ये लोग कौन हैं? इंदौर में रील के नाम पर तमाशा करने वाली पीढ़ी से तीखे सवाल

चंद व्यूज के लिए बीच सड़क पर लेटकर रील?

ये लोग कौन हैं? इंदौर में रील के नाम पर तमाशा करने वाली पीढ़ी से तीखे सवाल
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इंदौर में पढ़ने आते हैं या शहर का सिविक सेंस कुचलने? हाथ में 50 हजार का फोन और तमीज जीरो

चंद लाइक्स के लिए चौराहे पर मर्यादा का कत्ल, परवरिश और नागरिक समझ पर गहरा संकट

इंदौर के व्यस्त चौराहे पर बीच सड़क लेटकर रील बनाने का तमाशा सिर्फ एक वायरल वीडियो नहीं है। यह उस खोखली और बेशर्म मानसिकता का नंगा प्रदर्शन है, जहाँ सार्वजनिक सुरक्षा, ट्रैफिक नियम, सड़क पर चलती गाड़ियाँ और आम नागरिकों की सहूलियत सब ताक पर रख दी जाती हैं—और सिर्फ मोबाइल का कैमरा भगवान बन जाता है। पुलिस ने कानूनी कार्रवाई की, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कुछ ऐसे कड़वे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनसे अब कतई नजरें नहीं चुराई जा सकतीं—ये लोग कौन हैं, कहाँ से आते हैं और जिस शहर में इन्हें सिर छुपाने और पढ़ने की जगह मिलती है, उसी शहर की छाती पर ऐसा हुड़दंग मचाने की हिम्मत इनमें कहाँ से आती है?

जब यह सामने आता है कि रील बनाने वाली युवती धार जिले के मनावर से इंदौर पढ़ाई करने आई है, तो सवाल और गंभीर हो जाता है। सवाल किसी के छोटे शहर या कस्बे से आने का बिल्कुल नहीं है; इंदौर ने तो हमेशा दिल खोलकर हर किसी को अपनी बाहों में समेटा है। सवाल उस घटिया रवैये का है, जो शहर से सब कुछ हासिल तो करना चाहता है, लेकिन शहर को सम्मान और व्यवस्था देने के नाम पर उसे अपनी निजी जागीर और सड़ा हुआ शूटिंग सेट समझ लेता है।

इंदौर की मर्यादा को कचरा समझने वालों से सवाल क्यों न हो?

इंदौर ने यह पहचान किसी खैरात में नहीं पाई है। देश में स्वच्छता का परचम लहराना हो, कारोबार की मिसाल देनी हो या सुरक्षित और अनुशासित माहौल बनाना—इस शहर के बाशिंदों ने दिन-रात पसीना बहाकर इसे देश के नक्शे पर अव्वल बनाया है। यहाँ देश भर से युवा अपने सपने पूरे करने आते हैं। शहर सबको अपनाता है, रोजगार देता है, डिग्रियां देता है। लेकिन शहर की इस शराफत और मेहमाननवाजी का मतलब यह कतई नहीं है कि कोई भी मुँह उठाकर आए और सड़क पर तमाशा खड़ा कर दे।

सड़क के बीचों-बीच लेट जाना, रेड सिग्नल और जेब्रा क्रॉसिंग को नौटंकी का मंच बना देना और फिर उस फूहड़ता को सोशल मीडिया पर डालकर तालियां बटोरने की कोशिश करना किसी भी सभ्य समाज के मुँह पर तमाचा है। यह सिर्फ एक ट्रैफिक चालान का मामला नहीं है—यह सार्वजनिक मर्यादा की सरेआम हत्या है। जो विद्यार्थी इस शहर में आकर अपना भविष्य संवारने का दावा करते हैं, वे शहर को बदले में क्या दे रहे हैं? अनुशासन और नागरिक जिम्मेदारी, या फिर चंद सस्ते लाइक्स के लिए शहर की साख को चौराहे पर नीलाम करने की सनक?

यह कौन सी Gen Z है, जिसकी रीढ़ की हड्डी में सिर्फ 'कंटेंट' बचा है?

