नगर निगम का नया फरमान, 1 लाख से कम टैक्स जमा करने पर चेक बंद, सवाल यह कि फैसला किसका और कहां हैं जनप्रतिनिधि?
इंदौर नगर निगम ने 1 लाख रुपये से कम टैक्स भुगतान पर चेक बंद कर दिया है। राजस्व के नाम पर लिए फैसले पर सवाल उठे कि अधिकार किसका है और जनप्रतिनिधि कहां हैं।
राजस्व के नाम पर भुगतान व्यवस्था बदली, लेकिन सवाल यह कि शहर के लोगों पर असर डालने वाले फैसलों में महापौर, विधायकों और पार्षदों की भूमिका कितनी? अफसरों के तानाशाह आदेश पर इंदौर शहर चलेगा या जनप्रतिनिधियों की निगरानी में?
इंदौर।
नगर निगम के असेसमेंट/सर्वे (राजस्व) विभाग से 8 अगस्त को जारी एक आदेश ने इस सवाल को और बड़ा कर दिया है। आदेश के मुताबिक अब 1 लाख से कम राशि के संपत्तिकर, जलकर और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन उपभोक्ता प्रभार के भुगतान के लिए चेक स्वीकार नहीं किए जाएंगे। ऐसे भुगतान के लिए नकद, ऑनलाइन भुगतान और डिमांड ड्राफ्ट का विकल्प रखा गया है। वहीं 1 लाख से अधिक की राशि के भुगतान में चेक की सुविधा जारी रहेगी।
निगम ने इस बदलाव के पीछे चेक बाउंस होने से राजस्व वसूली प्रभावित होने और ऑनलाइन भुगतान की सुविधा उपलब्ध होने का तर्क दिया है। आदेश अपर आयुक्त आकाश सिंह के डिजिटल हस्ताक्षर से जारी हुआ है और इसमें आयुक्त की स्वीकृति का उल्लेख है।
फैसला प्रशासनिक तर्क से सही हो सकता है। लेकिन असली सवाल कहीं बड़ा है—क्या शहर के नागरिकों से जुड़े ऐसे फैसलों पर जनप्रतिनिधियों की भी कोई भूमिका है?
और यहीं से बड़ा सवाल उठता है—शहर को कौन चला रहा है, चुने हुए जनप्रतिनिधि या अफसर?
नगर निगम ने इस बदलाव के पीछे चेक बाउंस होने से राजस्व वसूली प्रभावित होने और ऑनलाइन भुगतान की सुविधा उपलब्ध होने का तर्क दिया है। आदेश अपर आयुक्त आकाश सिंह के डिजिटल हस्ताक्षर से जारी हुआ है और इसमें आयुक्त की स्वीकृति का उल्लेख है।
फैसला प्रशासनिक तर्क से सही हो सकता है। लेकिन असली सवाल कहीं बड़ा है—क्या शहर के नागरिकों से जुड़े ऐसे फैसलों पर जनप्रतिनिधियों की भी कोई भूमिका है?
अब यह सवाल तेजी से उठना चाहिए—शहर को कौन चला रहा है, चुने हुए जनप्रतिनिधि या अफसर?
जिनके लिए चेक ही सरल माध्यम, वे क्या करेंगे..?
सवाल सिर्फ चेक बंद करने का नहीं है। सवाल यह भी है कि इस फैसले से उन नागरिकों का क्या होगा, जिनके लिए चेक ही सबसे सुरक्षित और व्यावहारिक भुगतान माध्यम है?
सवाल यह भी है कि जिस व्यवस्था को निगम डिजिटल और आसान बता रहा है, वह उन बुजुर्गों और ऐसे करदाताओं के लिए कितनी आसान है जो डिजिटल भुगतान नहीं करते?
