हॉरर चाहिए था, खिचड़ी मिली—‘द राजा साब’ पूरी तरह फेल

अगर किसी फिल्म को देखकर यह सवाल उठे कि “आख़िर इसे बनाया ही क्यों गया?”—तो समझ लीजिए वहां सिनेमा हार चुका है। अगर किसी फिल्म में प्रभास और संजय दत्त जैसे नाम हों और फिर भी दर्शक थिएटर से सिर पकड़कर निकले, तो समझ लीजिए समस्या गंभीर है। द राजा साब उसी हार की ताज़ा मिसाल है। हॉरर-कॉमेडी के नाम पर दर्शकों को जो परोसा गया है, वह न डराता है, न हंसाता है और न ही दिमाग़ में कोई हलचल पैदा करता है। यह फिल्म नहीं, बल्कि क्रिएटिव दिवालियापन का सार्वजनिक प्रदर्शन है।

हॉरर चाहिए था, खिचड़ी मिली—‘द राजा साब’ पूरी तरह फेल
the raja saab

प्रभास का नाम, लेकिन सिनेमा नदारद, बेहद नीरस और पकाऊ फिल्म, समय और पैसे की बर्बादी का टॉलीवुड मसाला

फिल्म: द राजा साब (The Raja Saab)
निर्देशन: मारुति (Maruthi)
मुख्य कलाकार: प्रभाष (Prabhash)
अन्य कलाकार: निधि अग्रवाल, मालविका मोहनन, रिद्धि कुमार, संजय दत्त। 

कहानी: विचार नहीं, सिर्फ भ्रम

फिल्म की कहानी ऐसी है जैसे किसी ने हॉरर, कॉमेडी और साइकोलॉजी के नोट्स एक साथ मिक्सर में डाल दिए हों—बिना यह सोचे कि स्वाद कैसा होगा। हॉरर का दावा है, लेकिन डर नाम की चीज़ गायब है।

साइकोलॉजी का ठप्पा लगाया गया है, लेकिन उसका इस्तेमाल इतना सतही है कि वह ज्ञान नहीं, बोझ लगती है। न कोई ठोस प्लॉट, न कोई याद रहने वाला मोड़—सिर्फ लंबा, थका देने वाला भटकाव

स्क्रिप्ट: सबसे बड़ा अपराध

अगर इस फिल्म पर कोई केस बनता है, तो पहला आरोपी इसकी स्क्रिप्ट होगी।

  • गैर-ज़रूरी सीन
  • बेमतलब संवाद
  • बिना वजह खिंची हुई लंबाई

स्क्रिप्ट साफ बताती है कि कहानी को नहीं, स्टार को आगे रखा गया—और यही इस फिल्म का पतन है।

निर्देशन: जॉनर पर ज़ीरो कंट्रोल

निर्देशक मरुति यहां पूरी तरह दिशाहीन दिखते हैं। हॉरर सीन कॉमिक लगते हैं, कॉमिक सीन उबाऊ और साइको थ्रिलर का दावा सिर्फ पोस्टर तक सीमित रह जाता है। टोन पर कोई पकड़ नहीं—जैसे सेट पर हर सीन अलग फिल्म का हिस्सा हो।

अभिनय: प्रभास भी बेबस, संजय दत्त बेअसर

प्रभास इस फिल्म का चेहरा हैं, लेकिन चेहरा ही सब कुछ नहीं होता। उनके पास करने को न दमदार सीन हैं, न यादगार संवाद। स्टारडम है, पर अभिनय को चमकाने का मौका नहीं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि संजय दत्त जैसे अनुभवी अभिनेता को भी फिल्म पूरी तरह बर्बाद कर देती है। उनका किरदार न डर पैदा करता है, न प्रभाव छोड़ता है। ऐसा लगता है जैसे विलेन लिखा ही नहीं गया—बस मौजूद भर है।

तीनों अभिनेत्रियां—निधि अग्रवाल, मालविका मोहनन और ऋद्धि कुमार—किरदार नहीं, सजावटी वस्तु बनकर रह जाती हैं। उनका होना या न होना, कहानी पर कोई फर्क नहीं डालता।

गाने: कहानी के खिलाफ साजिश

गाने ऐसे डाले गए हैं मानो दर्शक का सब्र तोड़ना ही मकसद हो। न भाव, न संदर्भ—सिर्फ समय की बर्बादी। यह वही पुराना फार्मूला है, जो अब पूरी तरह सड़ चुका है।

तकनीक: शोर बहुत, असर शून्य

वीएफएक्स, बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिजाइन—सब मिलकर भी डर पैदा नहीं कर पाते। हॉरर फिल्म में यह सबसे बड़ा अपराध है।

टॉलीवुड के लिए चेतावनी

द राजा साब सिर्फ एक खराब फिल्म नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अगर टॉलीवुड भी बॉलीवुड की तरह सिर्फ बड़े नामों के सहारे बेसिर-पैर की फिल्में बनाता रहा, तो दर्शक भरोसा नहीं, मुंह मोड़ लेगा।

अंतिम फैसला

यह फिल्म हर स्तर पर असफल है—कहानी, स्क्रिप्ट, निर्देशन, अभिनय और जॉनर की समझ—सब जगह शून्य।

रेटिंग: ★☆☆☆☆ (1/5)

निष्कर्ष: द राजा साब सिनेमा नहीं, पैसे, समय और उम्मीदों की बर्बादी है। प्रभास के नाम के अलावा इसमें कुछ भी नहीं—और वह नाम भी इस बार फिल्म को बचा नहीं पाया।