आज की नई पीढ़ी खुद को डिजिटल क्रांति की ध्वजवाहक कहती है। हाथ में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का एक्सेस होना कोई अपराध नहीं है। अपराध तब शुरू होता है जब कैमरा जिंदगी का हिस्सा नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी का मालिक बन बैठता है।

  • खाना खाया तो फोटो।
  • कॉफी की चुस्की ली तो रील।
  • दोस्तों से मिले तो कैमरा ऑन।
  • सड़क पर किसी की लाचारी दिखी तो लाइव स्ट्रीमिंग।
  • कहीं खूनी विवाद हुआ तो छुड़ाने के बजाय एंगल सेट करना।
  • कहीं सड़क हादसा हुआ तो तड़पते इंसान को अस्पताल पहुँचाने के बजाय पहले एचडी रिकॉर्डिंग।
  • और अब बेशर्मी की इंतेहा यह कि चलती सड़क पर खुद लेटकर भी नौटंकी!

सवाल यह है कि इस पागलपन का अंत कहाँ होगा? अगर किसी को कुछ सेकंड के वीडियो के लिए व्यस्त सड़क पर औंधे मुँह लेटना 'कूल' और 'क्रिएटिव' लगने लगे, तो यह किसी एक लड़की का भटकाव नहीं है। यह उस सड़ती हुई सोच का सबूत है, जहाँ वायरल होना इंसानियत और सही-गलत के हर पैमाने से बड़ा हो चुका है।

आंदोलन के नाम पर ज्ञान, और जिम्मेदारी के नाम पर शून्य?

यह वही पीढ़ी है जो सोशल मीडिया पर सिस्टम को सुधारने के लंबे-चौड़े भाषण देती है। अधिकारों की बात आए तो इनके हजारों ट्वीट्स और स्टेटस तैरने लगते हैं। पर्यावरण से लेकर राजनीति तक, हर मुद्दे पर ये क्रांति लाने का दावा करते हैं। यह जागरूकता अच्छी बात है, लेकिन ज्ञान देने वालों को यह क्यों याद नहीं रहता कि अधिकारों की पहली शर्त नागरिक कर्तव्य होती है?

अगर आप प्रशासन से अच्छी सड़कों की उम्मीद करते हैं, तो सड़क पर लेटकर ट्रैफिक जाम करने का हक आपको किसने दिया? अगर आप दूसरों से सिविक सेंस की मांग करते हैं, तो खुद अराजक बनकर शहर को चिढ़ाने की छूट आपको किसने दी? सोशल मीडिया पर क्रांतिकारी बनना बेहद आसान है, लेकिन एक जिम्मेदार नागरिक बनकर सड़क पर कायदे से चलना सबसे मुश्किल काम साबित हो रहा है।

कैमरे के पीछे इंसानियत पूरी तरह मर चुकी है क्या?

इस पूरे तमाशे का सबसे खौफनाक पहलू है—संवेदनहीनता। जिस वक्त कैमरा ऑन होता है, इन रील-बाजों को यह दिखाई ही नहीं देता कि सामने कौन खड़ा है। सड़क पर किसी को दफ्तर पहुँचने की जल्दी हो सकती है, किसी बेबस बाप को घर में भूखे बच्चों के लिए दवा लेकर जाना हो सकता है, किसी एंबुलेंस में जिंदगी और मौत से जूझता मरीज फंसा हो सकता है—लेकिन मोबाइल थामे इन स्वार्थी चेहरों के लिए उस वक्त दुनिया का इकलौता मकसद सिर्फ यह होता है कि उनका 'शॉट' सही एंगल से आया या नहीं।

यह कोई मासूम गलती नहीं है, यह संवेदना का खुला कत्ल है। जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए, क्या तब तक यह समाज आँखें मूँदकर इस पागलपन को सिर्फ 'बचपना' कहकर टालता रहेगा?

पैरेंटिंग के नाम पर सिर्फ मोबाइल का रिचार्ज?

इस पूरे तमाशे के बाद सबसे तीखा और असहज करने वाला सवाल माता-पिता की परवरिश पर उठता है। बच्चे के हाथ में 50 हजार का मोबाइल और अनलिमिटेड डेटा थमाने से पहले क्या आपने उसे इंसानियत और अदब का ककहरा सिखाया था?

