7 दिन में 80 शराबी नापे, पर शराब माफियाओं को 'सरकारी वीआईपी छूट'!
कागजों पर अहाते बंद, पर सड़कों पर ओपन बार?! इंदौर में मंदिर, अस्पताल और कोचिंग के ठीक बाहर शराबखोरी का यह शॉकिंग नजारा देखकर दिमाग सुन्न हो जाएगा! 7 दिन में पुलिस ने 80 शराबी तो नाप दिए, लेकिन अवैध अहाते चलवाने वाले शराब माफिया और आबकारी महकमे पर हाथ डालने से सिस्टम क्यों कांप रहा है? जानिए इस पूरे डबल गेम का सच…
आबकारी का 'ओपन बार', पुलिस का 'दिखावटी प्रहार', एक विभाग कमीशन की मलाई खाकर शराब पिलवा रहा, दूसरा केस गिनवाकर अपनी पीठ थपथपा रहा,
कागजों में अहाते बंद, मंदिर, अस्पताल, कोचिंग और चौराहे से सड़कों तक मयखाने, फिर भी ठेकेदारों के लाइसेंस रद्द करने में क्यों कांप रहे हाथ?
विशेष पड़ताल | इंदौर
मध्य प्रदेश सरकार की आबकारी नीति के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला देखना हो तो इंदौर की सड़कों पर निकल आइए। सरकार ने ढिंढोरा पीटा था कि पूरे प्रदेश में अहाते पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं, शराब दुकानों के 100 मीटर के दायरे में बैठकर पीने पर पाबंदी रहेगी और सार्वजनिक स्थलों पर शराबखोरी पर लगाम कसी जाएगी। लेकिन प्रदेश के सबसे प्रमुख औद्योगिक और आर्थिक शहर इंदौर में आबकारी विभाग और शराब सिंडिकेट के गठजोड़ ने पूरी आबकारी नीति को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।
हकीकत यह है कि हर शराब दुकान के अगल-बगल अवैध अहाते धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं। शराब माफिया को खुली छूट है कि वह ग्राहकों को दुकान की चौखट, फुटपाथों और सर्विस रोड पर बैठाकर शराब पिलवाए। दुकानों के बाहर पानी, बर्फ, डिस्पोजल गिलास और चखने की अवैध दुकानें सजी हुई हैं। सिस्टम का दोगलापन देखिए—एक तरफ आबकारी महकमा आंखें मूंदकर अरबों के ठेकों की आड़ में इन अवैध अहातों को खुला संरक्षण दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ पुलिस विभाग सड़कों पर गश्त का दिखावा कर छोटे-मोटे पियक्कड़ों पर केस दर्ज करके अपनी दैनिक अपराध डायरी (DSR) के आंकड़े चमकाने में जुटा है।
नियमों का सरेआम कत्ल: सरकारी आबकारी नीति बनाम इंदौर की हकीकत
नियम 1: आबकारी नीति के अनुसार प्रदेश में औपचारिक अहाते पूरी तरह प्रतिबंधित हैं और दुकानों के पास बैठकर पीने की सख्त मनाही है।
हकीकत: हर वाइन शॉप के बाहर सर्विस लेन, फुटपाथ और सटी खुली जगहों को ही 'ओपन अहाता' बना दिया गया है, जहां शाम ढलते ही शराबियों की महफिलें सजती हैं।
नियम 2: शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल, धार्मिक स्थल और पार्कों के आसपास शराब का प्रदर्शन व सेवन पूरी तरह गैरकानूनी है।
हकीकत: शहर के प्रमुख अस्पतालों, कोचिंग हब, खेल मैदानों और मंदिरों की दीवारों के ठीक पीछे बेखौफ शराब की बोतलें खोली जा रही हैं।
नियम 3: दुकान के बाहर सार्वजनिक शांति भंग होने या अवैध रूप से शराब पिलवाने पर शराब ठेकेदार का लाइसेंस रद्द करने और भारी अर्थदंड का स्पष्ट प्रावधान है।
हकीकत: आबकारी अमले की कार्रवाई शून्य है। ठेकेदारों पर कभी आंच नहीं आती, सारा डंडा केवल सरेराह जाम छलका रहे शराबियों पर फटकार कर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है।
7 दिन का क्राइम मीटर: 75 केस, 80 शराबी गिरफ्तार; फिर भी शहरभर में सजते मयखाने
