खजराना का रहस्यमयी सर्वे नंबर 1121: लिपिकीय त्रुटि या भूमाफिया का नया खेल?
खजराना क्षेत्र का चर्चित सरकारी सर्वे नंबर 1121 एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। करोड़ों रुपये कीमत की इस सरकारी जमीन को लेकर अब नया सवाल खड़ा हो गया है—क्या शासकीय रिकॉर्ड में दिख रहा बदलाव महज़ लिपिकीय त्रुटि है या फिर भूमाफियाओं की सुनियोजित चाल?
द एक्सपोज़ लाइव न्यूज़ नेटवर्क इंदौर
नीरज द्विवेदी ( 9993949000)
राजस्व अभिलेखों की पड़ताल करने पर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। मूल दस्तावेजों और पुराने शासकीय अभिलेखों में सर्वे नंबर 1121 पूर्ण रूप से शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है। लेकिन कुछ शासकीय डिजिटल एप और रिकॉर्ड में अब इस सर्वे नंबर में “बटांकन” दिखाई देने लगा है। यहीं से पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है। सवाल यह है कि जब मूल रिकॉर्ड में आज भी किसी प्रकार का बटांकन दर्ज नहीं है, तो फिर कुछ शासकीय प्लेटफॉर्म पर यह विभाजन कैसे दिखने लगा? क्या यह केवल तकनीकी या लिपिकीय गलती है, या फिर भूमाफिया द्वारा रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर भविष्य में जमीन पर दावा करने की तैयारी की जा रही है?
2014 में भी हुआ था बड़ा खुलासा
यह पहला मौका नहीं है जब सर्वे नंबर 1121 विवादों में आया हो। वर्ष 2014 में मीडिया की रिपोर्ट के बाद इस जमीन से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई हुई थी। उस समय प्रशासन ने स्पष्ट किया था कि यह जमीन शासकीय है और इस पर किसी भी प्रकार का निजी अधिकार मान्य नहीं है। लेकिन अब हालात फिर उसी दिशा में जाते दिखाई दे रहे हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, भूमाफिया ने यहां दुकानें और कमरे बनाकर किराए पर देना शुरू कर दिया है और हर महीने मोटी रकम वसूली जा रही है।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि हाल के दिनों में यहां मलबा डाला गया, जमीन समतल की गई और कॉलोनी काटने की तैयारी के संकेत भी मिले हैं।
भूमाफिया की दलील और प्रशासन की चुप्पी
जब इस पूरे मामले में जुड़े लोगों से संपर्क किया गया, तो उनका दावा था कि यह जमीन उनकी पुश्तैनी जमीन है और मामला न्यायालय में विचाराधीन है।हालांकि दस्तावेजी रिकॉर्ड इससे बिल्कुल अलग कहानी बताते हैं। लगातार प्रकाशित खबरों में इस सर्वे नंबर की वैधानिक स्थिति के प्रमाण भी सामने लाए जाते रहे हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
जब उनसे यह पूछा गया कि क्षेत्र में कॉलोनी काटने की तैयारी क्यों दिखाई दे रही है, तो उनका कहना था कि यह काम उनके द्वारा नहीं बल्कि नगर निगम द्वारा सड़क निर्माण के लिए किया जा रहा है। दूसरी ओर नगर निगम के अधिकारी इस दावे से लगातार अनभिज्ञता जाहिर करते रहे हैं।
बड़ा सवाल: रिकॉर्ड बदल रहा है या व्यवस्था?
पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में बदलाव दिखाई दे रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या किसी स्तर पर डिजिटल रिकॉर्ड में छेड़छाड़ हुई है? क्या राजस्व विभाग ने इस विसंगति की जांच की? और यदि जमीन शासकीय है, तो फिर उस पर बन रही दुकानों और संभावित कॉलोनी को क्यों नहीं रोका गया?
खजराना का यह सर्वे नंबर अब सिर्फ जमीन का मामला नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक पारदर्शिता, राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और भूमाफियाओं के बढ़ते हौसलों का भी सवाल बन चुका है। यदि समय रहते इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच नहीं हुई, तो करोड़ों की यह सरकारी जमीन धीरे-धीरे फिर एक नई अवैध कॉलोनी में तब्दील हो सकती है—और तब शायद प्रशासन के पास फिर वही पुराना जवाब होगा, “अब बहुत देर हो चुकी है।”
हम लगातार मामले की पड़ताल कर रहे हैं और आने वाले समय में भूमाफियों के नाम भी मय साक्ष्य उजागर करेंगे।