इंदौर उच्च न्यायलय का ऐतिहासिक फैसलाः शकरखेड़ी में किसानों की जीत

नवीन भूमि अधिग्रहण की धारा 24 (2) के तहत ख़त्म किया इंदौर नगर निगम द्वारा किया गया वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के लिए किया गया लगभग 29 हेक्टेयर ज़मीन का अधिग्रहण। इसके पहले भी 3 निर्णय में खत्म किया गया हे अधिग्रहण। किसानों में जागी उम्मीद, वर्षों से चल रही लड़ाई अब धीरे धीरे खत्म हो रही। कानून का गलत फायदा लेने वाले जादूगरों के होंसले होने लगे ध्वस्त।

इंदौर उच्च न्यायलय का ऐतिहासिक फैसलाः शकरखेड़ी में किसानों की जीत
high court indore

धारा 24 (2) के तहत शकरखेड़ी ट्रीटमेंट प्लांट के लिए ली जाने वाली जमीन नहीं मिली नगर निगम को, फिर से करना होगा भू-अर्जन

एक्सपोज लाइव न्यूज नेटवर्क, इंदौर।

इंदौर नगर निगम द्वारा वर्ष 1998 में शहर से गुजरने वाली कान्ह नदी के पानी को साफ़ करने के ट्रीटमेंट प्लांट के लिए शक्कर खेड़ी की लगभग 29 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया था। अधिसूचना को निराधार मानते हुए कुछ किसानों ने इसे वर्ष 1998 में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था की इस प्लांट की ज़रूरत निगम को नहीं हे क्योंकि वर्ष 1950 में ही निगम द्वारा इस हेतु कुछ भूमियों का अधिग्रहण किया जा चूका हे और आज की तारिख में एक ट्रीटमेंट प्लांट पहले से ही शहर में मौजूद हे, इतना ही नहीं अधिग्रहण की कार्यवाही के बाद प्रक्रिया का पालन न करते हुए निगम द्वारा न तो भूमि का विधिवत कब्ज़ा लिया गया हे और न ही मुआवजे की राशि समय अनुसार कभी दी गयी हे। उनका एक तथ्य यह भी था की जिन भूमियों का अधिग्रहण निगम द्वारा किया गया था उसमे से कुछ भूमियां बाहुबलियों को लीज पर भी दे दी गयी हैं और उनके द्वारा उस पर बाकायदा खेती भी की जा रही हे, जो नियमों के विपरीत हे। एक लम्बी न्यायालयीन लड़ाई के दौरान नवीन भूमि अधिग्रहण 2013 में सर्वसम्मति से पारित किया गया, जिसकी धारा 24 (२) ने किसानों के मन में एक उम्मीद जगा दी, इन्ही याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में इसी धारा का लाभ भी तत्समय मांगा गया।

मामला चूंकि पर्यावरण से सम्बद्ध रखता था, याचिका को सुनवाई को जबलपुर भी भेजा गया और बाद में सम्पूर्ण अधिग्रहण को नवीन भूमि अधिग्रहण के तहत न्यायालय द्वारा शून्य मान लिया गया। जब मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा, न्यायलय द्वारा पुनः प्रकरण को उच्च न्यायालय इंदौर में नवीन भूमि अधिग्रहण की धारा 24 के तहत सुनवाई के लिए भेजा गया। 3 मार्च 2024 को न्यायमूर्ति धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा की युगल पीठ ने सम्पूर्ण अधिग्रहण को शून्य मानते हुए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला दिया और निगम को करारी हार का सामना करना पड़ा। अब अगर निगम द्वारा अधिग्रहण की ज़रूरत पुनः महसूस की जाती हे तो उसे नवीन भूमि अधिग्रहण के तहत कार्यवाही करना होगी जिसमे किसानों को 2 गुना मुआवजे का अधिकार होगा।

