भोपाल बना किसानों का 'जंतर-मंतर', सवाल सिर्फ मूंग का नहीं... सरकार के भरोसे का भी है

मध्य प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर किसानों का भोपाल में आंदोलन तेज हो गया है। किसानों की मांग है कि पंजीयन कराने वाले सभी किसानों की पूरी मूंग MSP पर खरीदी जाए और खाद वितरण की ई-टोकन व्यवस्था खत्म की जाए।

भोपाल बना किसानों का 'जंतर-मंतर', सवाल सिर्फ मूंग का नहीं... सरकार के भरोसे का भी है

पंजीयन पूरा, खरीदी अधूरी! किसान बोले- मुफ्त की मदद नहीं, अपनी मेहनत की पूरी कीमत चाहिए, सरकार बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में

भोपाल। 

मध्य प्रदेश की राजधानी इन दिनों किसानों के सबसे बड़े आंदोलन का केंद्र बनी हुई है। प्रदेश के अलग-अलग जिलों से सैकड़ों किसान पैदल मार्च करते हुए भोपाल पहुंचे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले चल रहा यह आंदोलन केवल मूंग खरीदी का आंदोलन नहीं है, बल्कि सरकार की खरीद नीति, ई-टोकन व्यवस्था और किसानों से किए गए भरोसे पर खड़े सवालों का आंदोलन बन चुका है।

किसानों का कहना है कि उन्होंने सरकार की प्रक्रिया के अनुसार अपनी मूंग का पंजीयन कराया। सरकार ने पंजीयन स्वीकार किया, लेकिन अब पूरी उपज खरीदने से पीछे हट रही है। उनका साफ कहना है कि वे सरकार से कोई अनुदान, राहत पैकेज या मुफ्त सहायता नहीं मांग रहे, बल्कि अपनी मेहनत की उस फसल का पूरा समर्थन मूल्य मांग रहे हैं, जिसे खरीदने का भरोसा सरकार ने खुद पंजीयन के जरिए दिया था।

किसान आखिर मांग क्या रहा है?

आंदोलन की पूरी लड़ाई सिर्फ दो मुख्य मांगों पर टिकी हुई है—

  • जिन किसानों ने MSP पर मूंग बेचने के लिए पंजीयन कराया है, उनकी पूरी फसल खरीदी जाए।
  • रासायनिक उर्वरकों के वितरण के लिए लागू ई-टोकन व्यवस्था समाप्त की जाए, ताकि किसानों को खाद के लिए तकनीकी परेशानियों का सामना न करना पड़े।

किसानों का कहना है कि उनकी मांग कोई नई योजना या अतिरिक्त सुविधा नहीं है। वे केवल सरकार से उसका घोषित वादा निभाने की मांग कर रहे हैं।

पंजीयन कराया, तो पूरी खरीदी क्यों नहीं?

आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल यही है।

किसानों का तर्क है कि जब सरकार ने उनकी फसल का पंजीयन किया, तब उन्होंने उसी भरोसे खेती की। अब यदि खरीदी सीमित कर दी जाती है या पूरी उपज नहीं खरीदी जाती, तो इसका सीधा नुकसान किसान को उठाना पड़ता है।

किसानों का कहना है कि सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि सरकार अपने ही निर्णय को पूरी तरह लागू नहीं कर रही। यदि जितना पंजीयन किया गया है, उतनी ही मूंग की खरीदी कर ली जाती, तो किसानों को सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर भोपाल आने की जरूरत ही नहीं पड़ती। ऐसे में सरकार द्वारा लगातार यह कहना कि किसानों से चर्चा की जा रही है, आंदोलनकारी किसानों को अधूरा जवाब लगता है।

किसान की जुबानी

सरकार ने कहा पंजीयन कराओ, हमने कराया। अब कह रही है पूरी खरीदी नहीं होगी। हम कोई अनुदान नहीं मांग रहे, सिर्फ अपनी फसल का घोषित समर्थन मूल्य मांग रहे हैं। अगर सरकार पंजीयन के बराबर खरीदी कर लेती, तो हमें भोपाल आकर आंदोलन करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
— रमेश मालवीय, ग्राम खजूरी 

ई-टोकन व्यवस्था पर इतना विरोध क्यों?

किसानों का आरोप है कि रासायनिक उर्वरकों के वितरण के लिए लागू ई-टोकन व्यवस्था जमीनी स्तर पर किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही है।

उनके अनुसार—

  • समय पर ई-टोकन नहीं मिलते।
  • खाद लेने के लिए बार-बार इंतजार करना पड़ता है।
  • तकनीकी दिक्कतों का सबसे ज्यादा नुकसान छोटे और ग्रामीण किसानों को उठाना पड़ता है।
  • कई बार खाद उपलब्ध होने के बावजूद किसान समय पर उसे नहीं ले पाते।

इसी वजह से किसान इस व्यवस्था को समाप्त करने और सरल व्यवस्था लागू करने की मांग कर रहे हैं।

भोपाल क्यों बना आंदोलन का केंद्र?

संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले प्रदेश के कई जिलों से किसान पैदल मार्च करते हुए भोपाल पहुंचे हैं। आंदोलनकारियों ने मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच करने की कोशिश की। इसके चलते राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई, कई मार्गों पर यातायात प्रभावित हुआ और प्रशासन को अतिरिक्त इंतजाम करने पड़े। सरकार और किसान संगठनों के बीच बातचीत भी हुई, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आ सका है।

सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि किसानों से लगातार चर्चा की जा रही है और उनकी मांगों पर विचार किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि खरीदी और उर्वरक वितरण की प्रक्रिया नियमों के अनुसार संचालित की जा रही है, जबकि किसान संगठन इसे जमीनी हकीकत से अलग बता रहे हैं।

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यह आंदोलन सिर्फ मूंग खरीदी तक सीमित नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह दो मांगें हैं—पंजीयन करा चुके किसानों की पूरी फसल की खरीदी और उर्वरक वितरण के लिए लागू ई-टोकन व्यवस्था को खत्म करना।

किसानों का तर्क है कि जब सरकार ने उनकी फसल का पंजीयन किया है, तो पूरी खरीदी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। उनका कहना है कि वे किसी नई योजना या आर्थिक सहायता की मांग नहीं कर रहे, बल्कि सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य पर अपनी उपज बेचने का अवसर चाहते हैं।

आंदोलन के केंद्र में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि सरकार पंजीयन के बराबर खरीदी सुनिश्चित कर देती, तो क्या किसानों को भोपाल आकर आंदोलन करना पड़ता? यही सवाल अब सरकार की खरीद नीति और उसके क्रियान्वयन पर भी खड़ा हो रहा है।

अब देखना यह होगा कि सरकार किसानों की इन दो प्रमुख मांगों—पूरी खरीदी और ई-टोकन व्यवस्था—पर क्या फैसला लेती है। यही इस पूरे आंदोलन का सबसे अहम बिंदु बन गया है।