दतिया में कांग्रेस की जीत लगभग तय... क्या भाजपा को ले डूबा 'नरोत्तम फैक्टर'?
दतिया उपचुनाव में दसवें राउंड के बाद कांग्रेस के घनश्याम सिंह की जीत लगभग तय मानी जा रही है। क्या भाजपा की हार की सबसे बड़ी वजह नरोत्तम फैक्टर बना? टिकट कटने से लेकर कार्यकर्ताओं की नाराजगी, सहानुभूति और तीसरी पार्टी की भूमिका का पढ़ें 360° विश्लेषण।
टिकट कटने से शुरू हुआ विरोध, मंच पर छलके आंसू, प्रचार में मिला सबसे ज्यादा समर्थन... 8 राउंड बाद कांग्रेस की बढ़त ने खड़े किए बड़े सवाल
दतिया।
दस राउंड की मतगणना के बाद कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने करीब 11 हजार वोटों की ऐसी बढ़त बना ली है, जिसे राजनीतिक जानकार निर्णायक मान रहे हैं, जिसे राजनीतिक जानकार निर्णायक मान रहे हैं। यानी कांग्रेस की जीत पक्की हो गई है। लेकिन इस चुनाव की कहानी सिर्फ आंकड़ों में नहीं छिपी। यह चुनाव शायद उन दुर्लभ चुनावों में शामिल हो जाएगा, जहां सबसे ज्यादा चर्चा उम्मीदवार की नहीं, बल्कि उस नेता की हुई जिसे टिकट ही नहीं मिला।
दतिया में भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी थे, लेकिन पूरे चुनाव में सबसे ज्यादा नाम अगर किसी का गूंजा तो वह पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का था। टिकट कटने से शुरू हुई नाराजगी, समर्थकों का सड़क पर उतरना, मंच पर छलके आंसू, हर सभा में मिला भावनात्मक स्वागत और मतदान तक जारी चर्चाएं... इन सबको जोड़कर देखें तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या दतिया में सबसे बड़ा फैक्टर नरोत्तम मिश्रा ही रहे?
टिकट कटा और उसी दिन बदल गया चुनाव का नैरेटिव
भाजपा ने लंबे समय तक दतिया का चेहरा रहे डॉ. नरोत्तम मिश्रा की जगह संगठन से जुड़े आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया।
घोषणा होते ही दतिया में भाजपा के भीतर ऐसा विरोध देखने को मिला, जिसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की थी।
समर्थक सड़कों पर उतर आए। ग्वालियर-झांसी हाईवे जाम हो गया। पथराव हुआ। पुलिस को आंसू गैस छोड़नी पड़ी। स्थानीय पदाधिकारियों के इस्तीफे तक की खबरें सामने आईं।
यानी चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही भाजपा को अपने ही घर में आग बुझानी पड़ गई।
उम्मीदवार आशुतोष थे... लेकिन स्वागत नरोत्तम का हो रहा था
चुनाव प्रचार के दौरान एक बात लगातार दिखाई दी। जहां-जहां नरोत्तम मिश्रा पहुंचे, वहां भीड़ का उत्साह अक्सर उम्मीदवार से ज्यादा उनके लिए दिखाई दिया।
राजनीतिक गलियारों में यही चर्चा रही कि जनता और कार्यकर्ताओं का बड़ा वर्ग अभी भी नरोत्तम मिश्रा को ही दतिया का असली चेहरा मान रहा था।
यही वजह रही कि पूरा चुनाव भाजपा प्रत्याशी के बजाय नरोत्तम मिश्रा के इर्द-गिर्द घूमता नजर आया।
मंच पर छलके आंसू... और वहीं से बनी सहानुभूति?
