संवाद से संकल्प तक: भारतीय किसान संघ की शांत रणनीति ने कैसे ‘कुंभ सिटी प्रोजेक्ट’ को कराया पूरी तरह निरस्त

मध्यप्रदेश में प्रस्तावित कुंभ सिटी प्रोजेक्ट का पूरी तरह निरस्त होना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद, तथ्यात्मक तर्क और भारतीय किसान संघ (BKS) की दूरदर्शी रणनीति की जीत है। यह वह उदाहरण है, जहाँ न चक्का जाम हुआ, न सड़कों पर उग्र आंदोलन, न आम नागरिक का जीवन प्रभावित हुआ—फिर भी सरकार को अपने निर्णय पर पुनर्विचार कर अंततः परियोजना वापस लेनी पड़ी।

संवाद से संकल्प तक: भारतीय किसान संघ की शांत रणनीति ने कैसे ‘कुंभ सिटी प्रोजेक्ट’ को कराया पूरी तरह निरस्त

द एक्सपोज़ लाइव न्यूज़ उज्जैन/भोपाल।

नीरज द्विवेदी (9993949000)

भारतीय किसान संघ लंबे समय से उज्जैन में प्रस्तावित कुंभ सिटी प्रोजेक्ट के खिलाफ खड़ा था। संघ की स्पष्ट मांग थी कि इस परियोजना के लिए लाई गई लैंड पूलिंग योजना को पूरी तरह निरस्त किया जाए, क्योंकि इससे कृषि भूमि, किसानों की आजीविका और क्षेत्र की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना पर गहरा आघात पड़ता।

17 नवंबर की निर्णायक बैठक और 19 नवंबर का विवादित आदेश

17 नवंबर को मुख्यमंत्री के साथ हुई बैठक में भारतीय किसान संघ ने ठोस तथ्यों, कानूनी पहलुओं और जनहित के तर्कों के साथ अपना पक्ष रखा। बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय हुआ कि कुंभ सिटी प्रोजेक्ट के लिए लैंड पूलिंग योजना को पूर्णतः निरस्त किया जाएगा। लेकिन 19 नवंबर को जारी आदेश में “निरस्तीकरण” के स्थान पर शब्दों की हेराफेरी करते हुए “उपन्तरित/संशोधित” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया। यही वह बिंदु था, जहाँ किसान संघ ने तुरंत आपत्ति दर्ज कराई और स्पष्ट किया कि यह निर्णय की आत्मा के विपरीत है।

न उग्रता, न अव्यवस्था—केवल संवाद और तथ्य

यहीं से भारतीय किसान संघ की विशेष रणनीति सामने आई। संघ ने न तो सड़कों पर उतरकर ट्रैफिक जाम किया, न ही उग्र प्रदर्शन चुना। इसके बजाय ,उचित मंच पर तथ्य रखे गए ,प्रशासनिक भाषा की अस्पष्टता को उजागर किया गया ,लालफीताशाही द्वारा जनप्रतिनिधियों को भ्रमित करने की प्रक्रिया की पोल खोली गई संभावित परिणामों से सरकार को अवगत कराया गया जानकारों के अनुसार, व्यापक विरोध की रणनीतियाँ भले तैयार हो रही थीं, लेकिन संघ ने परिणामों को ध्यान में रखते हुए संवाद का मार्ग नहीं छोड़ा। अंततः मोहन सरकार को अपने आदेश पर पुनर्विचार करना पड़ा और कुंभ सिटी प्रोजेक्ट को पूरी तरह निरस्त करने का निर्णय लिया गया।

भारतीय मिथकीय दृष्टि: धरा, धर्म और राष्ट्र

भारतीय किसान संघ ने अपने तर्क केवल प्रशासनिक या आर्थिक नहीं रखे, बल्कि भारतीय सभ्यता के मूल दर्शन को भी सामने रखा। संघ के एक पदाधिकारी के शब्दों में—“मां भगवती, जिसे हिंदू धर्म में भारत माता कहा जाता है, उसका चीरहरण कर विकास की कल्पना अधूरी है। धरा को बचाकर ही धर्म की रक्षा संभव है।” भारतीय मिथकों में पृथ्वी को माता का स्थान दिया गया है। वेदों में पृथ्वी को “धारिणी” कहा गया—जो सबका धारण-पोषण करती है। महाभारत में भी स्पष्ट है कि जब राजा या राज्य धरती का अति-दोहन करता है, तो वह अधर्म की श्रेणी में आता है। संघ का तर्क था—“धरा को खत्म कर धर्म कभी धारण नहीं किया जा सकता, और कृषि को नष्ट कर विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती।”

कृषि बनाम ‘सीमेंट के जंगल’

आज विकास की परिभाषा में सीमेंट के जंगल शामिल हो गए हैं, लेकिन भोजन नहीं। भारतीय किसान संघ ने यह मूल प्रश्न उठाया कि—अगर कृषि समाप्त होगी तो अन्न कहाँ से आएगा?क्या विकास केवल इमारतों से मापा जाएगा, या पेट भरने की क्षमता से?

इतिहास गवाह है कि जब भारत कृषि आधारित था, तभी वह “सोने की चिड़िया” कहलाता था। कृषि ईश्वर प्रदत्त व्यवस्था है—नागरिकों के अस्तित्व का आधार। कृषि को समाप्त कर किया गया कोई भी विकास अंततः नागार्य (अस्थायी और विनाशकारी) ही होगा।

लोकतंत्र की जीत

कुंभ सिटी प्रोजेक्ट का निरस्त होना यह साबित करता है कि—शांत संवाद भी सत्ता को झुका सकता है तथ्य और तर्क, उग्रता से अधिक प्रभावी होते हैं आम नागरिक का जीवन बाधित किए बिना भी बड़े फैसले बदले जा सकते हैं भारतीय किसान संघ की यह लड़ाई केवल जमीन बचाने की नहीं थी, बल्कि धरा, धर्म और लोकतंत्र—तीनों की रक्षा की लड़ाई थी। यह प्रकरण भविष्य के आंदोलनों के लिए एक मिसाल बन गया है कि संवाद, संयम और सत्य से भी सरकारों को निर्णय बदलने पर मजबूर किया जा सकता है।

भाजपा किसान मोर्चा एक बार फिर विफल 

सत्तारूढ़ भाजपा का किसान मोर्चा एक बार फिर विफल होता दिखा क्यूंकि सत्ता के करीब भाजपा किसान मोर्चा को ही माना जाता हे और भाजपा का ही एक अंग हे। जिसे किसान हित में काम करने और उनके मुद्दे सरकार तक पहुँचाने की अहम् ज़िम्मेदारी दी गयी हे। आज हर क्षेत्र में किसान अलग अलग मुद्दों से सरकार के खिलाफ होता दीख रहा हे लेकिन भाजपा किसान मोर्चे के पदाधिकारी सिर्फ स्वागत ,भाषण और सत्ता की चटुकारती करते दीख रहे हैं लेकिन किसानों के मुद्दों से उनका कोई सरोकार नहीं दिखता। अगर यही स्थिति आगे भी बनी रही तो वो दिन दूर नहीं जब एक बड़े विरोध का सामना सरकार को करना पड़ सकता हे।