राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड में पहुंचे शंकर लालवानी... लेकिन क्या 6 साल में सामाजिक सुरक्षा का वादा पूरा हुआ?
इंदौर सांसद शंकर लालवानी राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के सदस्य बने हैं। लेकिन क्या इससे इंदौर और मध्य प्रदेश के असंगठित श्रमिकों, गिग वर्कर्स और छोटे कामगारों को वास्तविक लाभ मिलेगा? जानिए बोर्ड की भूमिका, अब तक की नीतियों और जमीनी हकीकत का Expose Live विश्लेषण।
2020 में कानून बना, करोड़ों श्रमिकों का e-Shram पोर्टल पर पंजीकरण हुआ, कई योजनाएं शुरू हुईं, पर गिग वर्कर्स की हालत नहीं सुधरी
अब इंदौर के सांसद शंकर लालवानी बोर्ड के सदस्य बने हैं, सवाल यह है कि- यह नियुक्ति सिर्फ सम्मान है या उन लाखों श्रमिकों के लिए बदलाव की शुरुआत, जिन्हें आज भी सामाजिक सुरक्षा अधूरी मिल रही है?
इंदौर।
इंदौर के सांसद शंकर लालवानी को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का सदस्य मनोनीत किया है। यह वही वैधानिक बोर्ड है, जो असंगठित श्रमिकों, गिग व प्लेटफॉर्म वर्कर्स, छोटे व्यापारियों और स्वरोजगार से जुड़े करोड़ों लोगों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी नीतियों पर केंद्र सरकार को सुझाव देता है। पहली नजर में यह इंदौर के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व लगता है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जिस बोर्ड का उद्देश्य श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना है, उसके गठन के छह साल बाद जमीनी स्तर पर कितना बदलाव दिखाई देता है? क्या इंदौर और मध्य प्रदेश के लाखों श्रमिकों तक योजनाओं का वास्तविक लाभ पहुंचा है, या सामाजिक सुरक्षा अब भी कागजों और पोर्टलों तक सीमित है?
राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड और इसकी भूमिका क्या है?
राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का गठन Code on Social Security, 2020 के तहत किया गया था। इसकी अध्यक्षता केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री करते हैं, जबकि उपाध्यक्ष श्रम एवं रोजगार सचिव होते हैं। बोर्ड में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, नियोक्ताओं, श्रमिक संगठनों और अन्य प्रतिनिधियों के साथ अब सांसद शंकर लालवानी भी सदस्य होंगे।
यह बोर्ड सीधे कोई योजना लागू नहीं करता और न ही बजट आवंटित करता है। इसकी भूमिका सरकार को यह सुझाव देना है कि असंगठित श्रमिकों, गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए पेंशन, बीमा, स्वास्थ्य सुरक्षा, मातृत्व लाभ, कौशल विकास और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को कैसे बेहतर बनाया जाए।
छह साल पहले किया वादा, कितना पूरा हुआ?
2020 में सामाजिक सुरक्षा संहिता लागू होने के बाद पहली बार Gig Workers और Platform Workers को कानूनी पहचान मिली। इसके बाद केंद्र सरकार ने e-Shram Portal लॉन्च किया, जिसका उद्देश्य देश के असंगठित श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना था ताकि उन्हें विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा जा सके।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, आयुष्मान भारत और अन्य योजनाओं को भी असंगठित श्रमिकों तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास किए गए।
कागजों पर देखें तो सामाजिक सुरक्षा का ढांचा पहले से कहीं बड़ा दिखाई देता है।
लेकिन क्या इंदौर के श्रमिकों की जिंदगी वास्तव में बदली?
