हाईकोर्ट के सामने कुरुक्षेत्र!

क्या किसी ने सोचा था कि न्याय के मंदिर के ठीक सामने अन्याय की महाभारत छिड़ जाएगी? क्या विद्वानों (अभिभाषक) और ज़िम्मेदारों (पुलिस) के बीच ऐसी महासमर की स्थिति बनेगी कि स्वयं धर्मराज भी धर्म संकट में पड़ जाएं?

हाईकोर्ट के सामने कुरुक्षेत्र!

द एक्सपोज़ लाइव न्यूज़ नेटवर्क इंदौर 

"कलियुग के न्याय मंदिर में दुर्योधन का गर्व और भीष्म की विवशता"

पौराणिक कथाओं में पढ़ा था कि जब दुर्योधन ने सभा के बीच द्रौपदी का चीरहरण किया, तब वहाँ बैठे भीष्म, द्रोण, और विदुर तक लाचार दिखे। कौरवों की संगठित शक्ति ने सत्य को कुचलने का प्रयास किया था। लेकिन तब भी न्याय के मंदिर में ऐसा दृश्य नहीं था, जैसा इंदौर में हाईकोर्ट के सामने देखने को मिला। यहाँ न द्रौपदी थी, न कौरव सभा, फिर भी न्याय का चीरहरण होते सबने देखा।

"पुलिस और वकील – कौन कौरव, कौन पांडव?"

महाभारत की लड़ाई में पांडवों और कौरवों की भूमिका स्पष्ट थी, लेकिन हाईकोर्ट के समक्ष संग्राम में कौन पांडव और कौन कौरव, यह तय करना कठिन है। वर्दीधारी अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घिरते दिखे (शायद अपने ऊपर लगे आरोपों को छुपाने के लिए )और विद्वानों की संगठित शक्ति ने अपने बाहुबल का प्रदर्शन किया। प्रश्न यह है कि क्या शक्ति का यह प्रयोग धर्म था?

"युद्धभूमि या न्यायालय परिसर?"

शास्त्रों में कहा गया है कि न्यायालय वह स्थान होता है जहाँ अर्जुन को श्रीकृष्ण का गीता उपदेश मिलता है, जहाँ सत्य और धर्म का निर्णय होता है। लेकिन जब स्वयं न्याय के प्रतिनिधि और सुरक्षा के प्रहरी ही रणक्षेत्र में बदल जाएं, तो न्याय मंदिर की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

"संगठित शक्ति – वरदान या अभिशाप?"

रावण की भी एक संगठित सेना थी, जिसने अहंकार में राम के दूत हनुमान का अपमान किया। परिणाम क्या हुआ, यह सभी जानते हैं। संगठन की शक्ति तब तक वरदान है जब तक उसका प्रयोग धर्म और सत्य के लिए किया जाए। अन्यथा, यही शक्ति विनाश का कारण बनती है।

"न्याय की आत्मा अब भी कुरुक्षेत्र में भटक रही है!"

अब प्रश्न यह है कि इस कुरुक्षेत्र में कौन श्रीकृष्ण बनेगा? कौन न्याय की रक्षा करेगा? क्या न्यायालय इस पर स्वयं संज्ञान लेगा, या फिर यहाँ भी द्रोण और भीष्म की भाँति मौन धारण कर लिया जाएगा?

अब समय है कि धर्मराज स्वयं सामने आएं और दूध का दूध, पानी का पानी करें। अन्यथा, इस न्याय मंदिर की नींव हिलने में देर नहीं लगेगी।

"धर्मसंकट में गृहमंत्री – धृतराष्ट्र की भूमिका से बचें!"

अब यह प्रदेश के मुखिया और गृहमंत्री की परीक्षा की घड़ी है। वे धृतराष्ट्र बनकर आँखें मूंद लेंगे, या धर्मराज की भूमिका निभाते हुए न्याय को स्थापित करेंगे, यह देखना शेष है। महाभारत का युग बदल चुका है, लेकिन न्याय का मूल भाव आज भी वही है। अब देखना है कि इस कथा का अंत क्या होता है – न्याय का पुनर्स्थापन या फिर अधर्म की विजय?