1.14 लाख करोड़ की लाड़ली बहना, 5.31 लाख करोड़ का कर्ज: MP के खजाने का असली गणित क्या?
मंगलवार को भोपाल में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लाड़ली बहना योजना को अगले पांच साल जारी रखने का फैसला हुआ। सरकार इस पर ₹1,14,365 करोड़ खर्च करेगी। बढ़ते कर्ज और ₹3,000 की उम्मीद के बीच फैसले का पूरा वित्तीय गणित पढ़ें।
1,000 से 1,500 तक पहुंची किस्त, 3,000 की उम्मीद; हर साल 50-70 हजार करोड़ नई उधारी के बीच लाड़ली बहना पर 23,883 करोड़ सालाना खर्च
पुराने कर्ज, विकास बजट और मध्य प्रदेश पर बढ़ते वित्तीय बोझ के बीच बड़ा सवाल: राहत, सियासत या प्रदेश पर बढ़ते कर्ज का जाल?
भोपाल।
मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना योजना अब सिर्फ महिलाओं के खाते में हर महीने पैसा भेजने वाली योजना नहीं रही। यह सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक और वित्तीय प्रतिबद्धताओं में शामिल हो चुकी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में 18 अगस्त 2026 को हुई कैबिनेट बैठक में योजना को 2026-27 से 2030-31 तक अगले पांच वर्षों तक जारी रखने के लिए 1,14,365 करोड़ का प्रावधान मंजूर किया गया।
यानी करीब सवा करोड़ महिलाओं को आर्थिक सहायता जारी रहेगी। लेकिन इसी फैसले के साथ राज्य की दूसरी तस्वीर भी सामने है—मध्यप्रदेश सरकार पर वर्ष 2026 तक कुल अनुमानित कर्ज करीब 4.88 लाख करोड़ से 5.31 लाख करोड़ के बीच पहुंच चुका है। राज्य अपनी बजटीय जरूरतों के लिए हर साल औसतन 50,000 करोड़ से 70,000 करोड़ का नया कर्ज उठा रहा है।
यहीं से सवाल तीखा हो जाता है—जब राज्य पर इतना बड़ा कर्ज है, हर साल नई उधारी हो रही है और अगले पांच साल में अकेली लाड़ली बहना पर 1.14 लाख करोड़ खर्च होंगे, तो इस मॉडल की वित्तीय कीमत क्या होगी?
4.38 लाख करोड़ के रिकॉर्ड बजट में लाड़ली बहना का कितना हिस्सा? गणित सीधा है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के 4,38,317 करोड़ के कुल बजट में लाड़ली बहना पर करीब 23,883 करोड़ का सालाना खर्च है। यानी राज्य के कुल बजट का 5.45 प्रतिशत हिस्सा अकेली इस योजना पर जा रहा है। दूसरे शब्दों में, सरकार के हर 100 रुपए के बजट में करीब 5.45 रुपए लाड़ली बहना के लिए खर्च हो रहे हैं। इसका औसत मासिक खर्च करीब 1,990 करोड़ और दैनिक खर्च करीब 65.4 करोड़ बैठता है।
1,000 से 1,500, अब नजर 3,000 पर
2023 में लाड़ली बहना की शुरुआत 1,000 प्रतिमाह से हुई। राशि बढ़कर 1,250 हुई और नवंबर 2025 में 1,500 प्रतिमाह कर दी गई। यानी कुछ ही वर्षों में मासिक सहायता में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
योजना से अब 1.25 करोड़ से अधिक महिलाएं जुड़ी हैं। 30वीं किस्त में करीब 1.26 करोड़ महिलाओं के खातों में 1,857 करोड़ ट्रांसफर किए गए थे। अब सवाल अगली छलांग का है—3,000 कब?
