। साथ ही नगर निगम को किसी भी निजी संपत्ति पर सीधे बिना सक्षम आदेश और अदालत में जिस संपत्ति के संबंध में स्थगन आदेश हो उसमें बिना न्यायालय की अनुमति के ताला लगाने का अधिकार नहीं है।
हिंदुस्तान पेट्रोलियम बनाम मध्यप्रदेश शासन के प्रकरण में भी न्यायालय ने ऐसे मामलों में सावधानी बरतने की बात कही है। इसके बावजूद मयंक जैन मौके पर “बेतुकी दलीलें” देते हुए कानून की धज्जियां उड़ाते नजर आए।
1992 से चल रहा है विवाद
जिन जमीनों पर यह कार्रवाई की गई, उन्हें वर्ष 1991 में इंदौर विकास प्राधिकरण ने योजना क्रमांक-94 के तहत अधिग्रहित किया था। तभी से स्वामित्व का विवाद न्यायालय में लंबित है और किसान आज भी जमीन पर काबिज़ हैं।
ऐसे मामले में जहां तीन दशक से अदालत फैसला नहीं दे पाई, वहां एक सहायक राजस्व अधिकारी का अचानक पहुंचकर दुकानों पर ताले जड़ देना और वह भी तब जब उसको यह पता को की इस ज़मीन पर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का स्थगन आदेश प्रभावशील हो,कई सवाल खड़े करता है।
कमिश्नर के नाम का इस्तेमाल?
पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह रही कि मयंक जैन बार-बार कमिश्नर और महापौर के नाम का हवाला देते रहे। प्रश्न यह उठता है कि
क्या सचमुच ऐसा कोई आदेश था?
या फिर एक अधिकारी ने अपने अधिकार से आगे बढ़कर वरिष्ठ अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल किया?
यदि दूसरा पक्ष सच है, तो यह न केवल कानूनी अपराध है बल्कि प्रशासनिक अनुशासन का गंभीर उल्लंघन भी माना जाएगा।
किसानों का दर्द
जब हमारी टीम मौके पर पहुंची तो किसानों ने बताया कि “1991 से यह जमीन हमारी खेती की जमीन रही है। हम वर्षों से इसी पर खेती करके परिवार चला रहे हैं। मामला अदालत में है हमारी आधी से अधिक ज़मीन पर रोड बन गई है और बची ज़मीन पर हम हमारे परिवार का गुज़र बसर कर रहे हैं। किसानों के पारिवारिक सदस्य सुनील पाटीदार का कहना है कि मुआवजा आज तक नहीं मिला, साथ ही पाटीदार द्वारा बताया गया कि नगर निगम द्वारा उसे दिए सूचना पत्र का जवाब दिनांक 14.11.25 को ही दे दिया था जिसमें अदालत में विचाराधीन प्रकरण के नंबर स्थगन आदेश की कॉपी भी दी गई थी। यदि श्री मयंक जैन की कार्यवाही विधान अनुसार सही थीं तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेनी थी , लेकिन उनका कथन है कि ऐसा प्रतीत हो रहा हे मयंक जैन व्यक्तिगत रूप से सभी कोर्ट, क़ानून , और नियमों से ऊपर है जबकि जमीन का अधिग्रहण तीन दशक पहले किया गया था। और वह भी केंद्र के अधिनियम के अंतर्गत ,पर मयंक जैन के अनुसार केंद का अधिनियम और संविधान छोटा है और मयंक जैन द्वारा नगर निगम अधिनियम की गलत व्याख्या सबसे बड़ी है।
किसान का यह कथन इसीलिए भी सच लगता है कि बिना खाता खोले ,बिना टैक्स की राशि बताए , बिना टैक्स राशि भरने के सूचना पत्र के भी सभी दुकानें बलपूर्वक सील कर दी यह तो, इससे ऐसा लग रहा है कि लोकतंत्र ख़त्म होगया है और ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ जैसी स्थिति निर्मित होने लगी हैं।
पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या इंदौर नगर निगम में अब कानून से ज्यादा ताकत पद और दबाव की हो गई है?
क्या अब धीरे धीरे पार्षद और महापौर के चुनाव बंद हो जाएंगे क्योंकि अधिकारी सुनते ही नहीं ,
जब अदालतों में मामला लंबित हो, कानून स्पष्ट हो, फिर भी एक अधिकारी “मौखिक आदेश” और “बेतुकी दलीलों” के सहारे दुकानों पर ताले लगा दे, तो यह केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं बल्कि कानूनी व्यवस्था को चुनौती माना जाएगा।
अब देखना यह है कि नगर निगम प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी कमिश्नर के नाम पर की गई कार्रवाई के साथ फाइलों में दबा दिया जाएगा।