भ्रष्टाचार के आगे नतमस्तक सरकारी तंत्र: कॉलोनाइज़र–बिल्डरों के संरक्षण का खुला खेल, ट्रेज़र टाउन बिजलपुर बना उदाहरण

प्रदेश में “सुशासन” और “त्वरित न्याय” के दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। नगर निगम, विद्युत मंडल, नगर तथा ग्राम निवेश (TNCP), तहसीलदार कार्यालय और प्रदूषण नियंत्रण विभाग जैसे अहम सरकारी विभागों पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि वे नियमों का उल्लंघन करने वाले बिल्डरों और कॉलोनाइज़रों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें खुला संरक्षण दे रहे हैं। ताज़ा मामला इंदौर के समीप स्थित ट्रेज़र टाउन, बिजलपुर कॉलोनी का है, जिसने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

भ्रष्टाचार के आगे नतमस्तक सरकारी तंत्र: कॉलोनाइज़र–बिल्डरों के संरक्षण का खुला खेल, ट्रेज़र टाउन बिजलपुर बना उदाहरण

द एक्सपोज़ लाइव न्यूज़ नेटवर्क, इंदौर

(नीरज द्विवेदी – 9993949000)।

स्थानीय निवासियों का आरोप है कि कॉलोनी में वर्षों से नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं—चाहे वह अवैध लेआउट, अधोसंरचना की कमी, विद्युत एवं पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन हो या फिर भू-अधिकार से जुड़ी अनियमितताएं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन तमाम शिकायतों को संबंधित विभागों ने जांच में सही भी माना, लेकिन उसके बाद उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। जो शिकायतकर्ता “समझौते” के लिए तैयार नहीं हुए, उन्हें ही 

ब्लैकमेलर करार देने की कोशिश की गई—वह भी सरकारी संरक्षण में।

निवासियों का दावा है कि लगभग 100 करोड़ रुपये की निरंतर धोखाधड़ी से जुड़ी शिकायतों को सुनियोजित तरीके से दबाया गया और कई मामलों में “फोर्स क्लोज़” कर दिया गया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को लिखे पत्र में निवासियों ने स्पष्ट रूप से उन विभागों की भूमिका का उल्लेख किया है, जिन्होंने साक्ष्यों की अनदेखी कर बिल्डर को बचाने का काम किया। इससे प्रदेश सरकार द्वारा घोषित “सस्ती, सुलभ और त्वरित न्याय व्यवस्था” तथा सीएम हेल्पलाइन जैसी योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है।

निवासियों का आरोप है कि सीएम हेल्पलाइन जैसी जनसुनवाई व्यवस्था का दुरुपयोग खुद विभागीय अधिकारी कर रहे हैं। शिकायतें दर्ज तो होती हैं, लेकिन उनका निपटारा काग़ज़ी खानापूर्ति बनकर रह जाता है। दस्तावेज़ी साक्ष्य होते हुए भी नगर निगम, TNCP, तहसीलदार कार्यालय, मध्य प्रदेश विद्युत मंडल और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा शिकायतों को नस्तीबद्ध करना यह दर्शाता है कि पूरा तंत्र किस तरह एकजुट होकर कॉलोनाइज़र को बचाने में लगा है।

हद तो तब हो जाती है जब शिकायतकर्ता सवाल उठाते हैं कि यदि आम नागरिक की आवाज़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या मुख्यमंत्री तक पहुंचती है, तो क्या वह केवल “मन की बात” सुनने तक सीमित रह जाएगी? क्या जनता को अपनी बात देश और प्रदेश के सर्वोच्च पदों तक रखने का अधिकार भी व्यावहारिक रूप से छीन लिया गया है?

न्याय न मिलने से हताश होकर ट्रेज़र टाउन के निवासी अब दिल्ली और भोपाल दरबार तक गुहार लगाने को मजबूर हुए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से तत्काल उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है और यह भी कहा है कि वे जब कहा जाए, सभी दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत करने को तैयार हैं।

यह मामला सिर्फ एक कॉलोनी का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम का आईना है, जो भ्रष्टाचार के आगे नतमस्तक होकर आम नागरिक के अधिकारों का गला घोंट रहा है। सवाल साफ है—क्या सरकार कार्रवाई करेगी, या फिर बिल्डर–कॉलोनाइज़र संरक्षण की यह परंपरा यूं ही चलती रहेगी?