शहर लुटता रहा, सिस्टम चलता रहा: 18 महाघोटालों में सिर्फ प्यादों की बलि; निगमायुक्त, महापौर और MIC प्रभारियों की सीधी जवाबदेही कब?

स्वच्छता के सिरमौर शहर में जनता के खून-पसीने की कमाई पर खुला डाका! 354 संपत्तियों के अवैध नामांतरण से लेकर 100 करोड़ के फर्जी ड्रेनेज बिल, 24 मौतों की भागीरथपुरा जल त्रासदी और करोड़ों की डीजल-यूनिपोल लूट। क्या छोटे क्लर्कों व आउटसोर्स मोहरों पर FIR ठोक कर बच निकलेंगे मलाई काटने वाले बड़े साहब? पढ़िए 2022 से 2026 के बीच इंदौर नगर निगम में हुए सभी 18 महाघोटालों की तारीखवार क्राइम कुंडली, फाइलों का सच और कुर्सी पर बैठे कमिश्नरों व MIC प्रभारियों की सीधी जवाबदेही का सबसे बड़ा इनसाइड एक्सपोज!

शहर लुटता रहा, सिस्टम चलता रहा: 18 महाघोटालों में सिर्फ प्यादों की बलि; निगमायुक्त, महापौर और MIC प्रभारियों की सीधी जवाबदेही कब?
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354 संपत्तियों के नामांतरण फर्जीवाड़े में सिर्फ 6 मोहरों पर FIR; ₹103 करोड़ के ड्रेनेज घोटाले से लेकर 24 मौतों की जल त्रासदी तक 18 महाघपलों का सच, छोटे प्यादों की बलि देकर कब तक बचेंगे मलाईदार चेहरों वाले साहब?

2022 से 2026 तक एक के बाद एक सामने आते रहे निगम के 18 बड़े मामले: 5 निगमायुक्त, महापौर और विभागों के सर्वेसर्वा MIC सदस्य क्या सिर्फ मलाई काटने के लिए थे, जनता के खून-पसीने के पैसे की जवाबदेही कब तय होगी?

एक्सपोज लाइव | स्पेशल रिपोर्ट

स्वच्छता के तमगे की चमक के पीछे इंदौर नगर निगम का एक ऐसा स्याह सच छिपा है, जो सिस्टम में बैठे दलालों, अफसरों और नीति-नियंताओं की पूरी कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करता है। ताजा मामला 354 संपत्तिकर नामांतरण फर्जीवाड़े का है, जहां राज्य साइबर सेल ने छह कर्मचारियों—रियाज अंसारी, संजय यादव, सौरभ तिवारी, संतोष मालवीय, अजय सोलंकी और आउटसोर्स कर्मी सागर पंवार—पर एफआईआर दर्ज कर अपनी कार्रवाई पूरी मान ली। लेकिन सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल यह है कि दो उपायुक्तों की आधिकारिक लॉगिन आईडी से रात 10 से सुबह 3 बजे तक पूरा सिस्टम बेरोकटोक चलता रहा, फाइलों में दलालों के कोडवर्ड दौड़ते रहे और उच्च स्तर पर किसी को भनक तक नहीं लगी।

निगम की यह कार्यशैली नई नहीं है। हर बार जब वित्तीय लूट या फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ होता है, तो गाज सिर्फ निचले स्तर के क्लर्कों और आउटसोर्स कर्मियों पर गिराकर फाइल बंद करने की कोशिश की जाती है, जबकि मलाई काटने वाले और निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले शीर्ष चेहरे जांच के दायरे से बाहर रहते हैं। पिछले चार सालों में इंदौर नगर निगम के अलग-अलग विभागों में फर्जी बिल, रिश्वतकांड, घोस्ट एम्प्लॉई, रिकॉर्ड हेरफेर और टेंडर लापरवाही से जुड़े 18 बड़े मामले दर्ज हुए हैं। यह पूरी फेहरिस्त साफ दिखाती है कि शहर के राजस्व और जनता के पैसों की खुली बंदरबांट पर प्रशासनिक प्रमुखों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की सीधी जवाबदेही से आंखें नहीं चुराई जा सकतीं।

घोटालों की फेहरिस्त: तारीख, दस्तावेज और मामलों का पूरा विवरण

1. बेलदार असलम खान अनुपातहीन संपत्ति प्रकरण (2022 – जुलाई 2026)