पांच साल के लिए 1,14,365 करोड़ मंजूर होने से योजना की निरंतरता तय हुई है, लेकिन 1,500 से 3,000 तक पहुंचने का साल-दर-साल रोडमैप अभी बड़ा सवाल है। राशि दोगुनी होने का अर्थ वित्तीय बोझ में भी बड़ा इजाफा होगा।
1.14 लाख करोड़ अकेला आंकड़ा नहीं
18 अगस्त की कैबिनेट में लाड़ली बहना सहित प्रमुख महिला एवं बाल कल्याण योजनाओं के लिए कुल 1,32,828 करोड़ मंजूर किए गए। इसमें लाड़ली बहना के 1,14,365 करोड़, लाड़ली लक्ष्मी के 16,326 करोड़ और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के 2,137 करोड़ शामिल हैं।
वित्तीय वर्ष 2025-26 तक लाड़ली बहना पर 61 हजार करोड़ से अधिक खर्च हो चुका है। अगले पांच वर्षों के 1,14,365 करोड़ को जोड़ें तो योजना का कुल अनुमानित वित्तीय आकार करीब 1.75 लाख करोड़ बैठता है।
यानी सवाल अब सिर्फ किस्त का नहीं, राज्य की दीर्घकालीन वित्तीय प्राथमिकताओं का है।
4.38 लाख करोड़ का बजट, 5.31 लाख करोड़ तक कर्ज
वित्तीय वर्ष 2026-27 में मध्यप्रदेश का कुल बजट 4.38 लाख करोड़ है। दूसरी तरफ राज्य पर कुल अनुमानित कर्ज 4.88 लाख करोड़ से 5.31 लाख करोड़ तक पहुंचने का आंकड़ा सामने है। 5.31 लाख करोड़ का कर्ज राज्य के एक साल के कुल बजट से करीब 90 हजार करोड़ अधिक है।
सिर्फ वित्तीय वर्ष 2025-26 में सरकार ने 57,100 करोड़ से अधिक नया कर्ज उठाया। 2026-27 में अनुमानित राजकोषीय घाटा 71,458 करोड़, यानी जीएसडीपी का 3.9 प्रतिशत है। इसका अर्थ है कि इस वित्तीय वर्ष में भी करीब 71 हजार करोड़ के वित्तीय अंतर को संभालने की चुनौती है।
यानी एक तरफ पांच साल में 1.14 लाख करोड़ की नई प्रतिबद्धता और दूसरी तरफ हर साल बढ़ता कर्ज—यहीं से असली वित्तीय सवाल शुरू होता है।
लाड़ली बहना का सालाना खर्च कई बड़े बजट के बराबर
2026-27 में लाड़ली बहना पर सालाना खर्च करीब 23,883 करोड़ बैठता है।
तुलना देखिए—
- शिक्षा, खेल और संस्कृति: 52,917 करोड़
- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण: 24,001 करोड़
- कृषि एवं संबद्ध गतिविधियां: 23,576 करोड़
- सड़क और पुलों के पूंजीगत कार्य: 9,910 करोड़
- लाड़ली बहना: करीब 23,883 करोड़ सालाना
यानी लाड़ली बहना का सालाना खर्च पूरे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण बजट के लगभग बराबर, कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों के कुल आवंटन से थोड़ा अधिक और सड़क-पुलों के पूंजीगत परिव्यय से करीब ढाई गुना है।
यहीं सवाल है—नकद सहायता और स्थायी परिसंपत्ति निर्माण के बीच संतुलन कितना है?
सुप्रीम कोर्ट की चिंता: 'फ्रीबीज' बनाम वित्तीय स्थिरता
सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त योजनाओं को लेकर राज्यों की वित्तीय स्थिति और बुनियादी सेवाओं पर संभावित दबाव की चिंता जताई है। हालांकि कोर्ट ने लाड़ली बहना योजना को अवैध घोषित नहीं किया है।
इसलिए बहस योजना बंद करने की नहीं, बल्कि यह पूछने की है कि क्या सामाजिक सहायता के साथ दीर्घकालीन विकास और राजकोषीय अनुशासन भी सुरक्षित है?