नामांकन के दिन जब नरोत्तम मिश्रा मंच पर पहुंचे तो उन्होंने भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में पूरी ताकत लगाने की बात कही, लेकिन भाषण के दौरान वह भावुक हो गए।
उनकी आंखों में आंसू थे। राजनीति में कई बार भाषण से ज्यादा तस्वीरें असर करती हैं।
दतिया में भी यही तस्वीर पूरे चुनाव की सबसे चर्चित तस्वीर बन गई।
भाजपा ने ताकत में कोई कमी नहीं छोड़ी
यह कहना गलत होगा कि भाजपा ने चुनाव हल्के में लिया।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से लेकर प्रदेश अध्यक्ष और कई वरिष्ठ नेताओं ने लगातार प्रचार किया। रोड शो हुए। सभाएं हुईं। संगठन ने पूरा जोर लगाया। यानी संसाधनों और स्टार प्रचारकों की कोई कमी नहीं थी।
इसी वजह से अगर परिणाम भाजपा के खिलाफ जाता है तो सवाल और बड़ा हो जाता है।
क्या कार्यकर्ताओं का मन पूरी तरह नहीं जुड़ पाया?
राजनीति में संगठन सिर्फ मंच से नहीं चलता। वह बूथ तक जाता है। दतिया में लगातार यह चर्चा रही कि टिकट बदलने के बाद स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं का एक वर्ग पूरी तरह सहज नहीं था।
स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी सामने आए कि मतदान के दिन नरोत्तम मिश्रा समर्थक कुछ कार्यकर्ताओं को पुलिस ने थाने में बैठाए रखा।
हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और प्रशासन ने इसे स्वीकार नहीं किया है। लेकिन चुनावी राजनीति में कई बार तथ्य जितना असर करते हैं, उतनी ही चर्चा और धारणा भी असर डालती है।
अगर कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया कि उन्हें सक्रिय भूमिका निभाने से रोका जा रहा है, तो उसका मनोवैज्ञानिक असर चुनावी मशीनरी पर पड़ना स्वाभाविक माना जाता है।
क्या कांग्रेस जीती... या भाजपा अपनी बढ़त बचा नहीं पाई?
कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने अपेक्षाकृत शांत और स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित प्रचार किया।
कांग्रेस भी पूरी तरह एकजुट दिखाई दी। लेकिन चुनावी प्रबंधन की बात करें तो भाजपा ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे में चुनाव को सिर्फ कांग्रेस की रणनीति की जीत कहना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी।
कई राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि टिकट बदलने के बाद पैदा हुआ भावनात्मक और संगठनात्मक असंतोष था।
तीसरी पार्टी ने भी बिगाड़ा गणित?
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के दामोदर यादव 'मंडल' को मिले लगभग 14 प्रतिशत वोट भी इस चुनाव का महत्वपूर्ण पहलू हैं।
अगर ये वोट भाजपा के पारंपरिक सामाजिक आधार से आए हैं तो नुकसान सीधा भाजपा को हुआ होगा। अगर ये नए सामाजिक समीकरण का संकेत हैं तो दतिया की राजनीति बदलने की शुरुआत भी मानी जा सकती है।
हालांकि इसका निष्कर्ष बूथवार मतदान के बाद ही निकलेगा।
EXPOSE LIVE TAKE
दतिया उपचुनाव ने एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है।
भाजपा ने उम्मीदवार बदला… लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं की चर्चा नहीं बदली। पूरा चुनाव उस नेता के इर्द-गिर्द घूमता रहा, जिसका नाम मतपत्र पर था ही नहीं।
टिकट कटने के बाद विरोध… सड़कों पर प्रदर्शन… मंच पर भावुक नरोत्तम… हर सभा में उनके समर्थन की गूंज… और अब मतगणना में भाजपा पिछड़ती दिख रही है।
इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखने पर इतना कहना गलत नहीं होगा कि दतिया उपचुनाव में सबसे प्रभावशाली राजनीतिक फैक्टर "नरोत्तम फैक्टर" बनकर उभरा।
हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि हार का एकमात्र कारण वही है। अंतिम परिणाम, बूथवार वोटिंग पैटर्न और विस्तृत चुनावी विश्लेषण के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सहानुभूति, संगठनात्मक नाराजगी, तीसरी पार्टी और स्थानीय समीकरणों में किसका योगदान सबसे ज्यादा रहा।