₹18,000 मासिक वेतन पाने वाले चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी असलम खान के पास से करोड़ों रुपये की संपत्ति उजागर हुई। ईडी ने फार्महाउस, भूखंड, लक्जरी वाहन और खाते अटैच किए। 10 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट ने जब्त आभूषण वापस लौटाने की अर्जी खारिज कर दी।

2. सिरपुर कैचमेंट अवैध निर्माण एनओसी प्रकरण (अप्रैल 2023 – जनवरी 2024)

सिरपुर तालाब के संवेदनशील कैचमेंट क्षेत्र में नियमों की अनदेखी कर निर्माण स्वीकृतियां जारी की गईं। एनजीटी के निर्देशों पर गठित संयुक्त दल की रिपोर्ट के बाद 15 अवैध निर्माणों को हटाया गया।

3. जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र बैकडोर प्रकरण (जुलाई – अगस्त 2023)

सक्षम अधिकारी की अनुमति और औपचारिक अस्पताल रिकॉर्ड के बिना जोनल स्तर पर 150 से अधिक जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र बैकडेट में जारी किए गए। जांच के बाद तीन आउटसोर्स ऑपरेटरों की सेवाएं समाप्त की गईं।

4. डोर-टू-डोर कचरा वाहन ईंधन (डीजल) अनियमितता (अगस्त – सितंबर 2023)

कार्यशाला में खड़े वाहनों और निर्धारित रूट से कम चले वाहनों के नाम पर डीजल आहरण दर्ज पाया गया। जीपीएस डेटा और फ्यूल लॉग बुक के मिलान में विसंगतियां मिलने पर आंतरिक जांच बैठाई गई।

5. ट्री-गार्ड व पौधरोपण सामग्री खरीद प्रकरण (सितंबर 2023 – फरवरी 2024)

निर्धारित बाजार दर से अधिक मूल्य पर ट्री-गार्ड खरीद और भौतिक सत्यापन में दर्ज संख्या के मुकाबले 5,000 ट्री-गार्ड अनुपस्थित पाए जाने का मामला निगम परिषद में उठा, जिसके बाद भुगतान रोका गया।

6. ट्रेजरी दोहरा भुगतान (डबल पेमेंट) प्रकरण (नवंबर – दिसंबर 2023)

लेखा शाखा द्वारा एक ही कार्य के इनवॉइस पर दो अलग-अलग वाउचर तैयार कर ₹1.82 करोड़ का दोहरा भुगतान जारी किए जाने का मामला आंतरिक ऑडिट में पकड़ा गया, जिसके बाद रिकवरी की कार्रवाई तय हुई।

7. ₹28 करोड़ ड्रेनेज इनवॉइस व ₹56 लाख जीएसटी इनपुट प्रकरण (अप्रैल – मई 2024)

ड्रेनेज संधारण कार्यों में बिना वास्तविक सामग्री आपूर्ति के फर्जी बिल प्रस्तुत किए गए और ₹56 लाख का इनपुट टैक्स क्रेडिट क्लेम किया गया। मामले में एमजी रोड थाने में आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया।

8. ₹103.42 करोड़ का फर्जी ड्रेनेज व सीवरेज बिल घोटाला (अप्रैल 2024 – जुलाई 2026)

धरातल पर ड्रेनेज कार्य के बिना ही 5 फर्मों (किंग, ग्रीन, क्षितिज, जान्हवी, नीव कंस्ट्रक्शन) के नाम पर तैयार फर्जी वर्क ऑर्डर और मेजरमेंट बुक (MB) के जरिए ₹103.42 करोड़ का आहरण किया गया। ईडी ने जून 2026 में पूर्व सहायक यंत्री अभय राठौड़ और ठेकेदारों को गिरफ्तार किया। 20,000 पन्नों की चार्जशीट में ₹59.18 करोड़ की संपत्तियां कुर्क की गईं।

9. केंद्रीय वर्कशॉप स्क्रैप (कबाड़) प्रकरण (जून – जुलाई 2024)

सुभाष नगर कार्यशाला से वाहनों के स्पेयर पार्ट्स और धातु कबाड़ को बिना औपचारिक नीलामी प्रक्रिया के बाहर भेजे जाने का मामला सामने आया, जिसमें सुरक्षाकर्मियों सहित संबंधितों पर पुलिस प्रकरण दर्ज हुआ।

