पुलिसवालों की तर्ज पर इंदौर नगर निगम के कर्मचारी भी जेब पर लगाएंगे नेम बैज

इंदौर नगर निगम अपने 5 हजार कर्मचारियों को पुलिस की तर्ज पर नेम-बैज देने की तैयारी कर रहा है। इस पर करीब 10 लाख रुपये खर्च होंगे। दावा है कि इससे पहचान स्पष्ट होगी, फर्जी कर्मचारी लोगों को ठग नहीं पाएंगे और कामकाज में पारदर्शिता आएगी। हालांकि लोगों का सवाल है—अगर कर्मचारी बैज पहनें ही नहीं, तो यह पूरा खर्च फिजूल साबित हो सकता है।

पुलिसवालों की तर्ज पर इंदौर नगर निगम के कर्मचारी भी जेब पर लगाएंगे नेम बैज
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नगर निगम मुख्यालय के 5 हजार कर्मचारियों को नेम-बैज देने की तैयारी, 10 लाख रुपये होंगे खर्च

दावा इससे बढ़ेगी पारदर्शिता, निगम में विभिन्न विभागों में आने वाले लोगों को नहीं ठग पाएंगे फर्जी कर्मचारी

द एक्सपोज लाइव न्यूज नेटवर्क, इंदौर

इंदौर नगर निगम ने अपने लगभग 5 हजार कर्मचारियों के लिए नई पहचान-नेम प्लेट (नेम बैज) देने की योजना बनाई है। इस योजना पर लगभग 10 लाख रुपये खर्च होने की संभावना है। निगम के अनुसार, यह कदम कर्मचारियों की पहचान, जवाबदेही और नागरिक सेवा की गुणवत्ता में सुधार लाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

फिलहाल शहर में विभिन्न फील्ड वर्करों और विभागीय कर्मचारियों के नाम-बैज या पहचान चिन्ह पूरी तरह नियमित या सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं हैं। यानि, कर्मचारी बिना स्पष्ट नेम-बैज के सेवा दे रहे हैं, जिससे नागरिकों को “यह कौन है, किस विभाग से है” जैसी जानकारी नहीं मिल पाती। हालांकि सार्वजनिक सेवा कर्मचारियों के लिए नेम-बैज पहनना “पारदर्शिता एवं जवाबदेही” को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था मानी गई है। निगम का दावा है यह व्यवस्था लागू होने से यहां के कामों में भी पारदर्शिता आएगी और फर्जी कर्मचारी या एजेंट आम लोगों को ठग नहीं सकेंगे।

इस पहल से क्या लाभ मिलेंगे?

  • नागरिकों को यह पता चलेगा कि वे जिस कर्मचारी से मिल रहे हैं, वह किस विभाग का है और उसका नाम क्या है। इससे सेवा-प्रदाता और सेवा-ग्राही दोनों के बीच विश्वास बढ़ेगा।
  • फील्ड वर्क-मॉनीटरिंग आसान होगी: निगम अधिकारी यह देख पाएँगे कि कौन कर्मचारी किस जगह काम कर रहा है और वह जिम्मेदारी से काम कर रहा है या नहीं।
  • “काम सम्बंधित शिकायत” दर्ज करने में सुविधा होगी, क्योंकि नागरिक के पास कर्मचारी की पहचान होगी।
  • अंततः यह सेवा-प्रदायगी की गुणवत्ता में सुधार ला सकती है—जिन्हें अब तक पहचान-दुर्भाव से काम लगता था, उनमें सुधार हो सकता है।

खर्च या फिजूलखर्ची?

निगम ने कहा है कि यह खर्च “इच्छित सुधार” के तहत है। वहीं, नागरिक एवं सामाजिक समूह इसे ऐसे देख रहे हैं कि यदि यह नेम-बैज निकलने के बाद केवल अलमारी में रह जाएं या कर्मचारी उनका नियमित उपयोग न करें, तो यह खर्च “प्रतीकात्मक” बन सकता है। उदाहरण के लिए, यदि सिर्फ बैज बनकर वितरित हो जाएं, लेकिन फील्ड में कर्मचारी उन्हें पहनें नहीं, या पहचान-सूचना की उपेक्षा हो, तो “10 लाख रुपये” का खर्च सवालों के घेरे में आ जाएगा।

निगरानी और सफलताः कैसे होगी तय

निगम को इस बात पर ध्यान देना होगा कि:

  • बैज किस तरह वितरित हुए और कितने प्रतिशत कर्मचारियों ने उन्हें पहनना शुरू किया।
  • नागरिकों को यह सुविधा मिल रही है कि वे कर्मचारी को पहचान सकें—इस पर प्रतिक्रिया लेनी होगी।
  • शिकायतों और अनियमितताओं में कमी आई है या नहीं—यही मापदंड इस पहल की सफलता तय करेगा।

और अंत में…

यह योजना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शहर के नागरिकों को रोज़-मर्रा की सेवाओं में पहचान, पारदर्शिता और जवाबदेही चाहिए। यदि इंदौर नगर निगम इस पहल को सही तरीके से रोल आउट करती है, तो यह सुधार-प्रक्रिया के रूप में काम आ सकती है। लेकिन अगर यह सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाए, तो यह खर्च प्रतीकात्मक और अल्प-प्रभावी साबित हो सकता है।