इंदौर में हर नागरिक डिजिटल भुगतान का जानकार नहीं है। शहर में ऐसे कई बुजुर्ग दंपति हैं, जो आज भी लेन-देन के लिए चेक या नकद भुगतान पर निर्भर हैं। कई बुजुर्ग खुद बैंक या नगर निगम कार्यालय तक नहीं जा सकते। ऐसे में वे किसी परिचित या दूसरे व्यक्ति के हाथ नकद राशि भेजते हैं, लेकिन कई मामलों में रास्ते में रकम गायब होने या पैसा जमा नहीं होने की व्यवहारिक परेशानी भी सामने आती है। अब ऐसे करदाताओं के सामने नगर निगम का नया आदेश एक और मुश्किल खड़ी कर सकता है।
अगर चेक नहीं चलेगा तो बुजुर्ग करदाता डीडी बनवाने के लिए बैंक तक कैसे पहुंचेंगे? डीडी बनवाने में लगने वाला बैंक कमीशन कौन देगा? कई मामलों में डीडी बनवाने की प्रक्रिया में एक से डेढ़ घंटे लग सकते हैं और कुछ बैंकों में आधा दिन तक निकल जाता है। ऐसे में सिर्फ भुगतान का विकल्प बदल देना क्या नागरिक सुविधा का समाधान है?
1 लाख की सीमा से छोटा सवाल नहीं
यह महज चेक स्वीकार करने या नहीं करने का मामला नहीं है।
नगर निगम खुद मानता है कि सभी नागरिक नेट बैंकिंग या डिजिटल भुगतान के तकनीकी जानकार नहीं हैं। आदेश में इसी वजह से एक लाख रुपये से अधिक की राशि के लिए चेक की सुविधा बनाए रखने की बात कही गई है।
तो सवाल यह है कि 1 लाख से कम राशि वाले नागरिकों के लिए चेक बंद करने से कितने लोगों को परेशानी होगी?
क्या वरिष्ठ नागरिकों, छोटे कारोबारियों, ऐसे करदाताओं जिनके पास डिजिटल भुगतान की सुविधा या जानकारी सीमित है, उनके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई?
क्या इस फैसले से पहले नागरिक संगठनों, पार्षदों या महापौर परिषद के स्तर पर चर्चा हुई?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह फैसला सिर्फ अफसरों की फाइल पर तय हुआ या निर्वाचित परिषद की भी इसमें कोई भूमिका थी?
गांधी जी के तीन बंदर... लेकिन इंदौर में नया संस्करण?
इंदौर की राजनीति में भाजपा के पास संख्या की कमी नहीं है।
शहर से भाजपा के कई विधायक हैं। सांसद है। प्रदेश सरकार में इंदौर से प्रभावशाली मंत्री हैं। नगरीय विकास एवं आवास विभाग भी ऐसे ही नेतृत्व के हाथ में है, जिसके लिए नगर निकायों का काम सीधे जिम्मेदारी का विषय है।
फिर नगर निगम से जुड़े फैसलों पर सार्वजनिक रूप से सवाल कौन पूछेगा?
जनता के प्रतिनिधि अगर नागरिकों की परेशानी पर आवाज नहीं उठाएंगे तो फिर जनता किसके पास जाएगी?
यह स्थिति कहीं-कहीं गांधी जी के तीन बंदरों की याद दिलाती है—न कुछ बोलो, न कुछ सुनो, न कुछ देखो।
हालांकि इंदौर के मामले में इसका नया संस्करण नजर आता है—
- न जनहित में बोलेंगे
- न अफसरों से सवाल करेंगे
- न फैसलों पर कुछ करेंगे
और अगर यही स्थिति है तो फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की भूमिका आखिर बचती क्या है?
अफसरशाही मजबूत होती गई तो जवाबदेही किसकी?
अफसरों का काम नियमों और प्रशासनिक व्यवस्था को लागू करना है। फैसलों को कानून और नियमों के दायरे में लेना उनकी जिम्मेदारी है।
लेकिन लोकतंत्र में चुने हुए प्रतिनिधियों की भूमिका भी सिर्फ उद्घाटन, भूमिपूजन, कार्यक्रम और स्वागत तक सीमित नहीं हो सकती।
नगर निगम में पार्षद जनता से वोट लेकर आते हैं। महापौर पूरे शहर का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसलिए जब कोई ऐसा प्रशासनिक फैसला सामने आता है जिसका सीधा असर हजारों करदाताओं पर पड़ सकता है, तो जनता यह उम्मीद करती है कि उसके प्रतिनिधि सवाल पूछेंगे।
सवाल सिर्फ चेक का नहीं, सिस्टम का है
आज मामला 1 लाख से कम के चेक का है। कल कोई दूसरा प्रशासनिक आदेश आएगा।
फिर सवाल यही रहेगा कि क्या निगम में चुनी हुई परिषद सिर्फ औपचारिक संस्था बनकर रह जाएगी और वास्तविक निर्णय अफसरों के स्तर पर होते रहेंगे?