10. सहायक उद्यान अधिकारी चेतन पाटिल अनुपातहीन संपत्ति (17–18 जून 2025)

वर्ष 2004 में मस्टर श्रमिक के रूप में नियुक्त होकर सहायक उद्यान अधिकारी के पद तक पहुंचे कर्मचारी के ठिकानों पर ईओडब्ल्यू के छापे में अचल संपत्तियों के दस्तावेज मिले। इसके बाद नगर निगम प्रशासन ने उसे सेवा से बर्खास्त किया।

11. 354 संपत्तिकर डिजिटल नामांतरण फर्जीवाड़ा (नवंबर 2025 – सितंबर 2026)

बिना किसी विलेख, कोर्ट आदेश या वैध प्रक्रिया के ई-नगर पालिका पोर्टल में सेंध लगाकर 354 संपत्तियों के मूल रिकॉर्ड में बदलाव किए गए। एमपी-सर्ट और एमपीएसईडीसी की जांच में 4 संदिग्ध आईपी एड्रेस मिले। 01 सितंबर 2026 को साइबर सेल में 6 कर्मचारियों पर केस दर्ज हुआ, जबकि इस अवधि में सिस्टम पासवर्ड और लॉगिन आईडी पर नियंत्रण रखने वाले संबंधित उपायुक्तों की भूमिका केवल जांच तक सीमित रही।

12. भागीरथपुरा दूषित जल त्रासदी: 24 मौतें और टेंडर प्रक्रिया (दिसंबर 2025 – अगस्त 2026)

नर्मदा पेयजल लाइन के समीप बिना समुचित सुरक्षा मानकों के शौचालय निर्माण और पाइपलाइन संधारण के टेंडरों में विलंब के चलते सीवेज संदूषण फैला, जिससे 24 नागरिकों की जान गई। अगस्त 2026 में न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट में निगम के संबंधित विभाग की लापरवाही दर्ज की गई।

13. सफाई मित्र फर्जी मस्टर रोल—घोस्ट एम्प्लॉई प्रकरण (मई 2026)

कागजों पर सफाईकर्मियों की संख्या अधिक दर्शाकर नियमित वेतन आहरण का मामला सामने आया। मई 2026 में औचक भौतिक सत्यापन के दौरान 26 ऐसे कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त की गईं जो धरातल पर अनुपस्थित पाए गए थे।

14. अवैध यूनिपोल व विज्ञापन राजस्व हानि (मई – जून 2026)

बीआरटीएस और प्रमुख मार्गों पर लगे यूनिपोल व विज्ञापनों को विभागीय रिकॉर्ड में प्रदर्शित न किए जाने से निगम को करीब ₹11 करोड़ के राजस्व की हानि हुई। यह प्रकरण वर्तमान में ईओडब्ल्यू (EOW) की जांच में है।

15. मस्टर कर्मचारियों का वेतन डायवर्जन घोटाला (जून – जुलाई 2026)

आईटी और स्थापना शाखा के स्तर पर अस्थाई श्रमिकों के एनईएफटी (NEFT) बैंक खातों के विवरण में बदलाव कर वेतन की राशि अन्य खातों में ट्रांसफर की गई। जांच उपरांत दो आईटी कर्मियों की सेवाएं समाप्त की गईं।

16. लोकल फंड ऑडिट व ट्रेजरी प्रकरण (जुलाई 2026)

ईडी की चार्जशीट के अनुसार, बिना काम हुए करोड़ों के भुगतान की प्रक्रिया तब पूरी हुई जब लोकल फंड ऑडिट और रेजिडेंट ऑडिट डिपार्टमेंट के स्तर पर फाइलों को बिना भौतिक सत्यापन के तकनीकी व वित्तीय क्लीयरेंस दिया गया।

17. संबल योजना मृत्यु सहायता घूसकांड (23–24 जुलाई 2026)

संबल योजना के तहत मृतक के परिजनों को मिलने वाली ₹2 लाख की अनुग्रह राशि स्वीकृत करने के एवज में जोन-13 की वार्ड प्रभारी संध्या पथरोड़ और सहयोगी हरभजन सलूजा को लोकायुक्त पुलिस ने ₹5,000 की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया।

18. सहायक राजस्व अधिकारी जितेंद्र पांडेय अनुपातहीन संपत्ति (14 अगस्त 2026)

