मध्यप्रदेश के IAS अधिकारी के विवादित बयान — जाति, वर्ण और आरक्षण पर उठे गंभीर सवाल, देश को बांटने की सोची समझी रणनीति तो नहीं ?

मध्यप्रदेश के वरिष्ठ IAS अधिकारी संतोष कुमार वर्मा के बयान— “जब तक ब्राह्मण अपनी बेटी दान न करें, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए”— ने प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है।

मध्यप्रदेश के IAS अधिकारी के विवादित बयान  — जाति, वर्ण और आरक्षण पर उठे गंभीर सवाल, देश को बांटने की सोची समझी रणनीति तो नहीं ?

द एक्सपोस लाइव न्यूज़ नेटवर्क इंदौर ( नीरज द्विवेदी 9993949000 )

ब्राह्मण समाज सहित कई सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवी वर्ग ने इसे विभाजनकारी, सामाजिक विद्वेष फैलाने वाला और अत्यंत गैर-ज़िम्मेदाराना बयान बताया है। बेशक सरकार  ने जवाब तलब कर लिया  लेकिन गहन जांच से अभी भी दुरी बनाई रखी हे। क्यूंकि कहीं न कहीं देश को जातीवाद की आग में झोकने की साजिश का भी पता लगाया जाना चाहिए ,संवैधानिक पद पर बैठा कोई व्यक्ति आखिर कैसे शासन की नाक के नीचे ऐसा बयान दे सकता हे ? आखिर किसकी शह पर हो रहा हे ये खेल ,क्यों बिना किसी सन्दर्भ के ऐसी बदजुबानी की गयी ? क्या हे इसके पीछे की मंशा ? कहीं ये देशद्रोह की तरफ सोचा समझा पहला कदम तो नहीं या सेवानिवृति के बाद जातिवाद के नाम पर अपने लोगों को भड़का कर अपनी  राजनैतिक जगह बनाने की नाकाम कोशिश ?  

बयान पर मचा बवाल — समाज में रोष और प्रशासन पर सवाल

इंदौर और भोपाल सहित प्रदेशभर के संगठनों ने कहा कि एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी का यह कथन न केवल सामाजिक ताने-बाने को चोट पहुँचाता है, बल्कि यह संकेत देता है कि नौकरशाही में बैठे कुछ लोग अपनी निजी मतांधता को सरकारी मंचों तक ले जाने लगे हैं। कई संगठनों ने इस बयान को देश-विरोधी तत्वों की साजिश से प्रेरित बताते हुए जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि संतोष वर्मा जैसे अधिकारी जानबूझकर सामाजिक तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ: भारत में वर्ण व्यवस्था ‘कर्म’ आधारित थी – ‘जाति’ बाद में बनी राजनीतिक (और अब प्रशासनिक)  हथियार

भारत की प्राचीन व्यवस्था में वर्ण का निर्धारण जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और योग्यता से होता था। यह दृष्टांत स्वयं भगवान परशुराम जी और श्रवण कुमार के संवाद में मिलता है—“हर मनुष्य जन्म से शूद्र है, और कर्म से ही उसका वर्ण निर्धारित होता है।”

गुरुकुल प्रणाली में—

कर्म, गुण, तप, शिक्षा और सेवाभाव के आधार पर वर्ण तय होता था। लेकिन लगातार विदेशी आक्रमणों और सामाजिक अव्यवस्था के कारण यह कर्म-आधारित प्रणाली धीरे–धीरे जन्म-आधारित जाति संरचना में बदल गई। स्वाधीन भारत में लोकतांत्रिक शासन लागू होते ही जाति आधारित राजनीति ने इस विकृत व्यवस्था को और मजबूत किया।

आज स्थितियाँ यह हैं कि:

राजनीतिक ( और अब प्रशासनिक अधिकारी ) दल जातिगत आधार पर मोर्चे बनाते हैं ,समाज को चुनावी समीकरणों में बाँटते हैं ,आरक्षण को सुधार की बजाय स्थायी राजनीतिक/प्रशासनिक  औजार बना दिया गया है। इसी विडंबना पर कई जानकार कहते हैं कि “जाति का ज़हर जनता में नेताओं ने भरा, लाभ नौकरशाह उठा रहे हैं।”

