पूर्वी रिंग रोड पर जमीन का मुद्दा गरमाया: किसानों ने रखीं 8 शर्तें, पूछा- सड़क बनेगी तो खेतों तक रास्ता और पानी कैसे पहुंचेगा?
फरवरी में अलाइनमेंट बदलने का भरोसा, जून में 20 दिन में समीक्षा का वादा और अब भी इंतजार! पूर्वी रिंग रोड पर किसानों की जमीन के साथ क्या प्रशासन उनकी आवाज भी दबा रहा है? 4 गुना मुआवजे समेत 8 मांगों से गरमाया महू।
पहले फरवरी में मिला अलाइनमेंट बदलने का आश्वासन, फिर जून में 20 दिन में समीक्षा का भरोसा, पर कोई पहल नहीं, अब एसडीएम को नया ज्ञापन
इंदौर-महू के किसानों ने रखी 4 गुना मुआवजे से लेकर सर्विस रोड, अंडरपास और सिंचाई पाइपलाइन तक मांग
महू/इंदौर।
इंदौर की प्रस्तावित पूर्वी रिंग रोड अब सिर्फ एक सड़क परियोजना नहीं रह गई है। इसके साथ जमीन, मुआवजे और किसानों की आजीविका का सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है। पिछले कई महीनों से विरोध कर रहे किसानों ने अब महू में प्रशासन के सामने अपनी मांगों का एक विस्तृत खाका रखा है।
भारतीय किसान संघ तहसील महू ने एसडीएम को दिए ज्ञापन में 8 प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें अधिग्रहित जमीन के लिए वर्तमान बाजार मूल्य का चार गुना मुआवजा, सड़क के दोनों ओर सर्विस रोड, जल निकासी की व्यवस्था, अंडरपास, सिंचाई पाइपलाइन के लिए रास्ता और 70 प्रतिशत से अधिक जमीन गंवाने वाले किसानों के लिए विशेष पैकेज जैसी मांगें शामिल हैं।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पूर्वी रिंग रोड को लेकर किसान पहले भी कई बार सड़क पर उतर चुके हैं। फरवरी 2026 में किसानों ने कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन कर मौजूदा अलाइनमेंट बदलने की मांग की थी। इसके बाद प्रशासन ने अलाइनमेंट की दोबारा समीक्षा का आश्वासन दिया था।
करीब 76 किमी का 6 लेन कॉरिडोर, तीन पैकेज में टेंडर
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के रिकॉर्ड के अनुसार इंदौर के आसपास प्रस्तावित पूर्वी रिंग रोड का कॉरिडोर करीब किमी 64.4 से किमी 140.388 तक है। एनएचएआई ने इसके निर्माण को तीन पैकेज में बांटा है।
पहले पैकेज की लंबाई 26 किमी, दूसरे की 29.7 किमी और तीसरे की 20.3 किमी है। यानी कुल लंबाई करीब 76 किमी बैठती है। तीनों पैकेज के लिए 6 लेन सड़क निर्माण का प्रावधान है।
हालांकि, विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में इस परियोजना की लंबाई 84 से 85 किमी तक बताई गई है। इसलिए परियोजना की लंबाई को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहे हैं।
44 गांवों की जमीन और 1200 किसानों पर असर
जून 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक पूर्वी रिंग रोड के लिए इंदौर और देवास जिलों के 44 गांवों में करीब 820 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण की बात सामने आई थी। इससे करीब 1,200 किसान प्रभावित बताए गए।
फरवरी में किसानों की ओर से करीब 2,400 एकड़ कृषि भूमि के अधिग्रहण का दावा भी किया गया था। अलग-अलग रिपोर्टों में जमीन का आंकड़ा अलग है, इसलिए अंतिम अधिग्रहण क्षेत्र का आंकड़ा आधिकारिक रिकॉर्ड से ही तय होना बाकी माना जाना चाहिए।
किसानों का सवाल- उपजाऊ जमीन ही क्यों?