31 वर्ष की सेवा में लगभग ₹80 लाख की वैध आय के मुकाबले लोकायुक्त छापे में ₹2.53 करोड़ से अधिक की अघोषित संपत्ति (भवन, हॉस्टल व भूखंड) का खुलासा हुआ।

(सभी जानकारियां अलग-अलग स्त्रोतों से)

किसके कार्यकाल में हुए ये मामले? ये रहे शीर्ष पदों पर आसीन जिम्मेदार:

प्रशासनिक और नीतिगत व्यवस्था के तहत किसी भी विभाग में वित्तीय और कार्यात्मक शुचिता बनाए रखने का दायित्व संबंधित कार्यकाल के प्रशासनिक मुखिया और विभागीय प्रभारियों का होता है। 2022 से 2026 के दौरान नगर निगम की व्यवस्था इन शीर्ष पदों के अधीन संचालित रही:

प्रशासनिक मुखिया (2022 से 2026 तक पदस्थ रहे निगमायुक्त):

  • प्रतिभा पाल (तत्कालीन आयुक्त): इनके कार्यकाल के दौरान मस्टर रोल सत्यापन, जन्म-मृत्यु शाखा और जोनल स्तर की प्राथमिक व्यवस्थाओं से जुड़े मामले सामने आए।
  • हर्षिका सिंह (तत्कालीन आयुक्त): इनके कार्यकाल में ड्रेनेज शाखा के फर्जी बिलों के आहरण और लेखा विभाग की प्रक्रियाओं से जुड़ी गंभीर विसंगतियां उजागर हुईं।
  • शिवम वर्मा (तत्कालीन आयुक्त): इनके कार्यकाल के दौरान नगर निगम की विभिन्न प्रशासनिक और विभागीय व्यवस्थाओं से जुड़े मामले सामने आए।
  • दिलीप कुमार यादव (तत्कालीन आयुक्त): इनके कार्यकाल के दौरान भागीरथपुरा पेयजल संदूषण त्रासदी का घटनाक्रम घटित हुआ।
  • क्षितिज सिंघल (वर्तमान निगमायुक्त): इनके कार्यकाल में 354 संपत्तिकर डिजिटल नामांतरण फर्जीवाड़े की साइबर फॉरेंसिक जांच और एफआईआर की प्रक्रिया संपन्न हुई।

नीतिगत नेतृत्व (मेयर-इन-काउंसिल - MIC व संबंधित विभाग):

नगर सरकार की कैबिनेट के रूप में मेयर-इन-काउंसिल (MIC) और महापौर के पास नीति निर्धारण और विभागीय निगरानी का सर्वाधिकार रहा:

  • महापौर पुष्यमित्र भार्गव : (नगर निगम के निर्वाचित मुखिया, जिनके कार्यकाल के दौरान ये सभी 18 वित्तीय व प्रशासनिक प्रकरण दर्ज हुए)।
  • निरंजन सिंह चौहान: प्रभारी, राजस्व विभाग (354 संपत्तियों का अवैध डिजिटल नामांतरण और संपत्तिकर से जुड़े मामलों के विभागीय सर्वेसर्वा)।
  • अभिषेक शर्मा (बबलू): प्रभारी, जलकार्य एवं सीवरेज विभाग (₹103.42 करोड़ का ड्रेनेज फर्जी बिल घोटाला, ₹28 करोड़ जीएसटी मामला और भागीरथपुरा जल त्रासदी से जुड़े विभाग के सर्वेसर्वा)।
  • नंदकिशोर पहाड़िया: प्रभारी, सामान्य प्रशासन विभाग (फर्जी मस्टर रोल, घोस्ट सफाईकर्मी, वेतन डायवर्जन और कर्मचारियों से जुड़े सेवा मामलों के विभागीय सर्वेसर्वा)।
  • अश्विनी शुक्ल: प्रभारी, स्वच्छता एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन विभाग (सफाई मित्र और सफाई व्यवस्था से जुड़े मामलों के विभागीय सर्वेसर्वा)।
  • जीतेंद्र (जीतू) यादव: तत्कालीन प्रभारी, विद्युत एवं यांत्रिकी विभाग (डोर-टू-डोर कचरा वाहन डीजल अनियमितता और केंद्रीय वर्कशॉप स्क्रैप कबाड़ प्रकरण से जुड़े विभाग के तत्कालीन सर्वेसर्वा)।
    (वर्तमान में विद्युत एवं यांत्रिकी विभाग का अलग MIC प्रभारी आधिकारिक सूची में दर्ज नहीं है।)
  • राजेंद्र राठौड़: प्रभारी, लोक निर्माण एवं पार्क विभाग (ट्री-गार्ड व पौधरोपण सामग्री खरीद प्रकरण से जुड़े विभाग के सर्वेसर्वा)।
  • राजेश उदावत: प्रभारी, योजना एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (डिजिटल सिस्टम और आईटी से जुड़ी व्यवस्थाओं वाला विभाग)।
  • प्रिया डांगी: प्रभारी, वित्त एवं लेखा विभाग (ट्रेजरी, भुगतान और लेखा प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों के विभागीय सर्वेसर्वा)।
  • मनीष शर्मा (मामा): प्रभारी, गरीबी उपशमन एवं समाज कल्याण विभाग (संबल योजना मृत्यु सहायता अनुग्रह राशि प्रकरण के विभागीय सर्वेसर्वा)।
  • राकेश जैन: प्रभारी, यातायात एवं परिवहन विभाग।

