मप्र का सबसे बड़ा बाइक टैक्सी स्कैम: 1.94 करोड़ बाइकों के बीच लीगल सिर्फ 356, सरकार को ₹40 करोड़ का चूना

कहीं अगली राइड आपकी आखिरी गलती न बन जाए? MP में दौड़ रहीं 1.94 करोड़ बाइकों के बीच लीगल बाइक टैक्सी सिर्फ 356 हैं! जानिए ₹40 की सस्ती राइड में छिपा वो खौफनाक 'T&C फ्रॉड', जिसने मप्र हाईकोर्ट से लेकर RTO तक के होश उड़ा दिए हैं।

मप्र का सबसे बड़ा बाइक टैक्सी स्कैम: 1.94 करोड़ बाइकों के बीच लीगल सिर्फ 356, सरकार को ₹40 करोड़ का चूना

40 रुपए की राइड में 'नो-इंश्योरेंस' का जानलेवा खेल: बिना VLTD ट्रैकिंग के चल रहीं गाड़ियां; ऐप कंपनियों का 'T&C फ्रॉड' ऐसा कि हादसे पर न पैसेंजर को क्लेम, न चालक को कवर

RTO की 7 साल पुरानी नाकामी और कंपनियों की मनमानी: हाईकोर्ट के अवैध घोषित करने के बाद भी 40 करोड़ का टैक्स गबन; बेरोजगार युवाओं से 30% कमीशन वसूली का खुला धंधा

भोपाल/इंदौर।

कॉलेज छूटने की जल्दी में 40 की रैपिडो, ओला या उबर बुक कर हेलमेट लगाकर निकलना जितना 'कूल' लगता है, उसके पीछे का सच उतना ही खौफनाक है। अगर आपकी राइड वाली बाइक की नंबर प्लेट पीली नहीं, बल्कि सफेद है, तो जान लीजिए कि आप हर रोज बिना किसी इंश्योरेंस, बिना पुलिस ट्रैकिंग और बिना किसी लीगल सुरक्षा के सीधे अपनी जान दांव पर लगा रहे हैं।

भोपाल में सड़कों पर उतरी टैक्सी यूनियनों का चक्काजाम सिर्फ ड्राइवरों का विरोध नहीं है, बल्कि उस 7 साल पुराने 'कॉर्पोरेट और प्रशासनिक गठजोड़' का पर्दाफाश है, जिसने नियमों को कागजों में दफन कर मप्र की सड़कों को अवैध धंधे का अड्डा बना दिया।

डेटा में खुला झूठ: लीगल कमर्शियल बाइक ढूंढना 'मिशन इंपॉसिबल'

मध्य प्रदेश परिवहन विभाग के आधिकारिक आंकड़े और जमीनी हकीकत का अंतर किसी भी सिस्टम को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी है:

वाहन श्रेणी (MP परिवहन विभाग का आधिकारिक डेटा)

पंजीकृत संख्या

निजी मोटरसाइकिल / स्कूटर (Non-Transport - White Plate)

1,94,77,151

निजी मोपेड (Non-Transport - Moped)

9,27,068

निजी दोपहिया विद साइड कार

1,172

लीगल व्यावसायिक बाइक टैक्सी (Used For Hire - Yellow Plate)

सिर्फ 356

व्यावसायिक दोपहिया साइड कार (Transport)

4

व्यावसायिक दोपहिया विद ट्रेलर (Transport)

2

  • जमीनी हकीकत: भोपाल में करीब 10,000 से 12,000 और पूरे मध्य प्रदेश (इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर) में 50,000 से अधिक निजी बाइकें ओला, उबर, रैपिडो और इनड्राइव पर दौड़ रही हैं। यानी सड़कों पर चल रही 99% से ज्यादा बाइक टैक्सियां पूरी तरह गैरकानूनी हैं।

1. सरकारी खजाने पर डाका: हर साल 40 करोड़ के टैक्स की चोरी

एक वैध कमर्शियल गाड़ी सरकार को भारी कमर्शियल रोड टैक्स, परमिट फीस, फिटनेस फीस और ट्रेड सर्टिफिकेट का पैसा देती है। निजी नंबर प्लेट का अवैध इस्तेमाल करवाकर एग्रीगेटर कंपनियां हर साल मध्य प्रदेश के सरकारी खजाने को करीब 25 करोड़ से 40 करोड़ के रेवेन्यू का सीधा चूना लगा रही हैं। यह वह टैक्स है जो जनता के विकास में लगना था, लेकिन मल्टी-मिलियन डॉलर टेक कंपनियों के मुनाफे और कमीशन में बदल रहा है।

2. ऐप का 'Terms & Conditions' फ्रॉड: हादसा होते ही पल्ला झाड़ने का लीगल गेम

ऐप कंपनियां हर राइड पर चालक से 20 से 30 फीसदी तक कमीशन वसूलती हैं। लेकिन जब यूजर या राइडर ऐप इंस्टॉल करता है, तो बहुत बारीक अक्षरों में एक क्लॉज जोड़ दिया जाता है:

"कंपनी केवल एक डिजिटल एग्रीगेटर/बिचौलिया है। यात्रा के दौरान किसी भी दुर्घटना, कानूनी उल्लंघन, चालान या आपराधिक घटना के लिए कंपनी जिम्मेदार नहीं होगी।"

यानी जैसे ही कोई हादसा होता है या गाड़ी जब्त होती है, कंपनियां हाथ खड़े कर लेती हैं और सारा कानूनी व वित्तीय बोझ उस 20-22 साल के बेरोजगार युवा चालक पर डाल दिया जाता है।

3. पैनिक बटन और 24x7 जीपीएस का फर्जीवाड़ा: सुरक्षा शून्य

केंद्रीय मोटर वाहन गाइडलाइन के अनुसार, किसी भी कमर्शियल सवारी वाहन में पुलिस कंट्रोल रूम से सीधे जुड़ा 'व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम (VLTD)' और 'इमरजेंसी पैनिक बटन' होना अनिवार्य है। निजी बाइक टैक्सियों में यह पूरी तरह नदारद है। ऐप में दिखने वाला जीपीएस सिर्फ कंपनी के सर्वर पर चलता है। अगर रास्ते में कोई अनहोनी हो जाए, तो पुलिस के पास रियल-टाइम डेटा का कोई सीधा एक्सेस नहीं होता।

4. युवाओं का शोषण: 'फ्लेक्सी जॉब' के नाम पर डार्क इकॉनमी

कॉलेज स्टूडेंट्स और बेरोजगार युवाओं को "अपनी बाइक से महीने के 25,000 कमाओ" का सब्जबाग दिखाकर जोड़ा जाता है। हकीकत यह है कि पेट्रोल का खर्च, बाइक का मेंटेनेंस और कंपनी का भारी कट कटने के बाद चालक के हाथ में दिहाड़ी से भी कम पैसा बचता है। ऊपर से बिना कमर्शियल परमिट के गाड़ी चलाने का कानूनी रिस्क और चालान का डर अलग।

7 साल की क्रोनोलॉजी: 2019 का वादा और 2026 में हाईकोर्ट का डंडा

  • 8 अगस्त 2019 (कागजी फरमान): इंदौर आरटीओ जितेंद्र सिंह रघुवंशी ने दावा किया था कि बाइक टैक्सी के लिए 'कमर्शियल रजिस्ट्रेशन' (Yellow Plate) और 'रेंट-ए-बाइक' स्कीम की गाइडलाइन जल्द लागू होगी। 7 साल बीते, पर नीति फाइलों से बाहर नहीं आई।
  • इंदौर हाईकोर्ट का कड़ा रुख: अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि निजी नंबर प्लेट (व्हाइट प्लेट) से सवारियां ढोना मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 66 का खुला उल्लंघन और पूरी तरह अवैध है।
  • क्राइम और लाइसेंस निरस्ती: इंदौर में ओला का बाइक टैक्सी लाइसेंस निरस्त हो चुका है और रैपिडो का रिन्यू नहीं हुआ। एक नाबालिग से हुई दुष्कर्म की गंभीर वारदात के बाद पुलिस और आरटीओ ने ऐप ब्लॉक करने की कानूनी प्रक्रिया शुरू की।
  • जुलाई 2025 की गाइडलाइन का पेंच: केंद्र सरकार ने निजी वाहनों की राइड-शेयरिंग के विकल्प दिए, लेकिन मध्य प्रदेश में सुरक्षा मानकों और राज्य नीति के अभाव में इसे मंजूरी नहीं मिल पाई।

टैक्सी यूनियनों का गुस्सा: 'हम टैक्स भरें, ये जेब भरें'

टैक्सी यूनियन कल्याण समिति के नफीस उद्दीन का कहना है कि कमर्शियल कैब और ऑटो चालक परमिट, फिटनेस, कमर्शियल इंश्योरेंस और टैक्स के नाम पर हर साल जेब ढीली करते हैं। वहीं एग्रीगेटर कंपनियां बिना एक रुपया चुकाए निजी वाहनों से समानांतर अवैध ट्रांसपोर्ट नेटवर्क चला रही हैं, जिससे नियम मानने वाले चालकों का रोजगार छिन गया है।

हादसा हुआ तो बीमा कंपनियां नहीं देंगी एक धेला

निजी (सफेद नंबर प्लेट) बाइक का कमर्शियल इस्तेमाल बीमा पॉलिसी की मूल शर्तों का उल्लंघन है। दुर्घटना की स्थिति में बीमा कंपनियां क्लेम सीधे रिजेक्ट कर देती हैं। इसका मतलब साफ है—हादसे में जान-माल का नुकसान होने पर न तो चालक को कोई क्लेम मिलेगा और न ही पीछे बैठे यात्री को।

Expose Live Take

जब तक परिवहन विभाग केवल दिखावे की जब्ती छोड़कर इन टेक कंपनियों पर सख्त नीति और अनिवार्य कमर्शियल रजिस्ट्रेशन (येलो प्लेट) लागू नहीं करवाता, तब तक हर ओटीपी शेयर करने के साथ यात्री और चालक दोनों एक जानलेवा धोखे का शिकार होते रहेंगे।