इंदौर पुलिस की पिछले एक सप्ताह (22 अगस्त से 29 अगस्त 2026) की दैनिक अपराध रिपोर्ट (DSR) के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि खुले और सार्वजनिक स्थानों पर शराबखोरी के खिलाफ पुलिस लगातार केस बना रही है। हफ्तेभर में आबकारी अधिनियम की धारा 36 के तहत कुल 75 प्रकरण दर्ज किए गए और 80 आरोपियों को पकड़ा गया:
न मंदिर की मर्यादा बची, न अस्पताल और कोचिंग छूटे; देखिए 8 सबसे शर्मनाक उदाहरण
पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज ये घटनाएं दर्शाती हैं कि शहर में शराबखोरी किस हद तक बेलगाम हो चुकी है:
1. सबसे व्यस्त 'रोबोट चौराहे' की सर्विस रोड पर खुला बार (थाना विजयनगर)
रिंग रोड का रोबोट चौराहा शहर के सबसे भारी ट्रैफिक और जाम वाले चौराहों में से एक है। यहां रोबोट वाइन शॉप के सामने सर्विस रोड पर शाम से लेकर देर रात तक डिस्पोजल और बीयर की केन के साथ शराबियों की महफिलें जमती हैं। एक तरफ आम जनता घंटों ट्रैफिक जाम से जूझती है, वहीं दूसरी तरफ सर्विस रोड पर पसरे शराबियों के हुड़दंग से राहगीरों व महिलाओं में दहशत का माहौल बना रहता है।
2. कोचिंग हब के ठीक सामने शराबखोरी (थाना संयोगितागंज)
ढक्कनवाला कुआं क्षेत्र में स्थित एलन (Allen) कोचिंग के ठीक सामने मुख्य मार्ग पर शराबियों को खुलेआम जाम छलकाते पकड़ा गया। जिस जगह पर हजारों छात्र-छात्राएं और बच्चियां कोचिंग के लिए आती-जाती हैं, उसी संस्थान की दहलीज को शराबियों ने अपना अड्डा बना लिया।
3. मंदिरों के ठीक पीछे और सामने खुले मयखाने (थाना राजेंद्र नगर व एमजी रोड)
आस्था के केंद्रों तक को नहीं बख्शा गया। राजेंद्र नगर में कुंदननगर वाइन शॉप से लगकर हरिधाम मंदिर के ठीक पीछे और एमजी रोड पर भैरव बाबा मंदिर के सामने आम रास्ते पर देशी शराब के क्वार्टर, डिस्पोजल गिलास और पानी की बोतलों के साथ महफिल जमाए पियक्कड़ पकड़े गए।
4. अस्पतालों के गेट और बाउंड्री पर शराबियों का कब्जा (थाना मल्हारगंज व तुकोगंज)
लाल अस्पताल के पीछे व मेन रोड पर तथा शेल्बी हॉस्पिटल के पास सड़क किनारे फुटपाथों पर शराबी बीयर और शराब पीते पाए गए। जहां चौबीसों घंटे गंभीर मरीज, एम्बुलेंस और तीमारदारों की आवाजाही रहती है, वहां शराबियों ने ओपन बार बना रखा था।
5. पुलिस थाने के ठीक नाक के नीचे महफिल (थाना भंवरकुआं)
कानून का खौफ किस कदर खत्म हो चुका है, इसका प्रमाण यह है कि भंवरकुआं थाना परिसर क्षेत्र में थाने के ठीक बाहर सार्वजनिक स्थल पर खड़ा होकर शराबी सरेराह शराब गटक रहा था।
6. चोइथराम चौराहे पर स्ट्रीट लाइट के उजाले में नशा (थाना राजेंद्र नगर)
शहर के सबसे प्रमुख और व्यस्ततम चौराहों में शुमार चोइथराम चौराहे पर अंधेरे में छिपने के बजाय सीधे स्ट्रीट लाइट की रोशनी के नीचे बैठकर खुलेआम शराब पी जा रही थी।
7. सार्वजनिक पार्क और खेल मैदान बने बार (थाना मल्हारगंज व परदेशीपुरा)
रुक्मणि उद्यान (पब्लिक पार्क) के पीछे और परदेशीपुरा के सुगनी देवी खेल मैदान में शराब की बोतलें खोली गईं। जहां बच्चे खेलने और परिवार टहलने आते हैं, उन जगहों को शराबियों ने अपनी अय्याशी का अड्डा बना दिया।
8. यात्रियों के बीच बस स्टैंड पर नशाखोरी (थाना भंवरकुआं)
तीन इमली बस स्टैंड पर सार्वजनिक शौचालय और यात्री प्रतीक्षालय के पास खुलेआम शराब पीते आरोपी को पकड़ा गया, जिससे वहां मौजूद मुसाफिरों और महिलाओं के लिए भारी असहजता खड़ी हुई।
असिस्टेंट कमिश्नर का 'मासूम' तर्क: 500 केस बनाए, जुर्माना वसूला, पर ताला नहीं लगा सकते!
