भीषण गर्मी में बच्चों की सेहत से खिलवाड़, डीपीआई का तुगलकी फरमान, थोप रहे ओजेटी
डीपीआई ने भीषण गर्मी के बीच 20 दिन की ओजेटी अनिवार्य कर प्रशिक्षकों की मानदेय बंधक बना ली है। कलेक्टर स्कूल बंद करवा रहे हैं, लेकिन विभाग बच्चों और शिक्षकों को धूप में झुलसने को मजबूर कर रहा है। प्रशिक्षकों ने आदेश वापसी को लेकर आंदोलन की चेतावनी दी है।
लू के चलते प्रशासन ने बंद किए स्कूल, शिक्षा विभाग ने कर दी बच्चों को धूप में झुलसने को तैयारी, मानदेय काटने की धमकी ने शिक्षकों की मुसीबत भी बढ़ाई
द एक्सपोज लाइव, भोपाल।
प्रदेश में मई की भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) ने एक तुगलकी फरमान जारी कर व्यावसायिक शिक्षा के छात्रों और प्रशिक्षकों की जान जोखिम में डाल दी है। जहां एक तरफ अधिकतर जिलों के कलेक्टर बच्चों को लू से बचाने के लिए स्कूलों में अवकाश घोषित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर डीपीआई ने 20 दिन की ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग (ओजेटी) अनिवार्य कर दी है।
विभाग ने साफ तौर पर कहा है कि अगर ओजेटी नहीं हुई तो प्रशिक्षकों का मई महीने का मानदेय नहीं दिया जाएगा, जो किसी बंधक से कम नहीं है।
क्या है पूरा मामला
लोक शिक्षण संचालनालय ने 7 अप्रैल 2026 को जारी पत्र क्रमांक 1811 के जरिए सत्र 2025-26 के लिए कक्षा 10वीं और 12वीं के व्यावसायिक शिक्षा के विद्यार्थियों के लिए न्यूनतम 20 दिवसीय ओजेटी 1 मई 2026 से 31 मई 2026 के बीच आयोजित कराने का आदेश दिया है। इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन विद्यालयों में ओजेटी कार्य संपन्न होगा, उन्हीं के व्यावसायिक प्रशिक्षकों को मई 2026 के मानदेय की प्रतिपूर्ति की जाएगी।
यानी, अगर गर्मी के चलते प्रशिक्षक या छात्र इस कार्य से पीछे हटते हैं, तो उनकी सामान्य जीवन रक्षा की थोड़ी सी भी कोशिश उनके पूरे महीने के वेतन पर भारी पड़ सकती है। प्रशिक्षकों ने इसे “आर्थिक ब्लैकमेलिंग” बताया है।
प्रशिक्षकों में भारी आक्रोश
विभाग का यह आदेश व्यावसायिक प्रशिक्षकों के लिए किसी तानाशाही से कम नहीं है। प्रशिक्षकों का कहना है कि जहां एक ओर राज्य के विभिन्न जिलों में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, वहीं विभाग ने मानदेय को बंधक बनाकर उन्हें चिलचिलाती धूप में काम करने को मजबूर किया है।
प्रशिक्षकों का आरोप है कि यह आदेश उनके और छात्रों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। एक प्रशिक्षक ने बताया कि इस मौसम में बाहर निकलना जानलेवा हो सकता है, लेकिन विभाग को कोई फिक्र नहीं है।
प्रशासन के आदेशों की अनदेखी
प्रदेश के अधिकतर जिलों में कलेक्टरों ने भीषण गर्मी और लू को देखते हुए स्कूलों में अवकाश घोषित कर दिए हैं, ताकि बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी खतरों से बचाया जा सके। लेकिन डीपीआई का यह आदेश कलेक्टरों के इन प्रयासों के पूरी तरह विपरीत है। शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि देखते ही देखते प्रदेश में दोहरी व्यवस्था बन गई है। एक तरफ प्रशासन बचाने की कोशिश कर रहा है, तो वहीं डीपीआई मारने पर तुला है।
प्रशिक्षकों पर तीन तरह का दबाव
डीपीआई के पत्र में प्रशिक्षकों पर तिहरी मार डाली गई है।
- पहला, 20 अप्रैल 2026 तक निकटतम उद्योग या संस्थान का निर्धारण कर जानकारी जमा करना अनिवार्य है।
- दूसरा, 12 जून तक ओजेटी की रिपोर्ट भोपाल कार्यालय में जमा करना होगी।
- तीसरा और सबसे बड़ा प्रहार यह है कि जिन स्कूलों में यह ट्रेड संचालित नहीं हैं, वहां के प्रशिक्षकों की सेवाएं 30 अप्रैल 2026 तक ही रखने का फरमान सुना दिया गया है।
नीयत पर सवाल
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश न केवल संवेदनहीन है, बल्कि यह साबित करता है कि विभाग को छात्रों और शिक्षकों के जीवन की कोई चिंता नहीं है। एक विशेषज्ञ ने कहा कि क्या मई की भीषण गर्मी में ओजेटी कराना ही एकमात्र विकल्प था? क्या विभाग नवंबर या दिसंबर जैसे ठंडे महीनों का इंतजार नहीं कर सकता था?
साफ है कि विभाग का रवैया तानाशाही है, जहां उन्हें सिर्फ अपनी औपचारिकताएं पूरी करनी हैं, भले ही इसके लिए मासूम बच्चों और उनके शिक्षकों की जान दांव पर लगनी पड़े। यह तानाशाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।