मध्यप्रदेश में यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य हर साल 50 हजार से 70 हजार करोड़ नया कर्ज ले रहा है।
कर्ज का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज में?
कैग और आरबीआई के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार नए कर्ज का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा पुराने कर्ज की ब्याज और किस्तों की देनदारी चुकाने में चला जाता है—यानी हर 100 के नए कर्ज में करीब 30 पुराने दायित्व संभालने में जा सकते हैं।
2026-27 में सरकार को 34,437 करोड़ पुराने कर्ज की वापसी में खर्च करने हैं।
यहीं 'डेट ट्रैप' की चिंता सामने आती है। नया कर्ज पूरा का पूरा नया विकास पैदा नहीं करता; उसका एक हिस्सा पुराने कर्ज और ब्याज की देनदारी में चला जाता है।
सवाल इसलिए है—अगर कर्ज लगातार बढ़ता रहा तो नई पीढ़ी के विकास खर्च की गुंजाइश कितनी बचेगी?
1.75 लाख करोड़ से विकास की दूसरी तस्वीर
योजना की शुरुआत से 2031 तक करीब 1.75 लाख करोड़ के अनुमानित वित्तीय आकार को यदि वैकल्पिक रूप से परिसंपत्ति निर्माण में लगाया जाता, तो लागत के मौजूदा अनुपात के आधार पर बड़े पैमाने पर स्थायी ढांचा तैयार किया जा सकता था।
सौर ऊर्जा: 1 लाख सोलर पंप की लागत करीब 3,000 करोड़ मानें तो अनुमान के अनुसार 1.75 करोड़ किसानों तक सोलर पंप पहुंचाने की वित्तीय क्षमता बनती है।
स्वास्थ्य: राज्य के करीब 23,747 करोड़ के वार्षिक स्वास्थ्य बजट के संदर्भ में विश्लेषण के मुताबिक इससे 7 एम्स जैसे सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल और 500 से अधिक सर्वसुविधायुक्त जिला अस्पताल बनाए जा सकते थे।
शिक्षा: करीब 28,000 करोड़ के शिक्षा बजट को आधार मानें तो अनुमान के अनुसार 20,000 से अधिक पीएम श्री/सीएम राइज तर्ज के हाईटेक स्कूल तैयार किए जा सकते थे।
सड़क: वर्तमान में 12,690 करोड़ में 2,190 किलोमीटर सड़क विकसित किए जाने के लागत अनुपात को आधार मानें तो विश्लेषण के अनुसार 1.75 लाख करोड़ से 30,000 किलोमीटर से अधिक सड़क, एक्सप्रेसवे और फोर-लेन कनेक्टिविटी की क्षमता बन सकती थी।
मेट्रो: इंदौर और भोपाल मेट्रो के विस्तार के साथ ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन समेत अन्य बड़े शहरों में सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क के विस्तार की दिशा में भी इतनी बड़ी राशि उपयोगी हो सकती थी।
ये आंकड़े वैकल्पिक निवेश का विश्लेषण हैं; वास्तविक परियोजना लागत भूमि, तकनीक, डिजाइन और निर्माण मॉडल के अनुसार अलग हो सकती है।
नकद राहत जरूरी, लेकिन स्थायी आय ज्यादा ताकतवर
लाड़ली बहना को विकास का विरोधी बताना गलत होगा। 1,500 की मासिक राशि परिवार के भोजन, दवा, बच्चों की पढ़ाई, घरेलू जरूरत या बचत में काम आती है।
लेकिन सड़क, अस्पताल, स्कूल, बिजली परियोजना या औद्योगिक पार्क वर्षों तक आर्थिक गतिविधि को सहारा देते हैं।
यानी—
1,500 राहत है।
3,000 ज्यादा राहत होगी।
लेकिन 15-20 हजार की स्थायी आय आर्थिक बदलाव पैदा कर सकती है।
इसलिए असली महिला सशक्तिकरण का अगला चरण सिर्फ किस्त बढ़ाना नहीं, बल्कि कौशल + रोजगार + उद्यम + बाजार + डिजिटल वित्त + संपत्ति + सामाजिक सुरक्षा से जोड़ना होना चाहिए।
1.14 लाख करोड़ से कर्ज का कितना हिस्सा चुक सकता था?