यहीं तस्वीर बदल जाती है।
इंदौर जैसे औद्योगिक शहर में हजारों लोग निर्माण कार्य, छोटे उद्योगों, लॉजिस्टिक्स, ई-कॉमर्स, कैब सेवाओं, ऑटो संचालन और ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं।
इनमें से बड़ी संख्या आज भी—
- नियमित पेंशन से वंचित है।
- व्यापक स्वास्थ्य सुरक्षा नहीं पाती।
- नौकरी छूटने पर किसी सुनिश्चित सामाजिक सुरक्षा तंत्र का हिस्सा नहीं है।
- योजनाओं की जानकारी या पात्रता संबंधी जटिलताओं के कारण लाभ नहीं ले पाती।
यानी e-Shram कार्ड बन जाना और सामाजिक सुरक्षा मिल जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
मध्य प्रदेश में स्थिति क्या है?
राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री जनकल्याण (संबल) योजना, निर्माण श्रमिक कल्याण योजनाओं और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से असंगठित श्रमिकों को सहायता देने का प्रयास किया है। दुर्घटना सहायता, मृत्यु सहायता, स्वास्थ्य सुरक्षा और अन्य लाभ भी उपलब्ध हैं।
लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां सामने आती हैं—
- बड़ी संख्या में पात्र श्रमिकों का पंजीकरण अपडेट नहीं है।
- कई श्रमिकों को यह तक पता नहीं कि वे किन योजनाओं के पात्र हैं।
- अलग-अलग योजनाओं के लिए अलग-अलग प्रक्रिया होने से लाभ लेने में कठिनाई होती है।
- गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए व्यापक सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था अभी पूरी तरह लागू नहीं हो सकी है।
तो शंकर की नियुक्ति कितनी महत्वपूर्ण है?
राजनीतिक दृष्टि से यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण नियुक्ति है। इंदौर जैसे औद्योगिक शहर को राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड में प्रतिनिधित्व मिला है। इससे शहर के उद्योग, श्रमिक संगठन और गिग इकॉनमी से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर उठाए जा सकते हैं।
लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि बोर्ड केवल सिफारिशें करता है। किसी भी योजना को लागू करना, बजट देना या कानून बनाना केंद्र सरकार का अधिकार है। इसलिए इस नियुक्ति का वास्तविक महत्व तभी साबित होगा जब बोर्ड की सिफारिशें नीतियों में बदलें और उनका लाभ इंदौर तथा मध्य प्रदेश के श्रमिकों तक पहुंचे।
अब शंकर के सामने 5 बड़े सवाल
- क्या गिग वर्कर्स के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा फंड बनाने की दिशा में प्रगति होगी?
- क्या e-Shram पंजीकरण को सीधे योजनाओं से जोड़कर लाभ की प्रक्रिया आसान होगी?
- क्या इंदौर के औद्योगिक क्षेत्रों और पीथमपुर के श्रमिकों की समस्याएं राष्ट्रीय स्तर पर उठेंगी?
- क्या डिलीवरी पार्टनर्स, कैब ड्राइवर्स और अन्य प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए बीमा और पेंशन की व्यवस्था मजबूत होगी?
- क्या बोर्ड की सिफारिशें कागजों से निकलकर जमीनी बदलाव बन पाएंगी?
Expose Live Lens
शंकर लालवानी की नियुक्ति को केवल 'बड़ी उपलब्धि' या 'सम्मान' कह देना इस खबर की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
असल उपलब्धि तब होगी, जब इंदौर के निर्माण मजदूर, डिलीवरी पार्टनर, ऑटो चालक, स्ट्रीट वेंडर और छोटे स्वरोजगार वाले लोग यह महसूस करें कि उनकी सामाजिक सुरक्षा पहले से बेहतर हुई है।
2020 में कानून बना, करोड़ों लोगों का पंजीकरण हुआ, कई योजनाएं शुरू हुईं। अब 2026 में सवाल नियुक्ति का नहीं, नतीजों का है।
राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड में इंदौर की आवाज़ पहुंच चुकी है। अब देखना यह होगा कि क्या यह आवाज़ नीति निर्माण से आगे बढ़कर श्रमिकों की जिंदगी में भी बदलाव ला पाती है, या फिर यह नियुक्ति भी केवल एक प्रतिष्ठित पद बनकर रह जाती है।