अवैध अहातों और सड़कों पर सजते मयखानों को लेकर जब आबकारी विभाग से जवाब मांगा गया, तो आबकारी सहायक आयुक्त (Assistant Commissioner) अभिषेक तिवारी ने अपनी लाचारी का ठीकरा नियमों पर फोड़ दिया।
आबकारी सहायक आयुक्त अभिषेक तिवारी का पक्ष:
"ये औपचारिक अहाते नहीं हैं। शराब दुकानदारों ने कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए दुकानों के आसपास ढाबे जैसे बना लिए हैं। हम इन पर लगातार कार्रवाई करते हैं और न्यायालय में प्रकरण पेश करते हैं। अब तक हम ऐसे तकरीबन 500 प्रकरण बना चुके हैं और उनसे अर्थदंड (जुर्माना) भी वसूला गया है। लेकिन चूंकि ये ढाबे सीधे तौर पर लाइसेंसी शराब दुकानदार के नाम पर दर्ज नहीं हैं, इसलिए इन ढाबों को हटाने या पूरी तरह बंद कराने का अधिकार हमारे पास नहीं है।"
तर्क के पीछे का खेल:
आबकारी विभाग का यह बयान तंत्र की बेबसी नहीं, बल्कि खुली मिलीभगत का सबूत है। जब विभाग खुद मान रहा है कि 500 बार प्रकरण दर्ज हो चुके हैं, तो क्या यह साबित नहीं होता कि शराब ठेकेदारों ने सोची-समझी साजिश के तहत ये डमी ढाबे खड़े किए हैं? यदि 500 बार जुर्माना भरने के बाद भी वही ढाबा अगले दिन फिर शराबियों की महफिल सजा रहा है, तो क्या यह महज 'जुर्माना वसूली का लाइसेंस' बनकर नहीं रह गया है?
प्रशासन का डंडा बाकी जगह तेज, पर अवैध अहातों पर खामोशी का सिरप क्यों?
शहर में स्वच्छता, मिलावटखोरी या अतिक्रमण की बात आते ही जिला प्रशासन और नगर निगम का अमला तूफान खड़ा कर देता है। किसी होटल के किचन में थोड़ी गंदगी दिख जाए तो चंद मिनटों में सील करने का फरमान जारी हो जाता है, गरीबों के ठेले एक झटके में जब्त कर लिए जाते हैं।
लेकिन शराब दुकानों से सटे इन अवैध ढाबों पर आते ही जिला प्रशासन का बुलडोजर और पुलिस की फुर्ती क्यों गायब हो जाती है? जब आबकारी विभाग कह रहा है कि ढाबा हटाना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, तो जिला प्रशासन और नगर निगम प्रशासन क्यों गहरी नींद में सो रहा है? क्या ऊपर से सबको 'खामोशी का सिरप' पिला दिया गया है, ताकि शराब ठेकेदारों के मुनाफे और कमीशन के खेल में कोई रुकावट न आए?
Expose Live Take: सरकार और सिस्टम से सीधे सवाल
अवैध अहातों पर आबकारी अमले की चुप्पी का राज क्या है?
जब नियम साफ हैं कि दुकान के बाहर बैठकर पीना पूरी तरह प्रतिबंधित है, तो दुकानों के ठीक बाहर डिस्पोजल, पानी और चखना बिकवाने वाले सिंडिकेट पर आबकारी इंस्पेक्टर ताला क्यों नहीं लगाते?
शराब ठेकेदारों के लाइसेंस पर आंच क्यों नहीं आती?
पुलिस ने हफ्तेभर में 80 शराबियों पर मुकदमे लाद दिए, लेकिन जिन वाइन शॉप्स के ठीक सामने बैठकर वे पी रहे थे, उन ठेकेदारों को एक अदद नोटिस तक जारी क्यों नहीं किया गया?
क्या सरकारी नीति सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए है?
एक विभाग शराब बिकवाने और अवैध अहाते चलवाने के लिए आंखें मूंदे बैठा है और दूसरा विभाग सिर्फ केस की गिनती बढ़ाने के लिए गश्त का ढोंग कर रहा है। इस दोमुंहे सिस्टम ने पूरे शहर की कानून-व्यवस्था और आम नागरिकों की सुरक्षा को दांव पर लगा दिया है।

