जनवरी से शासकीय ज़मीन पर अतिक्रमण हटाने के आदेश ,क्या होंगे कारगर सिद्ध ?
शासकीय ज़मीन पर माफिया राज, और अदालत में आधा सच! ,पटेल नगर–ताज नगर बने प्रशासनिक संरक्षण की प्रयोगशाला, जनवरी की मुहिम या जनता को नया भ्रम? लोकायुक्त व हाईकोर्ट की दहलीज़ तक पहुंचा मामला,दो से तीन हज़ार रूपए स्क.फ़ीट में बीक रहे प्लॉट्स
द एक्स्पोज़ लाइव न्यूज़ नेटवर्क | इंदौर
जिला प्रशासन द्वारा जनवरी माह से शासकीय एवं नजूल भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने की घोषणा ने एक बार फिर उम्मीद जगाई है। लेकिन इंदौर के खजराना क्षेत्र में स्थित पटेल नगर और ताज नगर की ज़मीनी हकीकत यह सवाल खड़ा कर रही है कि यह घोषणा वास्तविक कार्रवाई का संकेत है या फिर वर्षों से दोहराई जा रही एक और औपचारिकता।
खजराना क्षेत्र में ही लगभग 500 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की शासकीय भूमि पर भू-माफिया का अवैध कब्ज़ा बताया जा रहा है। यह कब्ज़ा किसी छुपे कोने में नहीं, बल्कि प्रशासनिक रिकॉर्ड, न्यायालयीन आदेश और राजस्व दस्तावेज़ों की जानकारी के बावजूद खुलेआम कायम है।
पटेल नगर: सीलिंग के बाद भी “मालिक” कैसे बने माफिया?
सर्वे नंबर 325/3 पेकी (लगभग 5 हेक्टेयर) की भूमि, जिस पर आज पटेल नगर बस चुका है, वर्षों पहले सीलिंग अधिनियम के तहत शासन द्वारा अधिग्रहित की जा चुकी थी। यानी इस भूमि पर मूल मालिकों के अधिकार समाप्त हो चुके थे। इसके बावजूद भू-माफियाओं ने पहले कूट रचित दस्तावेज़ों के सहारे जिला न्यायालय से तीसरे पक्ष के नाम डिक्री हासिल की और फिर उसी फर्जी आधार पर पुराने जमीन मालिकों से—जिनका अब कोई वैधानिक अधिकार नहीं था—उच्च न्यायालय में याचिका क्रमांक WP-1950 दायर करवा दी।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि प्रशासन को सीलिंग, अधिग्रहण और फर्जीवाड़े—तीनों की जानकारी होने के बावजूद—आज तक इस याचिका का प्रभावी विरोध नहीं किया गया। न ही स्थगन आदेश हटवाने के लिए कोई ठोस कानूनी पहल सामने आई। नतीजा यह कि जब भी कार्रवाई की कोशिश होती है, भू-माफिया स्थगन आदेश दिखाता है और प्रशासनिक टीम खाली हाथ लौट जाती है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों से निकटता और रिश्तेदारी के चलते हर काम आसान हो चल पड़ा हे
ताज नगर: बेदखली आदेश भी बेअसर, निर्माण जारी
खजराना के सर्वे नंबर 442/1 एवं 444 (लगभग 8 एकड़) पर बसी ताज नगर कॉलोनी तो प्रशासनिक असहायता की पराकाष्ठा है। यहां तहसीलदार न्यायालय द्वारा बेदखली के स्पष्ट आदेश पारित हो चुके हैं और भू-माफिया पर अर्थदंड भी लगाया गया। इसके बावजूद तथ्यों को छुपाकर एक बार फिर अदालत से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया गया और आज भी वहां अवैध निर्माण धड़ल्ले से जारी है। जहाँ २ वर्षों पहले मात्र ७० मकान बने थे अब वहीँ ४०० के ऊपर माकन बन चुके हैं ,इतना ही नहीं खुद ताज नगर के कर्ताधर्ता न्यायलय में शपथ पत्र दे कर कह चुके हैं की अगर प्रशासन अतिक्रमण हटाने कार्यवाही करता हे तो हमें कोई आपत्ति नहीं हे ,बावजूद इसके कार्यवाही क्यों रोकी जा रही हे यह एक गंभीर शोध का विषय बनता जा रहा हे।
सूत्र बताते हैं कि दोनों ही कॉलोनियों के संचालकों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं, लेकिन उनका राजनीतिक संरक्षण इतना मजबूत है कि न पुलिस सख़्ती दिखा पा रही है, न राजस्व अमला।
प्रशासन की चुप्पी: लापरवाही या मिलीभगत?
अब सबसे बड़ा सवाल—
जब भूमि शासकीय है,
जब सीलिंग के बाद कब्ज़ा शासन का है,
जब बेदखली आदेश मौजूद हैं,
जब अदालत में तथ्य छुपाने के प्रमाण सामने हैं,
तो प्रशासन ने हाईकोर्ट में सशक्त आपत्ति क्यों नहीं दर्ज की?
क्या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई?
क्या तथ्य छुपाने पर अवमानना या धोखाधड़ी की कार्रवाई प्रस्तावित की गई?
यदि नहीं, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि शासकीय संपत्ति के नुकसान में परोक्ष सहभागिता का मामला बनता है।
लोकायुक्त और हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की मांग
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि शासन वास्तव में गंभीर है तो—स्थगन आदेशों को तथ्यात्मक शपथपत्र के साथ तत्काल चुनौती दी जाए,तथ्य छुपाने वालों पर धोखाधड़ी व अवमानना की कार्रवाई हो,जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की लोकायुक्त जांच कराई जाए,अवैध कॉलोनियों में नए निर्माण पर तत्काल प्रतिबंध लगे।
जनवरी की मुहिम: निर्णायक परीक्षा
जनवरी से अतिक्रमण हटाने की घोषणा तब तक खोखली मानी जाएगी, जब तक पटेल नगर और ताज नगर जैसे मामलों में ठोस, पारदर्शी और न्यायालय-समर्थ कार्रवाई नहीं होती। वरना यह साफ संदेश जाएगा कि इंदौर में कानून काग़ज़ों के लिए है और ज़मीन ताकतवरों के लिए।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन सच में माफिया के किले ढहाता है या फिर जनता को एक और तारीख़ थमा दी जाती है?