भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता 2026: किसानों पर संकट की दस्तक
सस्ते आयात से खेती चौपट होने का डर, छोटे किसानों के भविष्य पर बड़ा सवाल ,भारतीय कृषि बाजार को अमेरिका के लिए खोलने की आंशिक तैयारी
द एक्सपोज़ लाइव न्यूज़ इंदौर
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित 2026 भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार ढांचा (BTA) को लेकर देशभर में किसान संगठनों में गहरी चिंता और आक्रोश है। सरकार जहां इसे “संतुलित और सुरक्षित” करार दे रही है, वहीं किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझौता भारतीय खेती, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
सस्ते अमेरिकी उत्पाद, टूटती भारतीय कीमतें
इस समझौते के तहत कई कृषि उत्पादों पर शुल्क (टैरिफ) घटाने की बात है। किसान संगठनों का आरोप है कि इससे अमेरिका के अत्यधिक सब्सिडी वाले कृषि उत्पाद—जैसे मक्का (कॉर्न), सोयाबीन, कपास, तिलहन और फल—भारतीय बाजार में बड़ी मात्रा में आएंगे। इसका सीधा असर कीमतों में भारी गिरावट (Price Depression) के रूप में पड़ेगा। मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में पहले से ही सोयाबीन के दाम MSP से नीचे चल रहे हैं; ऐसे में आयात बढ़ा तो किसानों की लागत भी नहीं निकल पाएगी।
72 करोड़ लोगों की आजीविका पर खतरा
किसान संगठनों के अनुसार, कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों पर करीब 72 करोड़ लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं। अमेरिका से DDGs (ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स) और अन्य पशु-आहार सामग्री के आयात से देसी चारा उद्योग प्रभावित होगा छोटे किसानों और पशुपालकों की आय पर सीधा वार पड़ेगा
जीएम बीज का जोखिम: खेती और जैव-सुरक्षा पर सवाल
समझौते में GM (जेनेटिकली मॉडिफाइड) सोयाबीन को क्रशिंग के लिए आयात करने के प्रस्ताव पर भी आपत्ति है। कृषि वैज्ञानिकों और किसान संगठनों का कहना है कि बीजों के “लीक” होने से स्थानीय फसलों में आनुवंशिक मिलावट का खतरा बढ़ेगा यह भारत की जैव-विविधता और परंपरागत खेती के लिए घातक हो सकता है
डेयरी सेक्टर भी आशंकित
हालांकि सरकार का दावा है कि डेयरी क्षेत्र को समझौते से बाहर रखा गया है, लेकिन किसान संगठनों को डर है कि भविष्य में इसे भी व्यापार के लिए खोला जा सकता है इससे छोटे दुग्ध उत्पादकों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा बढ़ेगा
असमान मुकाबला: छोटा किसान बनाम अमेरिकी एग्री-कॉरपोरेट
भारत में जहां अधिकांश किसान 1–2 हेक्टेयर की छोटी जोत पर निर्भर हैं, वहीं अमेरिका में बड़े-बड़े औद्योगिक फार्म भारी सरकारी सब्सिडी आधुनिक तकनीक के साथ उत्पादन होता है। किसान नेताओं का कहना है कि यह समझौता बराबरी का नहीं बल्कि असमान और अन्यायपूर्ण मुकाबला है।
सरकार बनाम किसान संगठन
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि “कृषि और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों पर भारत की ‘रेड लाइन्स’ सुरक्षित हैं और इस समझौते से किसानों को कोई नुकसान नहीं होगा।” लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा ने इस बयान को खारिज करते हुए समझौते को “भारतीय कृषि के सामने आत्मसमर्पण” करार दिया है और देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।
दोहरा नुकसान: आयात बढ़ा, निर्यात पर टैक्स
इस समझौते में अमेरिका द्वारा कुछ भारतीय उत्पादों पर 18% तक का टैरिफ लगाए जाने की भी बात है, जिससे अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ेगा
किसान संगठनों का साफ कहना है कि
महेश चौधरी ( म प्र/छ. क्षेत्रीय संगठन मंत्री भारतीय किसान संघ ) : “जिस देश की खेती कमजोर होगी, उसकी अर्थव्यवस्था और संप्रभुता भी कमजोर होगी।” भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता 2026 को लेकर उठ रहे सवाल यह संकेत देते हैं कि यदि किसानों के हितों को केंद्र में रखकर नीति नहीं बनाई गई, तो यह सौदा लाभ से ज्यादा कृषि संकट को गहरा कर सकता है—और इसका सबसे बड़ा खामियाजा वही किसान भुगतेंगे, जो पहले से ही कर्ज, मौसम , बाजार और अनियंत्रित भूमि अधिग्रहण की मार झेल रहे हैं। वर्षों से अमेरिका भारत पर अपने कृषि क्षेत्र को अमेरिका के लिए खोलने का दबाव बना रहा हे लेकिन इसे खोलने के पहले सरकार को चौकस रहना होगा,GM उत्पाद आयात होने से ज़मीन कि उर्वरक क्षमता और जनता पर भी इसके दुष्प्रभाव होंगे ।"
दिलीप मुकाती ( इंदौर महानगर अध्यक्ष -भारतीय किसान संघ ) : "मोटे तौर पर अमेरिकी आयात को 3 गुना बढ़ाने का प्रस्ताव दिया गया हे ,अगर ऐसा होता हे तो उसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव म.प्र के किसानों पर पढ़ेगा क्यूंकि यहाँ का किसान सोयाबीन की फसल पर निर्भर हे जिसके दाम पिछले ३ दिनों में दो सौ से तीन सौ रु प्रति क्विंटल तक गिर चुके हैं ,जहाँ पहले ही सोयाबीन न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे बिक रही हे ,आने वाले समय में किसान और क़र्ज़ में डूब कर मज़दूरी करने पर मजबूर होगा।"
प्रवक्ता युवा किसान संघ -म प्र.: "BTA की शर्तों का सूक्ष्म विश्लेषण साफ़ तौर पर बता रहा हे की भारतीय बाजार अमेरिकी खाद्य उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड बनेगा ,कृषि उत्पादों के बदले में भारत अमेरिका से क्या खरीदेगा इसका भी कोई उल्लेख प्रस्ताव में स्पष्ट नहीं हे जिस पर भी देश व्यापी चर्चा की जानी चाहिए ।"