“शहर प्यासा… लेकिन पानी माफिया मालामाल!”

इंदौर में जलसंकट या ‘पानी का काला कारोबार’? रातभर दौड़ते टैंकरों ने खड़े किए बड़े सवाल,जब शहर में पानी ही नहीं तो बिकने के लिए कहाँ से आया ?

“शहर प्यासा… लेकिन पानी माफिया मालामाल!”

द एक्सपोज़ लाइव न्यूज़ नेटवर्क इंदौर

नीरज द्विवेदी (9993949000)  

इंदौर शहर एक तरफ बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है, तो दूसरी तरफ उसी शहर में रातभर पानी का ऐसा खुला व्यापार चल रहा है जिसने पूरे सिस्टम की नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर के हर चौराहे पर जनता पानी की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रही है, जिम्मेदार अधिकारी जलसंकट की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर सड़कों पर दौड़ते हजारों पानी के टैंकर कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रशासन खुद स्वीकार कर रहा है कि शहर में पानी की भारी कमी है, तो आखिर यह पानी आ कहां से रहा है? और अगर पानी उपलब्ध नहीं है, तो फिर 24 घंटे टैंकरों से पानी बेचने का यह “अरबों का खेल” कैसे चल रहा है?

पिछले चार वर्षों में इंदौर शहर में जितने पानी के टैंकर बढ़े हैं, उतने शायद पहले कभी नहीं देखे गए। नगर निगम जहां सीमित टैंकर और नर्मदा सप्लाई की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ हर गली, हर कॉलोनी और हर निर्माण स्थल पर पानी बिकता दिखाई दे रहा है। देर रात तक टैंकरों की आवाजाही यह साबित करती है कि शहर में “पानी की कमी” से ज्यादा “पानी की कमाई” का खेल चल रहा है।

सूत्रों की मानें तो पानी का यह कारोबार अब छोटे स्तर का धंधा नहीं रहा, बल्कि करोड़ों रुपए का समानांतर नेटवर्क बन चुका है। ना जीएसटी, ना इनकम टैक्स, ना कोई स्पष्ट हिसाब… लेकिन पानी बेचने वाले कुछ सालों में करोड़पति बन बैठे। सवाल यह भी है कि आखिर प्राकृतिक संसाधन को इस तरह बेचने की खुली छूट किसने दी?

जब इस विषय पर जिम्मेदार अधिकारियों से बात की गई तो जवाब और भी चौंकाने वाले सामने आए। कई अधिकारियों ने स्वीकार किया कि शहर में पानी की सप्लाई “पूरी तरह खत्म” नहीं हुई है, लेकिन वाटर रिचार्जिंग और जल संरक्षण जैसी नीतियां राजनीतिक दबाव में जमीन पर लागू नहीं हो पा रही हैं। नीचे के अधिकारी बार-बार रेन वाटर हार्वेस्टिंग और वाटर रिचार्ज को अनिवार्य करने की बात करते हैं, लेकिन कथित रूप से भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों के दबाव में फाइलें ठंडी पड़ जाती हैं।

वाटर प्लस अवार्ड और वाटर मिसमैनेजमेन्ट का उदहारण 

एक ओर इंदौर को “वॉटर प्लस” जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से नवाज़ा जाता है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत जल प्रबंधन की गंभीर खामियों की ओर इशारा करती दिखाई देती है। शहर के कई क्षेत्रों में वर्षों से नर्मदा पाइपलाइन बिछी होने के बावजूद नियमित जलापूर्ति नहीं हो पा रही है। विडंबना यह है कि जहां पाइपलाइन मौजूद है, वहीं के रहवासी पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं। यदि इन क्षेत्रों में निर्धारित मात्रा में नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित कर दी जाए, तो बड़ी संख्या में टैंकरों की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो सकती है।

नगर निगम ने पानी की कथित कालाबाज़ारी और अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के लिए टैंकरों पर शिकायत नंबर वाले स्टीकर तो लगाए, लेकिन जमीनी स्तर पर अधिकांश टैंकरों से ये स्टीकर या तो गायब हैं या हटा दिए गए हैं। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े होते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यदि कोई नागरिक शिकायत दर्ज भी कर देता है, तो उसकी स्थिति जानने का कोई प्रभावी तंत्र दिखाई नहीं देता। न शिकायत का पंजीकरण नंबर दिया जाता है, न कार्रवाई की समय-सीमा बताई जाती है और न ही शिकायत के निराकरण का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाता है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर “वॉटर प्लस” का सम्मान केवल कागजों और पुरस्कारों तक सीमित है या वास्तव में शहर की जल व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत और पारदर्शी है? जब नागरिक पानी के लिए भटक रहे हों, टैंकर व्यवस्था सवालों के घेरे में हो और शिकायत तंत्र जवाबदेह न दिखे, तब जल प्रबंधन की सफलता के दावों पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती है।

अब जनता पूछ रही है कि आखिर शहर को प्यासा किसने बनाया?

क्या सचमुच पानी की कमी है… या फिर कृत्रिम संकट पैदा कर पानी का कारोबार चमकाया जा रहा है?

शहर में विधायक, पार्षद और मंत्री स्तर तक पानी को लेकर राजनीति और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। जनता का गुस्सा इसलिए भी बढ़ता जा रहा है क्योंकि चुनाव के समय यही नेता हाथ जोड़कर घर-घर पहुंचते हैं, लेकिन आज जब शहर पानी के लिए संघर्ष कर रहा है, तब जिम्मेदार लोग एसी कमरों में बैठकर सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं।

सबसे कटु सच्चाई यह है कि जिस पानी को भारतीय संस्कृति में “जीवन” माना गया, वही आज “कमाई का सबसे बड़ा जरिया” बन चुका है। हिंदू मान्यताओं में पानी बेचना पाप माना गया, लेकिन कलयुग की राजनीति और लालच ने पानी को भी बाजार का माल बना दिया।बहरहाल हिसाब तो नरक में हो ही जायेगा लेकिन अभी मृत्य लोक में इन्ही का डंका बज रहा हे। 

अब जनता जानना चाहती है:

अगर शहर में पानी नहीं है, तो टैंकरों में भर-भरकर बिक कैसे रहा हे ?

और अगर पानी है… तो जनता तक क्यों नहीं पहुंच रहा?