5.31 लाख करोड़ के कुल अनुमानित कर्ज के मुकाबले 1,14,365 करोड़ करीब 21.5 प्रतिशत है। यदि कुल कर्ज 4.88 लाख करोड़ माना जाए तो यही राशि करीब 23.4 प्रतिशत बैठती है।
अर्थात लाड़ली बहना का पांच साल का प्रावधान राज्य के कुल कर्ज के करीब एक-चौथाई के बराबर है।
पूरी राशि को कर्ज चुकाने में लगाया जा सकता था, ऐसा सीधा वित्तीय निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों अलग बजटीय दायित्व हैं। लेकिन तुलनात्मक रूप से यह आंकड़ा बताता है कि 1.14 लाख करोड़ कितना बड़ा वित्तीय संसाधन है।
यदि इतनी राशि से कर्ज कम किया जाता तो भविष्य के ब्याज खर्च में बचत की संभावना बन सकती थी और उस बचत को स्थायी विकास कार्यों में लगाया जा सकता था।
असली सवाल कर्ज लेना नहीं, कर्ज का इस्तेमाल है
कर्ज अपने आप खराब नहीं है। कर्ज लेकर सड़क, सिंचाई, औद्योगिक पार्क, बिजली, अस्पताल या ऐसी परिसंपत्ति बनाई जाए जो उत्पादन, रोजगार और भविष्य का राजस्व बढ़ाए तो उसका आर्थिक औचित्य मजबूत होता है।
लेकिन जब कर्ज का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज, ब्याज और नियमित खर्च संभालने में चला जाए तो भविष्य की वित्तीय गुंजाइश घट सकती है।
मध्यप्रदेश के सामने यही चुनौती है—लाड़ली बहना भी चले, कर्ज भी संभले और पूंजीगत निवेश भी न दबे।
Expose Live Take
लाड़ली बहना बंद होनी चाहिए या नहीं—यह बहस बहुत छोटी है।
बड़ी बहस यह है कि 1.75 लाख करोड़ के आसपास के इस विशाल वित्तीय आकार से मध्यप्रदेश की महिलाओं और प्रदेश—दोनों का भविष्य कैसे बदलेगा।
सरकार ने पांच साल के लिए 1,14,365 करोड़ तय कर दिए हैं। महिलाओं की नजर 3,000 पर है। वित्त विभाग की नजर 4.88-5.31 लाख करोड़ के कर्ज और बढ़ती उधारी पर होगी।
जनता को देखना होगा—
कितने रोजगार आए? कितने उद्योग लगे? कितने अस्पताल बने? कितने स्कूल बदले? कितने किसान ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर हुए? कितनी महिलाओं की अपनी कमाई बढ़ी?
क्योंकि 1.14 लाख करोड़ सिर्फ सरकारी खर्च नहीं, जनता के भविष्य का संसाधन है।
महिलाओं को पैसा देना जरूरी है, लेकिन ऐसी अर्थव्यवस्था बनाना उससे भी जरूरी है जिसमें अगली पीढ़ी को हर महीने सरकारी किस्त का इंतजार न करना पड़े।
1,500 से 3,000 तक का सफर लाड़ली बहना की अगली राजनीतिक कहानी हो सकता है।
लेकिन 3,000 से आत्मनिर्भर आय तक का सफर ही मध्यप्रदेश की असली विकास कहानी बनेगा।
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या सरकार लाड़ली बहना को चलाते हुए 5.31 लाख करोड़ तक के कर्ज का बोझ भी संभाल पाएगी और विकास की रफ्तार भी बनाए रखेगी?