सवाल प्रशासनिक जवाबदेही का: कार्रवाई सिर्फ नीचे तक क्यों?

जब ₹103.42 करोड़ के कथित फर्जी बिल पास हो रहे थे, जब एक ही काम के लिए दो बार भुगतान हो रहा था, जब कर्मचारियों के बैंक खाते बदलकर वेतन दूसरी जगह भेजा जा रहा था और जब 354 संपत्तियों के राजस्व रिकॉर्ड में कथित तौर पर अनधिकृत बदलाव किए गए—उस पूरे दौर में संबंधित विभागों के प्रशासनिक और नीतिगत प्रमुख पदों पर जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद थे।

भागीरथपुरा में दूषित पानी की त्रासदी हुई तो सवाल सिर्फ उस कर्मचारी का नहीं था जिसने किसी फाइल पर हस्ताक्षर किए होंगे। सवाल उस पूरी व्यवस्था का था, जो शहर को सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार थी।

₹103.42 करोड़ के फर्जी बिलों का मामला सामने आया तो सवाल सिर्फ बिल बनाने वाले या ठेकेदारों का नहीं था। सवाल उन अधिकारियों और विभागों का भी था, जिनकी प्रक्रिया से होकर करोड़ों रुपये के भुगतान मंजूर हुए।

354 संपत्तियों के रिकॉर्ड बदले जाने का मामला सामने आया तो सवाल सिर्फ छह कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सवाल यह भी है कि जिन लॉगिन आईडी, पासवर्ड और डिजिटल सिस्टम के जरिए यह सब हुआ, उनकी निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि -

  • क्या हर बार निचले स्तर के कर्मचारियों पर एफआईआर, निलंबन या सेवा समाप्ति की कार्रवाई कर देने से ऊपर के स्तर की प्रशासनिक जवाबदेही खत्म हो जाती है?
  • क्या विभागीय प्रभारी सिर्फ विभाग मिलने तक जिम्मेदार हैं और विभाग में होने वाली गड़बड़ियों की राजनीतिक जवाबदेही से उनका कोई संबंध नहीं?
  • क्या निगमायुक्त और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ जांच के आदेश देने तक सीमित रहेंगे, या यह भी देखा जाएगा कि उनके अधीन काम करने वाली व्यवस्था में गड़बड़ी लंबे समय तक चलती कैसे रही?

Expose Live Take

इंदौर नगर निगम के पिछले चार सालों के इन 18 मामलों की पूरी टाइमलाइन एक ही सवाल खड़ा करती है—

जांच एजेंसियां अलग-अलग मामलों में अपनी कार्रवाई कर रही हैं और किसी भी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी जांच और अदालत की प्रक्रिया से तय होगी। लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक जवाबदेही का सवाल अपनी जगह बना हुआ है।

शहर के लोगों को यह जानने का अधिकार है कि जिस नगर निगम पर हजारों करोड़ रुपये के बजट, शहर के राजस्व, सड़क, पानी, सफाई, सीवरेज और नागरिक सुविधाओं की जिम्मेदारी है, वहां लगातार सामने आने वाली गड़बड़ियों के लिए आखिर जवाब कौन देगा?