सड़क के दावों पर दलदल का तमाचा! जबलपुर में ठेले पर निकली मासूम की अंतिम यात्रा
जबलपुर जिले में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 1,339 किमी सड़क निर्माण का दावा है, लेकिन स्टेट हाईवे से महज 7 किमी दूर मोठार गांव तक आज भी पक्की सड़क नहीं पहुंची। कीचड़ में शव वाहन फंसने के बाद 11 वर्षीय बच्ची का शव हाथ ठेले पर गांव ले जाना पड़ा। घटना ने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जबलपुर जिले में PM ग्राम सड़क योजना के तहत 1,339 किमी सड़क बनने का दावा, लेकिन स्टेट हाईवे से 7 किमी दूर मोठार गांव तक नहीं पहुंची पक्की सड़क, शव वाहन फंसा तो हाथ ठेला बना अंतिम यात्रा का सहारा
जबलपुर | एक्सपोज़ लाइव
सरकारी डैशबोर्ड कहता है—काम लगभग पूरा हो चुका है।
जमीन पर तस्वीर कहती है—एक 11 साल की बच्ची का शव आज भी ठेले पर गांव पहुंच रहा है।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के जबलपुर जिले के डैशबोर्ड के अनुसार जिले में 1,339 किलोमीटर सड़क निर्माण पूरा हो चुका है। 18 पुल बन चुके हैं और अब सिर्फ 13 किलोमीटर सड़क तथा 4 पुलों का काम शेष बताया गया है। यानी सरकारी रिकॉर्ड में सड़क निर्माण लगभग अंतिम चरण में है।
लेकिन इन्हीं सरकारी दावों के बीच शुक्रवार को जबलपुर के बरगी क्षेत्र के मोठार गांव से आई एक तस्वीर ने पूरे सिस्टम से जवाब मांग लिया।
शव वाहन रुका... सिस्टम भी वहीं रुक गया
11 वर्षीय माया मरावी का मेडिकल कॉलेज जबलपुर में इलाज के दौरान निधन हो गया। परिवार शव लेकर गांव लौट रहा था, लेकिन गांव से पहले बारिश में कीचड़ और दलदल बनी सड़क में शव वाहन फंस गया।
काफी मशक्कत हुई, लेकिन वाहन नहीं निकला।
आखिरकार ग्रामीण बरगी नगर से हाथ ठेला लेकर आए। उसी ठेले पर मासूम का शव रखकर अंतिम यात्रा पूरी कराई गई।
यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं था, बल्कि ग्रामीण विकास के दावों की सबसे कड़वी तस्वीर भी थी।
सिर्फ 7 किलोमीटर... फिर भी सड़क नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जबलपुर-लखनादौन स्टेट हाईवे-34 से महज 7 किलोमीटर दूर स्थित मोठार गांव आज भी ऑल-वेदर सड़क का इंतजार क्यों कर रहा है?
करीब 500 आबादी वाले गांव के लोग बताते हैं कि गांव बसने के बाद से आज तक पक्की सड़क नहीं बनी। हर बारिश में रास्ता दलदल बन जाता है। मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, गर्भवती महिलाओं को जोखिम उठाना पड़ता है और ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार 108 एम्बुलेंस भी गांव तक आने से बचती है।
डैशबोर्ड बनाम धरातल
सरकारी रिकॉर्ड कहता है—
- 1,339 किमी सड़क पूरी
- 18 पुल तैयार
- सिर्फ 13 किमी सड़क बाकी
लेकिन मोठार गांव पूछ रहा है—
अगर सब कुछ लगभग पूरा हो चुका है, तो फिर यहां सड़क कब पहुंचेगी?
- क्या यह गांव प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के दायरे में नहीं आता?
- अगर आता है तो निर्माण अब तक क्यों नहीं हुआ?
- अगर नहीं आता, तो फिर इस गांव के लोगों के हिस्से में विकास कब आएगा?
अब सड़क नहीं... आंदोलन की तैयारी
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से आवेदन दिए गए, जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई, लेकिन सड़क नहीं बनी। अब मासूम की अंतिम यात्रा ठेले पर निकलने के बाद गांव में गुस्सा है।
लोगों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि जल्द सड़क निर्माण शुरू नहीं हुआ तो जिला मुख्यालय तक जनआंदोलन किया जाएगा।
उधर जिला पंचायत सीईओ अभिषेक गहलोत ने मामले में जांच के आदेश दिए हैं। अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी गई है और सड़क नहीं बनने के कारणों की जांच की बात कही गई है।
जिम्मेदार कौन?
सांसद (जबलपुर लोकसभा)
आशीष दुबे (भाजपा)
लोकसभा क्षेत्र के सांसद होने के नाते केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और क्षेत्र की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी।
विधायक (बरगी विधानसभा)
नीरज सिंह लोधी (भाजपा)
मोठार गांव बरगी विधानसभा क्षेत्र में आता है। क्षेत्र की सड़क, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर जनता सीधे अपने विधायक से जवाब मांग रही है।
कलेक्टर, जबलपुर
राघवेंद्र सिंह (आईएएस)
जिले में विकास कार्यों की निगरानी, विभिन्न विभागों के समन्वय और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होती है।
जिला पंचायत सीईओ
अभिषेक गहलोत
घटना के बाद अधिकारियों से रिपोर्ट तलब की है। अब सवाल यह भी है कि जांच के बाद सड़क निर्माण की दिशा में क्या ठोस कार्रवाई होती है।
एक्सपोज़ सवाल
- जब PMGSY डैशबोर्ड जबलपुर जिले में 1,339 किमी सड़क निर्माण पूरा होने और सिर्फ 13 किमी सड़क शेष होने का दावा कर रहा है, तो मोठार गांव तक पक्की सड़क क्यों नहीं पहुंची?
- क्या यह गांव प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के दायरे में है? यदि नहीं, तो क्यों?
- अगर दायरे में है तो सड़क निर्माण अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ?
- आखिर मासूम की अंतिम यात्रा ठेले पर निकलने की जवाबदेही कौन लेगा—प्रशासन, जनप्रतिनिधि या संबंधित विभाग?
एक्सपोज़ पंच
सरकारी डैशबोर्ड पर सड़कें पूरी हो चुकी हैं... लेकिन मोठार गांव की कीचड़ भरी राह बता रही है कि विकास का सफर अभी भी अधूरा है। जब शव वाहन भी गांव तक न पहुंच सके, तो सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, सरकारी दावों की विश्वसनीयता का भी बन जाता है।