धारा 24 का इतिहास

यूं तो जन्म से निर्विवाद रही धारा 24 (2) में समय समय पर बड़े दिलचस्प विवाद आते रहे, कभी तत्कालीन सरकार ने इसे बदलने की कोशिश की लेकिन सर्वव्यापी विरोध के चलते सरकार को बैक फुट पर आना पड़ा। कभी बड़े औद्योगिक घरानों ने इसको दबे स्वरों में विरोध सरकार के सामने किया, अंततः सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने इसे वर्ष 2021 में पुनः परिभाषित कर दिया। बेशक संवैधानिक पीठ पर भी कई गंभीर प्रश्न चिन्ह लगे जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ( वर्तमान में अध्यक्ष मानव अधिकार आयोग ) द्वारा की गयी। धारा 24 (2) को परिभाषित करते हुए 340 पन्नों का निर्णय भी पीठ द्वारा पारित किया गया जिसके मायने लोग अपने अपने हिसाब से लगाते रहे, लेकिन अब उसी निर्णय के सही तथ्य न्यायालय द्वारा स्पष्ट होने लगे हैं।

 

संवैधानिक पीठ द्वारा धारा 24 के मुख्य 2 बिंदुओं पर व्याख्या दे गयी थी। कानून पारित होते वक्त सिर्फ कब्जे और मुआवजे को प्रमुख माना गया था और लिखा गया था की अगर विधिसम्मत कब्ज़ा नहीं लिया गया हे "या" नियमानुसार मुआवज़ा किसान के खाते में अवार्ड घोषित होने के पांच वर्ष तक नहीं जमा करा गया हे तो सम्पूर्ण अधिग्रहण शून्य घोषित मान लिया जायेगा जिसे पुनः परिभाषित करते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा "और" से बदल दिया गया था। मुआवजे के लिए कहा गया था की राशि किसान के खाते में या कोर्ट में अवार्ड घोषित होने के पांच वर्ष के अंदर जमा की जानी चाहिए जिसके लिए कहा गया की एजेंसी द्वारा भूअर्जन अधिकारी के पास राशि जमा हों पर्याप्त माना जायेगा। भौतिक कब्जे को ले कर भी कहा गया की कागज़ी पंचनामा होना पर्याप्त रहेगा। इन्ही सब तथ्यों को ले कर जिन्हें संवैधानिक पीठ द्वारा विस्तार से समझाया भी गया, वे सभी तथ्य सूक्ष्म परीक्षण के बाद अब खुद न्यायालय द्वारा अपने निर्णयों में स्पष्ट किये जाने लग हैं, जिससे न सिर्फ किसानों में उम्मीद जाएगी हे बल्कि अधिवक्ताओं की राह भी अपने पक्षकारों को न्याय दिलाने के लिए आसान होने लगी हे।

निर्णय के मुख्य बिंदु

न्यायमूर्ति धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा की पीठ ने संवैधानिक पीठ के निर्णय अनुसार निर्णीत किया और कहा :

·        सिर्फ कागज़ी कब्ज़ा पर्याप्त नहीं माना जा सकता क्योंकि अधिग्रहणकर्ता ने मामले में बेशक कागज़ी कब्ज़ा समयावधि के बाद ले लिया था लेकिन वास्तविक कब्ज़ा आज भी भूधारक के ही पास हे जिस पर उनके द्वारा आज भी कृषि की जा रही हे।

·        मुआवज़ा राशि का जो भुगतान किया गया वह भी धारा 31 के अनुसार नहीं किया गया हे क्योंकि उक्त धारा में स्पष्ट लेख हे की राशि का भुगतान या तो भूस्वामी के खाते में होना चाहिए या आपत्ति आने की दशा में न्यायालय में जमा की जाना चाहिए।

·        मुआवजे की सुचना धारा 12 के अनुसार भूस्वामियों को दिए जाने का भी प्रावधान हे लेकिन उक्त प्रकरण में अधिग्रहणकर्ता कोई दस्तावेज सुचना संबंधित पेश नहीं कर पाया हे।

·        मुआवजे और कब्जे की प्रक्रिया अवार्ड घोषित होने के 5 वर्ष के अंदर पूर्ण कर ली जाना चाहिए लेकिन उक्त प्रकरण में दोनों ही चीज़ें 5 वर्ष की समयावधि के बाद पूर्ण की गयी हैं।

उक्त सभी तथ्यों का हवाला भी संवैधानिक पीठ द्वारा विस्तार से स्पष्ट किया जा चूका था जिसको उच्च न्यायालय द्वारा आधार मानते हुए सम्पूर्ण अधिग्रहण को शून्य घोषित कर दिया गया