इंदौर का दूषित जल हादसा: स्वच्छता के तमगे के पीछे छुपी भाजपा की संवेदनहीन सत्ता, जवाबदेही से भागती सरकार और बेनकाब होता पूरा सिस्टम
देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा बार-बार पहनकर मंचों पर तालियां बटोरने वाला इंदौर आज एक ऐसे दूषित जल हादसे के कारण राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में है, जिसने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी है, बल्कि मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार, इंदौर की स्थानीय सत्ता और सत्ता-संरक्षित तंत्र—तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
द एक्सपोज़ लाइव न्यूज नेटवर्क | इंदौर
यह हादसा किसी पाइप लाइन के टूटने या तकनीकी चूक भर का मामला नहीं है। यह दूषित प्रशासन, दूषित राजनीति और दूषित संवेदनाओं का परिणाम है—जिसकी कीमत 15 निर्दोष लोगों ने अपनी जान देकर चुकाई।
आरोप–प्रत्यारोप के बीच बुझते गए घरों के चिराग ,हादसे के बाद सरकार और प्रशासन में दोष मढ़ने की होड़ मच गई, लेकिन इस राजनीतिक बचाव-खेल के बीच कई घरों के चिराग असमय बुझ गए। यह साफ़ हो चुका है कि पद पर बने रहने की महत्वाकांक्षा ने 15 लोगों की जान ले ली। यदि समय रहते टूटी नल और ड्रेनेज लाइनों की मरम्मत कर दी जाती, यदि खुदाई के बाद बुनियादी सुधार को प्राथमिकता दी जाती, तो शायद आज 15 परिवार मातम में न डूबे होते।
वरिष्ठ मंत्री की बौखलाहट: जवाबदेही से भागने की शर्मनाक कोशिश
इस पूरे प्रकरण में सबसे शर्मनाक दृश्य तब सामने आया, जब विभागीय वरिष्ठ मंत्री पत्रकारों के सवालों पर बौखलाते और असहज नजर आए। उनके शब्दों से अधिक देश ने उनका अहंकार, असंवेदनशीलता और जिम्मेदारी से पलायन देखा।
और फिर आया सबसे चौंकाने वाला बयान—
“मेरी बात कोई नहीं सुनता।”
सवाल सीधा है—जिस मंत्री के बारे में इंदौर में वर्षों से कहा जाता रहा कि कोई अधिकारी उनकी बात टालने का साहस नहीं करता,आज वही मंत्री स्वयं को बेबस बता रहे हैं। अगर सब कुछ आपके नियंत्रण में था, तो यह हादसा कैसे हुआ? और अगर नियंत्रण में नहीं था, तो अब तक कुर्सी पर क्यों जमे हैं?
महापौर की स्वीकारोक्ति या प्रशासनिक दिवालियापन?
हैरानी यहीं खत्म नहीं होती। महापौर भी यही कहते सुने गए—
“हमारी कोई सुनता नहीं।”
यह कोई भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि नगर निगम के प्रशासनिक पतन की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति है। अब जनता पूछ रही है—अगर महापौर की नहीं सुनी जा रही, अगर मंत्री की नहीं सुनी जा रही, तो फिर अधिकारी आखिर किसकी सुन रहे हैं? या फिर यह मान लिया जाए कि सिस्टम पूरी तरह बेलगाम है और राजनीतिक संरक्षण में मनमानी कर रहा है।
कर्तव्य से पलायन, पद से मोह
मंत्री और महापौर—दोनों का यह कहना कि उनकी कोई नहीं सुनता, एक खतरनाक संकेत है। इसका सीधा अर्थ यह है कि—अधिकारों का भोग पूरे अधिकार से किया जा रहा है, लेकिन कर्तव्यों के निर्वहन की बात आते ही हाथ खड़े कर दिए जाते हैं। यदि जनता की सेवा के लिए बना सिस्टम आपके हाथ “काट” चुका था, तो नैतिकता यही थी कि पहले ही त्यागपत्र दे दिया जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ—और यही अब जनता के लिए शोध और संदेह का विषय बन चुका है।
खुदाई होगी, मौत होगी, फिर सुधार होगा?
याद दिलाना जरूरी है— जब कांग्रेस ने विजय नगर क्षेत्र में घेराव किया था, तो महापौर का कथन था—“बिना खुदाई के विकास कैसे होगा?” सवाल यह नहीं है कि खुदाई हो या न हो।
सवाल यह है कि—
खुदाई के दौरान टूटने वाली नल और ड्रेनेज लाइनों की तत्काल मरम्मत क्यों नहीं होती? सुधार हमेशा मौत के बाद ही क्यों होता है?इतनी बड़ी त्रासदी के बाद अब जाकर गलती पकड़ी गई, अब जाकर सुधार हुआ, अब जाकर नई लाइन के आदेश दिए गए।
क्या हर बार आम जनता की लाशों के बाद ही सिस्टम जागेगा?
सिंधी कॉलोनी की यादें अभी ताज़ा हैं ,नगर निगम की लापरवाही से सिंधी कॉलोनी में कुएं में हुई मौतों को शहर अभी भूला भी नहीं था कि एक और हादसा सामने आ गया। इतिहास खुद को दोहरा रहा है— और प्रशासन हर बार फाइलें, बयान और जांच दिखाकर बच निकलता है।
विपक्ष का मौन: सत्ता का सबसे बड़ा सहयोगी
और इस पूरे मामले में प्रदेश का विपक्ष? वह कहीं नजर नहीं आता। जो विपक्ष मीडिया को “गोदी मीडिया” कहता नहीं थकता, वही विपक्ष आज राष्ट्रीय स्तर के इस हादसे पर रजाई में दुबका बैठा है। इतिहास गवाह है—जब विपक्ष सोता है,तो सत्ता निरंकुश हो जाती है। आज इंदौर का नागरिक सत्ता को भी देख रहा है, और विपक्ष की इस कायर चुप्पी को भी नोट कर रहा है।
यह हादसा केवल दूषित पानी का नहीं है। यह—दूषित राजनीति, दूषित प्रशासन, और दूषित चुप्पी तीनों का घातक संगम है।अब शहर जवाब चाहता है— भाजपा सरकार से भी, इंदौर की सत्ता से भी, और उस विपक्ष से भी, जो जनता के समय पर गायब है।इंदौर अब तमगों से नहीं, जवाबदेही से भरोसा करेगा।