पूर्वी रिंग रोड के खिलाफ किसानों की सबसे बड़ी आपत्ति सिंचित और उपजाऊ कृषि भूमि के अधिग्रहण को लेकर है।
फरवरी में प्रदर्शन के दौरान किसानों ने कहा था कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसी जमीन देने को तैयार नहीं हैं जो उनकी आजीविका का मुख्य आधार है। किसानों ने प्रशासन से मौजूदा अलाइनमेंट से हटकर सरकारी, बंजर या कम उपजाऊ जमीन से सड़क निकालने की मांग की थी।
यही वजह है कि अब महू के किसान सिर्फ अलाइनमेंट का सवाल नहीं उठा रहे, बल्कि अधिग्रहण होने की स्थिति में किसानों को होने वाले व्यावहारिक नुकसान का हिसाब भी प्रशासन के सामने रख रहे हैं।
चार गुना मुआवजा, वह भी वर्तमान बाजार मूल्य पर
महू के किसान संघ की पहली और सबसे महत्वपूर्ण मांग है कि अधिग्रहित जमीन का मुआवजा वर्तमान बाजार मूल्य यानी बढ़ी हुई गाइडलाइन के चार गुना के आधार पर दिया जाए।
किसानों की मांग का मतलब साफ है—मुआवजा ऐसी दर पर तय नहीं होना चाहिए जो जमीन के मौजूदा बाजार मूल्य से पीछे हो।
सड़क बनेगी, लेकिन खेत तक पहुंच कैसे होगी?
किसानों की दूसरी बड़ी चिंता सड़क बनने के बाद खेतों तक पहुंच की है।
इसके लिए दोनों तरफ पक्की डामरीकृत सर्विस रोड बनाने की मांग की गई है। किसानों का कहना है कि मुख्य 6 लेन सड़क बनने के बाद खेतों और आसपास की जमीन तक आवाजाही बाधित नहीं होनी चाहिए।
यानी किसान सिर्फ मुआवजा लेकर जमीन छोड़ने की बात नहीं कर रहे, बल्कि बची हुई जमीन के इस्तेमाल की सुविधा भी चाहते हैं।
जगह-जगह अंडरपास, ताकि सड़क खेतों को दो हिस्सों में न बांट दे
किसानों की तीसरी बड़ी व्यावहारिक चिंता है—बची हुई जमीन तक पहुंच।
रिंग रोड के निर्माण के बाद कई किसानों की जमीन सड़क के दोनों ओर बंट सकती है। ऐसे में एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने के लिए लंबा चक्कर लगाना पड़ सकता है।
इसलिए किसान संघ ने जगह-जगह अंडरपास बनाने की मांग की है, ताकि किसान अपने खेतों तक आसानी से पहुंच सकें।
सड़क के नीचे से सिंचाई पाइपलाइन की व्यवस्था
कृषि भूमि के लिए सिंचाई व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है। इसी को देखते हुए किसानों ने रिंग रोड के नीचे से सिंचाई पाइपलाइन ले जाने की अनुमति मांगी है।
निर्माण के दौरान आवश्यक स्थानों पर लोहे के पाइप डालने की व्यवस्था करने की मांग भी की गई है, ताकि बाद में सड़क तोड़कर पाइपलाइन डालने की जरूरत न पड़े।
बारिश का पानी खेतों में भरा तो नुकसान किसका?
किसानों ने सड़क की ऊंचाई और जल निकासी को लेकर भी सवाल उठाया है।
ग्रामीण इलाकों में खेतों से निकलने वाला बारिश का पानी प्राकृतिक रास्तों से बहता है। यदि सड़क निर्माण के दौरान इन रास्तों को बंद कर दिया गया या सड़क की ऊंचाई ऐसी रखी गई कि पानी का बहाव रुक गया, तो खेतों में जलभराव हो सकता है।
इसीलिए किसान चाहते हैं कि जल निकासी, सड़क की ऊंचाई और स्थानीय भौगोलिक स्थिति से जुड़े सुझावों को डीपीआर में शामिल किया जाए।
डीपीआर किसानों को दिखाने की मांग
महू के किसानों ने एक महत्वपूर्ण मांग यह भी रखी है कि सड़क की डीपीआर किसानों को दिखाई जाए।
उनका कहना है कि जिन खेतों और गांवों से सड़क गुजरनी है, वहां के किसान स्थानीय रास्तों, पानी के बहाव और खेतों की वास्तविक स्थिति को बेहतर जानते हैं। इसलिए डीपीआर को सिर्फ विभागीय स्तर पर तैयार करने के बजाय प्रभावित किसानों के सुझाव भी उसमें शामिल किए जाएं।
70 फीसदी जमीन गई तो किसान का भविष्य क्या?