डॉ. भीमराव अंबेडकर: मेहनत, प्रतिभा और क्षमता के परिचायक

डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन संघर्ष, मेहनत और उत्कृष्टता का प्रतीक था। उनकी सभी उपलब्धियाँ आरक्षण से नहीं, बल्कि उनकी तपस्या और बुद्धिमत्ता से प्राप्त हुईं। संविधान में उन्होंने आरक्षण लागू ज़रूर किया, पर उसका मूल उद्देश्य था—पिछड़े वर्ग को अस्थायी रूप से सहारा देना, उन्हें मुख्यधारा की प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना और सामाजिक असमानता कम करना। वे कभी नहीं चाहते थे कि आरक्षण को स्थायी राजनीतिक हथियार बनाया जाए या इससे किसी वर्ग की क्षमता का ह्रास हो। आज राजनीतिक दल उनके मार्गदर्शन को भूलकर सिर्फ वोट बैंक के लिए आरक्षण को ज्यों का त्यों बनाए रखने की होड़ में लगे हैं। अब नौकरशाह भी इस अंधी दौड़ का हिस्सा बाँट जा रहे हैं जो देश की एकता अखंडता पर बड़ा खतरा हे। 

“कर्मविहीन महत्वाकांक्षा” — क्या इसलिए बढ़ रहे ऐसे बयान?

विश्लेषकों का कहना है कि कुछ अधिकारी और शिक्षाविद, जो अंबेडकर को स्वार्थवश अपना आदर्श बताते हैं, उन्हीं की मेहनत के बल पर आगे बढ़ने के बजाय सिर्फ संवैधानिक सुविधाओं पर निर्भर हो गए हैं। ऐसा ही आरोप संतोष कुमार वर्मा पर भी लगाया जा रहा है कि—“मेहनत के बजाय सामाजिक विभाजन खड़ा कर अपना अस्तित्व साबित करने की कोशिश की जा रही है।”

क्या यह बयान देश-विरोधी ताकतों की साजिश का हिस्सा? राजनीतिक सामाजिक  विश्लेषकों का कहना है कि यह सवाल गंभीर है।

क्योंकि— मध्यप्रदेश की 29 लोकसभा सीटें जाति नहीं, बल्कि राम व राष्ट्र के मुद्दे पर BJP के पक्ष में गईं। उस चुनावी माहौल में जातिगत तनाव पैदा करने की कोशिशें कई जगह विफल रहीं। अब अचानक एक वरिष्ठ IAS अधिकारी द्वारा इस तरह का बयान देना कई संगठनों को संदेहास्पद लग रहा है। कई सामाजिक संस्थाओं और नागरिक संगठनों ने आशंका जताई है कि: “यह कथन कहीं प्रदेश में जातिगत दंगे करवाने की बड़ी साजिश तो नहीं?” इसलिए वे इस बयान की उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं।

आज का लोकतंत्र: राजा जनता के अंगूठे से पैदा होता है और नौकरशाह उसके आदेश का पालन करता हे 

लेखकों ने वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर व्यंग्य करते हुए कहा—“पहले राजा माँ भगवती के गर्भ से जन्म लेता था, अब पाँच वर्ष के लिए आम जनता के अंगूठे से निर्जीव पात्र में पैदा होता है।”और यही जन–निर्मित राजा जातिगत तनाव फैलाता है समाज को विभाजित करता है और अवसरवादियों को ताकत देता है क्योंकि विभाजित समाज में ही सत्ता लालचियों का हित निहित होता है। यही कारण हे की अब नौकरशाह ऐसे राजनैतिक महत्वकांशा वाले राजाओं के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं। 

संतोष वर्मा का बयान सिर्फ विवाद नहीं  समाज को तोड़ने की खतरनाक शुरुआत मामला अब केवल एक बयान का नहीं रहा। इसने संविधान,समाज,जातीय सद्भाव और प्रशासनिक मर्यादा ,सब पर सवाल खड़े कर दिए हैं।अब ज़रूरत है कि  इस बयान की निष्पक्ष जांच हो :

राजनीतिक/प्रशासनिक  वर्ग जातिगत जहर फैलाने से बचे

प्रशासनिक अधिकारियों पर आचार संहिता और कठोर निगरानी हो और सबसे महत्वपूर्ण समाज कर्म आधारित मूल भारतीय मूल्य को पुनः स्थापित करे।

ऐसे अधिकारीयों पर कड़ी निगरानी रख पता लगाया जाए की कहीं देशविरोधी गतिविधियों में इनकी संलिप्तता तो नहीं ?