जनता से त्याग मांग रहे, पर सत्ता से क्या केवल दिखावा मिलेगा?
ईंधन बचाने और सादगी अपनाने की अपील के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या सत्ता केवल प्रतीकात्मक कदमों तक सीमित रहेगी, या राजनीतिक वैभव, सरकारी खर्चों और VIP संस्कृति पर भी वास्तविक संयम दिखाएगी।
छोटे काफिलों और कैमरों के सामने दिखाई जा रही सादगी से आगे बढ़कर क्या सरकार और नेता राजनीतिक वैभव, सरकारी खर्चों और विशेषाधिकारों को छोड़ने को तैयार है?
इंदौर।
देश युद्ध जैसे वैश्विक तनावों के दौर से गुजर रहा है। पेट्रोल-डीजल महंगे हो रहे हैं, विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ रहा है और जनता से ईंधन बचाने की अपील की जा रही है। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने सादगी अपनाने की बात कही, कई नेताओं ने अपने काफिले छोटे किए, कुछ ने इलेक्ट्रिक गाड़ियों में सफर किया, कुछ बसों में बैठकर फोटो खिंचवाते दिखे।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यही “त्याग” है?
क्या केवल 15 गाड़ियों की जगह 5 गाड़ियां कर देने से देश की आर्थिक चुनौती हल हो जाएगी?
कैमरों के सामने सादगी, व्यवस्था में वही तामझाम
सच्चाई यह है कि आज जो कुछ दिख रहा है, उसमें ईमानदार चिंता कम और प्रतीकात्मक राजनीति ज्यादा नजर आती है। ऐसा लगता है मानो नेताओं के बीच यह होड़ लगी हो कि कौन कैमरे के सामने ज्यादा सादा दिख सकता है। कैमरे के सामने छोटी गाड़ी, लेकिन व्यवस्था में वही पुराना सरकारी तामझाम — क्या यही राष्ट्रहित है?
यदि वास्तव में देशहित सर्वोपरि है, तो फिर केवल VIP काफिलों तक बात सीमित क्यों?
यदि हालात इतने गंभीर हैं कि जनता से पेट्रोल बचाने को कहा जा रहा है, तो सरकारों को भी आने वाले एक वर्ष तक सरकारी उत्सवों, भव्य आयोजनों और अनावश्यक सरकारी खर्चों पर रोक लगाने पर विचार करना चाहिए।
करोड़ों के मंच, विशाल पंडाल, स्वागत समारोह, प्रचार अभियान, राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और सरकारी इवेंट्स — क्या इन सबकी भी समीक्षा नहीं होनी चाहिए?
जनता के लिए सादगी, राजनीति के लिए भीड़?
जनता से कहा जा रहा है कि ईंधन बचाइए, लेकिन राजनीति आज भी भीड़ और दिखावे की संस्कृति से बाहर निकलने को तैयार नहीं दिखती।
हजारों गाड़ियों वाली रैलियां, स्वागत में लगने वाले लंबे काफिले, हेलीकॉप्टर यात्राएं और शक्ति प्रदर्शन — क्या यह वही सादगी है जिसकी अपील जनता से की जा रही है?
यदि देशहित सच में सर्वोपरि है, तो फिर डिजिटल रैलियों, ऑनलाइन संबोधनों और सीमित जनसभाओं को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती?
जब कंपनियां, विश्वविद्यालय और अदालतें डिजिटल माध्यम अपना सकती हैं, तो राजनीति अब भी भीड़ की तस्वीरों और टीवी की हेडलाइन पर इतनी निर्भर क्यों है?
त्याग केवल जनता के हिस्से में क्यों?
विदेशी दौरों और बड़े सरकारी डेलिगेशन पर भी अस्थायी रोक लगनी चाहिए। मंत्रियों और अधिकारियों के लग्जरी होटल खर्चों की समीक्षा होनी चाहिए। क्योंकि संकट के समय सबसे पहले सत्ता को अपने विशेषाधिकारों पर संयम दिखाना पड़ता है।
और सबसे बड़ा सवाल उन जनप्रतिनिधियों से है जो स्वयं को “जनसेवक” कहते हैं।
क्या सांसद और विधायक एक वर्ष के लिए अपने वेतन, भत्ते और पेंशन छोड़ने को तैयार हैं? या त्याग केवल आम जनता के हिस्से में ही लिखा जाएगा?
देश संकट के दौर में है। ऐसे समय में जनता केवल भाषण नहीं, उदाहरण देखना चाहती है। छोटे काफिले अच्छी शुरुआत हो सकते हैं, लेकिन यदि बाकी राजनीतिक वैभव जस का तस चलता रहा, तो जनता इसे सादगी नहीं, बल्कि कैमरों के लिए किया गया राजनीतिक प्रदर्शन ही मानेगी।
क्योंकि देशभक्ति कैमरे के सामने सादगी दिखाने से नहीं, बल्कि सत्ता के वास्तविक संयम से साबित होती है।
देशहित में सादगी चाहिए — दिखावा नहीं।