मंदिरों में VIP दर्शन: क्या भगवान भी ‘स्टेटस’ से मिलते हैं?
शहर, प्रदेश और देश के प्रसिद्ध देवस्थानों से लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं, जहाँ कुछ “स्वघोषित VIP” सीधे गर्भगृह तक पहुँचकर दर्शन कर रहे हैं। न उनके पास कोई संवैधानिक पद, न कोई प्रशासनिक जिम्मेदारी, न ही कोई आधिकारिक दर्जा—अगर कुछ है तो सिर्फ पैसे का रुतबा या सामाजिक दहशत। सवाल यह है कि क्या अब भगवान के दरबार में भी प्रवेश के लिए संविधान नहीं, बल्कि ‘स्टेटस’ की सीढ़ी चाहिए?
द एक्सपोज़ लाइव न्यूज़ नेटवर्क इंदौर
एक तरफ आम श्रद्धालु—बूढ़े माता-पिता को सहारा देकर, छोटे बच्चों को गोद में उठाकर—घंटों कतार में खड़ा रहता है। भीड़, धक्का-मुक्की, गर्मी, पसीना और ऊपर से सुरक्षा कर्मियों की कड़क आवाजें। “आगे बढ़ो… रुकना मत… फोटो मत लो…”—यह सब सहते हुए वह सिर्फ दो सेकंड की झलक के लिए तरसता है। कई बार तो दर्शन की जगह सिर्फ पुजारी की पीठ दिखती है और बाहर निकाल दिया जाता है। क्या यही आस्था का सम्मान है?
उधर, कुछ प्रभावशाली चेहरे ( कभी स्वघोषित भाउ ,स्वघोषित दीदी ,स्वघोषित युवराज ,स्वघोषित युवा तरुणाई ) आते हैं। गेट खुलते हैं, बैरिकेड हटते हैं, सुरक्षा कर्मियों की आवाज का सुर बदल जाता है। वे सीधे गर्भगृह में प्रवेश करते हैं, आराम से पूजा-अर्चना करते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और लौटते समय ऐसे मुस्कुराते हैं मानो ईश्वर ने विशेष अपॉइंटमेंट सिर्फ उनके लिए रखा हो। क्या भगवान भी अब “पूर्व सूचना” और “प्रोटोकॉल” से मिलते हैं?
यह व्यंग्य नहीं, आम आदमी की पीड़ा है। जब वह यह दृश्य देखता है तो मन में सवाल उठता है—
- क्या गर्भगृह में जाने के लिए हमें भी सामाजिक मर्यादाएँ तोड़कर ऐसा रुतबा बनाना होगा?
- क्या देवों के दरबार में भी “पहचान” ही पहचान की कुंजी है? जो व्यक्ति इस तरह दर्शन कर रहा हे वो आखिर कौन हे ? क्या कोई मुख्यमंत्री ,मंत्री ,वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ,कोई न्यायाधीश ,कोई सेना का अधिकारी जिनके समय की कीमत होती हे और आमजन भी उनके समय का सम्मान करता हे ,लेकिन अगर इनमे से एक भी नहीं तो आखिर कौन ,और देवों के गणों का इस कदर आत्मसमर्पण क्यों ?
भारतीय संविधान सभी को समान अधिकार देता है। फिर मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन किस आधार पर यह भेदभाव होने दे रहे हैं? क्या स्थानीय प्रशासन को यह नहीं दिखता कि गर्भगृह को ‘स्टेटस सिंबल’ बनाया जा रहा है? क्या शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बनती कि नियम सब पर समान रूप से लागू हों—चाहे वह आम श्रद्धालु हो या प्रभावशाली व्यक्ति?
आम श्रद्धालु की पीड़ा सिर्फ लंबी कतार नहीं है। कई बार टिकट काउंटर पर अस्पष्ट व्यवस्था, अलग-अलग “विशेष दर्शन” श्रेणियाँ, और बीच-बीच में अचानक रोकी गई लाइन—यह सब उसे भीतर तक आहत करता है। वह सोचता है, “क्या मेरी आस्था कम है? क्या मेरे समय की कोई कीमत नहीं?”
सवाल तो यह है कि जिनके पास वास्तव में प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ हैं, वे प्रोटोकॉल के तहत सीमित समय में दर्शन कर लौट जाते हैं। लेकिन जिनकी कोई संवैधानिक हैसियत नहीं, वे नियमों को धता बताकर गर्भगृह तक पहुँच जाते हैं। आखिर यह ‘अनौपचारिक VIP संस्कृति’ किसके संरक्षण में फल-फूल रही है?
जिला प्रशासन, राज्य सरकार और मंदिर प्रबंधन समितियों को अब स्पष्ट नीति बनानी होगी। गर्भगृह में प्रवेश के नियम पारदर्शी हों, सार्वजनिक हों और सबके लिए समान हों। सुरक्षा कर्मियों को भी यह प्रशिक्षण मिले कि वे श्रद्धालुओं से सम्मानपूर्वक व्यवहार करें। आस्था का सम्मान तभी होगा जब व्यवस्था निष्पक्ष होगी।
आखिर भगवान का दरबार लोकतांत्रिक होना चाहिए या दरबारी? यह सवाल अब सिर्फ व्यंग्य नहीं, व्यवस्था से जवाब मांगता है।