अगर ऐसा नहीं है तो जनप्रतिनिधियों को सामने आकर बताना चाहिए कि इस आदेश पर उनकी क्या राय है।
अगर वे इस फैसले से सहमत हैं तो खुलकर समर्थन करें। अगर असहमत हैं तो जनता के सामने अपनी आपत्ति रखें।
लेकिन खामोशी सबसे खराब विकल्प है। क्योंकि खामोशी से जनता को यही संदेश जाता है कि सब कुछ ठीक चल रहा है।
महापौर कहते हैं—अफसर उनसे पटरी बैठाएं
महापौर पुष्यमित्र भार्गव अपने कार्यकाल के चार साल पूरे होने पर यह संदेश दे चुके हैं कि उन्हें अफसरों से पटरी बैठाने की जरूरत नहीं, बल्कि अफसरों को उनसे पटरी बैठानी चाहिए।
बात सुनने में दमदार लगती है। लेकिन जमीन पर तस्वीर क्या है?
अगर नगर निगम के स्तर पर नागरिकों की भुगतान व्यवस्था तक बदलने वाले आदेश जारी हो रहे हैं और जनप्रतिनिधियों की ओर से उस पर कोई सार्वजनिक बहस, आपत्ति या सवाल दिखाई नहीं देता, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जनप्रतिनिधियों की ताकत कहां इस्तेमाल हो रही है?
महापौर की बात और जमीन की हकीकत
महापौर कहते हैं कि अफसरों को उनसे पटरी बैठानी चाहिए।
तो फिर शहर यह देखना चाहता है कि अफसरशाही और जनप्रतिनिधित्व के बीच पटरी वास्तव में किस दिशा में जा रही है।
- क्या अफसर जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह हैं?
- क्या जनप्रतिनिधि अफसरों से सवाल पूछ रहे हैं?
- क्या निगम की नीतियां नागरिकों की सुविधा को केंद्र में रखकर बन रही हैं?
- या फिर फाइल पर आदेश निकलता है और शहर को बाद में पता चलता है?
इंदौर ने स्वच्छता में देश को रास्ता दिखाया है। प्रशासनिक नवाचार में मिसाल बनाई है। लेकिन किसी शहर की असली मजबूती सिर्फ साफ सड़कों और चमकते कार्यक्रमों से नहीं होती।
शहर तब मजबूत होता है जब अफसर काम करें, जनप्रतिनिधि निगरानी करें और जनता सवाल पूछ सके।
अगर अफसर ही फैसला करें, जनप्रतिनिधि चुप रहें और जनता सिर्फ आदेश पढ़कर उसे स्वीकार करे, तो फिर लोकतंत्र में जनता की भूमिका आखिर क्या रह जाएगी?
बिल्कुल। इस मामले में सिर्फ 1 लाख की सीमा नहीं, बल्कि फैसला किसने लिया, किस अधिकार से लिया, जनप्रतिनिधियों की भूमिका क्या रही और नागरिकों पर इसका असर क्या होगा—सारे जरूरी सवाल एक ही बॉक्स में आने चाहिए।
चेक बंद करने का फैसला... लेकिन सवालों के जवाब कौन देगा?
नगर निगम ने 1 लाख से कम के टैक्स और शुल्क भुगतान पर चेक बंद कर दिया। निगम का तर्क है कि चेक बाउंस होने से राजस्व वसूली प्रभावित होती है। लेकिन इस फैसले के पीछे कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब शहर को मिलना चाहिए और इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए —
- क्यों चेक बंद हुआ? निगम ने 1 लाख से कम भुगतान पर चेक का विकल्प क्यों खत्म किया?
- किसने फैसला लिया? क्या फैसला आयुक्त स्तर पर हुआ, एमआईसी की मंजूरी ली गई या नगर निगम परिषद को भी विश्वास में लिया गया?
- 1 लाख की सीमा किस नियम के आधार पर तय की गई? क्या कानून, बायलॉ, वित्तीय नियम या शासन के किसी आदेश में इसका प्रावधान है?
