ये भी गजब है... मुख्यमंत्री को न्योता, पर खुद गेर से दूरी!

इंदौर की पहचान बन चुकी पारंपरिक रंगपंचमी गेर इस बार रंगों से ज्यादा राजनीतिक रंगत में डूबी नजर आ रही है। शहर अभी भागीरथपुरा जलकांड और दो निगमकर्मियों की दर्दनाक मौत से उबर भी नहीं पाया था कि इसी बीच इंदौर नगर निगम की ओर से गेर को लेकर बड़े-बड़े दावे और निमंत्रणों की खबरें आ गईं।

ये भी गजब है... मुख्यमंत्री को न्योता, पर खुद गेर से दूरी!

द एक्सपोज़ लाइव न्यूज़ नेटवर्क इंदौर

(नीरज द्विवेदी-9993949000)   

महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने बड़े उत्साह से यह प्रचारित करवाया कि प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को गेर में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है। इतना ही नहीं, पूरी कैबिनेट को भी न्यौता! संदेश साफ था — इंदौर की गेर का वैभव इस बार सत्ता के शीर्ष तक पहुंचेगा।

लेकिन कहानी में ट्विस्ट यहीं से शुरू होता है।

अब खबर आई है कि महापौर स्वयं गेर में शामिल नहीं होंगे। कारण बताया गया — हालिया दुखद घटनाएं, जलकांड और निगमकर्मियों की मौत। महापौर ने होली न मनाने और गेर से दूरी बनाने का निर्णय लिया है।

अब सवाल यह उठता है —

अगर शहर शोक में है, तो फिर मुख्यमंत्री और पूरी कैबिनेट को रंगों में सराबोर होने का न्यौता क्यों? और अगर गेर उत्सव है, तो महापौर खुद क्यों पीछे हट गए? राजनीतिक गलियारों में इसे “संवेदनशीलता का चयनात्मक प्रदर्शन” कहा जा रहा है। आम जनता भी पूछ रही है — क्या संवेदना केवल मंच से घोषणा तक सीमित है? क्या जिम्मेदारी का रंग सिर्फ बयान में चढ़ता है?

इंदौर की जनता ने महापौर की “त्याग” वाली घोषणा का स्वागत तो किया, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उछाला कि क्या बाकी जनप्रतिनिधि भी इसी तरह की पहल करेंगे? या फिर संवेदना और सत्ता, दोनों की परिभाषाएं अवसर के हिसाब से बदलती रहेंगी?

शहर में चर्चा है —

“गेर में रंग कम और राजनीति ज्यादा उड़ रही है।”

इंदौर हमेशा से अपनी स्वच्छता और उत्सवप्रियता के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन इस बार गेर से पहले ही प्रशासनिक जिम्मेदारी के रंग फीके नजर आ रहे हैं। जनता चाहती है कि हादसों की जवाबदेही तय हो, न कि केवल भावनात्मक बयानबाजी हो।

कुल मिलाकर, इस बार की गेर में सबसे गहरा रंग सवालों का है  ,निमंत्रण राजनीति का और अनुपस्थिति संवेदना की? इंदौर इंतजार कर रहा है , रंगों के त्योहार में पारदर्शिता का रंग कब चढ़ेगा?