ज्ञापन में सबसे गंभीर मांग उन किसानों के लिए है जिनकी 70 प्रतिशत या उससे अधिक भूमि अधिग्रहित की जा रही है।
किसान संघ ने ऐसे परिवारों के लिए विशेष पैकेज और अतिरिक्त मुआवजे की मांग की है। तर्क यह है कि जिस किसान की अधिकांश कृषि भूमि चली जाएगी, उसके लिए मामला सिर्फ जमीन की कीमत का नहीं, बल्कि भविष्य की आजीविका का है।
दूसरी जमीन खरीदने पर स्टांप ड्यूटी भी माफ हो
किसानों ने अधिग्रहण के बाद मिलने वाले मुआवजे के इस्तेमाल से जुड़ी मांग भी रखी है।
यदि किसान अपनी अधिग्रहित जमीन के बदले दूसरी जगह कृषि भूमि खरीदता है तो उसे स्टांप ड्यूटी में पूरी छूट देने की मांग की गई है।
यानी किसान चाहते हैं कि मुआवजे की राशि से नई जमीन खरीदने की स्थिति में सरकार अतिरिक्त आर्थिक बोझ न डाले।
फरवरी में अलाइनमेंट, जून में फिर आंदोलन
पूर्वी रिंग रोड को लेकर किसानों का विरोध नया नहीं है।
फरवरी 2026 में सैकड़ों किसानों ने कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन किया था। किसानों ने मौजूदा अलाइनमेंट बदलने और उपजाऊ जमीन बचाने की मांग की थी। प्रदर्शन के बाद प्रशासन की ओर से अलाइनमेंट की दोबारा समीक्षा का आश्वासन दिया गया।
इसके बाद जून में भी किसान बड़ी संख्या में कलेक्ट्रेट पहुंचे। पूर्वी रिंग रोड के साथ इंदौर-मनमाड़ रेल लाइन के भूमि अधिग्रहण का भी विरोध हुआ। प्रदर्शन के बाद कलेक्टर शिवम वर्मा ने पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया की समीक्षा कर 20 दिन में निर्णय देने की बात कही थी।
अब सवाल सिर्फ मुआवजे का नहीं
महू के किसानों का नया ज्ञापन इस पूरे विवाद को एक नए स्तर पर ले जाता है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जमीन कितने रुपये में ली जाएगी, बल्कि यह भी है कि सड़क बनने के बाद किसान की बची जमीन तक रास्ता कैसे रहेगा, खेतों का पानी कहां जाएगा, सिंचाई पाइपलाइन कैसे जाएगी और जिन किसानों की अधिकांश जमीन चली जाएगी, उनके भविष्य की भरपाई कैसे होगी।
पूर्वी रिंग रोड का उद्देश्य इंदौर के आसपास यातायात दबाव कम करना और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाना है। लेकिन परियोजना के रास्ते में आने वाली कृषि भूमि और किसानों की आजीविका को लेकर लगातार उठ रहे सवाल बता रहे हैं कि सड़क का निर्माण जितना इंजीनियरिंग का विषय है, उतना ही भूमि और किसान हित का भी मामला है।
Expose Live Take
पूर्वी रिंग रोड की फाइल में सड़क की लंबाई, पैकेज और टेंडर साफ दिखाई देते हैं। लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है—जहां नक्शे पर सिर्फ एक लाइन दिखाई देती है, वहीं उसी लाइन के नीचे किसी किसान की कई पीढ़ियों की खेती है।
फरवरी में किसानों ने अलाइनमेंट पर सवाल उठाया, जून में फिर कलेक्ट्रेट पहुंचे और अब महू में 8 मांगों के साथ प्रशासन से लिखित समाधान मांगा गया है।
अब गेंद प्रशासन के पाले में है।
किसानों को सिर्फ यह जवाब नहीं चाहिए कि सड़क बनेगी या नहीं। वे यह जानना चाहते हैं कि अगर सड़क बनेगी तो उनकी जमीन, रास्ते, पानी और भविष्य की कीमत कौन तय करेगा—और किस आधार पर?