- क्या सिर्फ आयुक्त की मंजूरी से भुगतान का माध्यम बदला जा सकता है? अगर हां, तो इसकी वैधानिक शक्ति किस प्रावधान से आती है?
- क्या यह नया नियम है या पहले से लागू किसी बायलॉ का हिस्सा? अगर नया है तो इसकी वैधानिक प्रक्रिया क्या अपनाई गई?
- क्या एमआईसी और नगर निगम परिषद की मंजूरी ली गई? अगर नहीं, तो क्यों?
- क्या राज्य सरकार या नगरीय विकास एवं आवास विभाग से अनुमति या पुष्टि ली गई? अगर ली गई है तो उसका आदेश सार्वजनिक किया जाए।
- कितने चेक बाउंस हुए? पिछले 1, 3 और 5 साल में कितने चेक अनादरित हुए और उनकी कुल राशि कितनी थी?
- कितना राजस्व प्रभावित हुआ? चेक बाउंस के कारण निगम को वास्तविक आर्थिक नुकसान कितना हुआ?
- क्या कुछ चेक बाउंस होने की वजह से सभी छोटे करदाताओं के लिए चेक बंद करना जरूरी था?
- क्या कोई बीच का रास्ता हो सकता था? चेक बाउंस रोकने के लिए सत्यापन, पेनल्टी, अतिरिक्त शुल्क या जोखिम आधारित व्यवस्था जैसे विकल्पों पर विचार हुआ?
- नागरिकों को होने वाली संभावित परेशानी का आकलन किसने किया? खासकर वरिष्ठ नागरिकों और डिजिटल भुगतान में असुविधा वाले करदाताओं की सुविधा का क्या?
- जब निगम खुद मानता है कि हर नागरिक नेट बैंकिंग का उपयोग नहीं कर सकता, तो फिर छोटे भुगतान में चेक क्यों बंद किया गया?
- 1 लाख से कम भुगतान के लिए डीडी बनवाना कितना आसान है? बैंक शुल्क और अतिरिक्त प्रक्रिया का भार कौन उठाएगा?
- नकद भुगतान जारी रखना कितना सुरक्षित और पारदर्शी है? जब निगम खुद डिजिटल भुगतान को सुरक्षित और त्वरित बता रहा है?
- क्या सभी जोन कार्यालयों में ऑनलाइन भुगतान की व्यवस्था सुचारु है? अगर किसी नागरिक का डिजिटल भुगतान नहीं हो पाता तो तत्काल विकल्प क्या है?
- क्या नागरिकों को इस बदलाव की पहले से सूचना दी गई? या 8 अगस्त के आदेश के बाद सीधे व्यवस्था बदल दी गई?
- क्या इस फैसले से निगम का राजस्व वास्तव में बढ़ेगा? अगर हां, तो इसका कोई आकलन या अध्ययन हुआ है?
- और सबसे बड़ा सवाल—जनप्रतिनिधि कहां हैं? लाखों करदाताओं को प्रभावित करने वाले इस फैसले पर महापौर, एमआईसी, पार्षद, विधायक और शहर के अन्य जनप्रतिनिधियों ने क्या कहा?
जनता का पैसा है, जनता को जवाब भी चाहिए।
नगर निगम को सिर्फ यह बताना काफी नहीं कि चेक क्यों बंद किया गया। उसे यह भी बताना होगा कि 1 लाख की सीमा तय करने का अधिकार किसने दिया, किस नियम के तहत दिया और इस फैसले में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की भूमिका क्या रही?
Expose Live Take
1 लाख से कम भुगतान पर चेक बंद करने का नगर निगम का फैसला प्रशासनिक कारणों से बताया गया है। लेकिन इस आदेश ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—इंदौर में अफसर फैसले ले रहे हैं और जनप्रतिनिधि सिर्फ उन्हें स्वीकार करने की भूमिका में हैं?
अगर ऐसा नहीं है तो महापौर, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों को सामने आना चाहिए।
क्योंकि जनता ने उन्हें अफसरों की खामोशी देखने के लिए नहीं, जनता की आवाज बनने के लिए चुना है।
वरना सवाल उठेगा ही— इंदौर में अफसरशाही हावी है या जनप्रतिनिधित्व?
और अगर जनप्रतिनिधित्व मजबूत है, तो फिर इतनी खामोशी क्यों?
राम ही मालिक है!