क्या कभी उसे बैठाकर यह समझाया कि सड़क किसी के बाप की जागीर नहीं, एक सार्वजनिक अमानत है? क्या उसे बताया कि चौराहे पर लगी लाल बत्ती सिर्फ चालान से बचने का निशान नहीं, दूसरों की जिंदगी की सुरक्षा का पहरा है? क्या आपने कभी यह जांचा कि आपका बच्चा जिस फोन पर चौबीसों घंटे चिपका है, वह उससे अपनी पहचान बना रहा है या शहर के बीचों-बीच अपनी और अपने परिवार की फजीहत करवा रहा है? महंगे स्कूलों की भारी-भरकम फीस भर देना पैरेंटिंग नहीं है। पैरेंटिंग बच्चों को सामाजिक सीमाओं और नागरिक तमीज का अहसास कराने का नाम है।

डिग्रियां बांटने वाले कॉलेज कब अपनी जिम्मेदारी समझेंगे?

इंदौर को देश का बड़ा एजुकेशन हब कहा जाता है। हर साल लाखों छात्र यहाँ आते हैं। लेकिन जब किसी कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र को यह बुनियादी बात समझाने के लिए पुलिस को हथकड़ी और केस का सहारा लेना पड़े, तो यह सीधे तौर पर हमारी शिक्षा व्यवस्था की विफलता है।

अगर बड़े-बड़े कॉलेज सिर्फ अंग्रेजी बोलना, रटी-रटाई थ्योरी पास करना और नौकरी के पैकेज पाना ही सिखा रहे हैं, तो ऐसी शिक्षा का क्या मतलब? शिक्षित होने का सबसे पहला पैमाना यह है कि आप अपनी आजादी का इस्तेमाल वहीं तक करें जहाँ से दूसरे नागरिक की नाक शुरू होती है। अगर कॉलेज परिसर सिर्फ सर्टिफिकेट बांटने की फैक्ट्री बन चुके हैं और नागरिक अनुशासन सिखाने में नाकाम हैं, तो उन्हें भी इस शर्मिंदगी की बराबर जिम्मेदारी लेनी होगी।

इंदौर किसी का पर्सनल कंटेंट स्टूडियो नहीं है

इंदौर ने बाहर से आने वाले हर हुनर को सिर-आंखों पर बिठाया है। इस शहर ने सबको तरक्की की जमीन दी है। लेकिन शहर की इस दरियादिली का नाजायज फायदा उठाने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

यहाँ की सड़कें रील की शूटिंग के लिए नहीं बनी हैं। यहाँ के ऐतिहासिक चौराहे फूहड़ डांस स्टेप्स के लिए नहीं हैं। जेब्रा क्रॉसिंग मॉडल्स के कैटवॉक का रैंप नहीं है। शहर आपको अपने सपने पूरे करने की जगह देता है, खुलेआम छिछोरापन दिखाने का लाइसेंस नहीं।

संस्कार सिर्फ नमस्ते तक सीमित नहीं हैं

घर कहता है स्कूल सिखाएगा, स्कूल कहता है घर से सीखकर आएगा—और युवा इन दोनों के बीच मोबाइल की अंधी स्क्रीन से संस्कार सीख रहा है। इसी भ्रमजाल ने यह नौबत ला दी है।

समझ लीजिए कि संस्कार सिर्फ बड़ों के आगे झुककर पैर छूने और मीठी बातें करने का नाम नहीं है।

  • संस्कार यह है कि आप अपने स्वार्थ के लिए सड़क पर किसी राहगीर का रास्ता न रोकें।
  • संस्कार यह है कि आप अपनी आजादी और दूसरे की परेशानी के बीच की दीवार को पहचानें।
  • संस्कार यह है कि कैमरा निकालने से पहले सामने वाले इंसान की तकलीफ और गरिमा को समझें।
  • और सिविक सेंस यह है कि आपको यह अहसास रहे कि यह शहर सिर्फ आपका नहीं, सबका है।

Expose Live Take

इंदौर को ऐसे वायरल चेहरों की रत्ती भर जरूरत नहीं है, जो शहर को सस्ती पब्लिसिटी का तमाशा समझ लें। इंदौर को ऐसे युवाओं पर गर्व है जो अपनी मेहनत, अपने हुनर, अपने स्टार्टअप और अपनी तहजीब से शहर का सिर ऊँचा करते हैं।

फोन रखिए, सोशल मीडिया पर रील्स बनाइए, अपनी कला दिखाइए—किसी को कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन यह बात दिमाग में पत्थर की लकीर की तरह बिठा लीजिए कि आपकी व्यक्तिगत आजादी की सीमा वहीं खत्म हो जाती है, जहाँ से दूसरे आम नागरिक की असुविधा शुरू होती है।

अगली बार जब चौराहे पर रील्स बनाने के लिए ट्राइपॉड लगाएं या सड़क पर लेटें, तो सिर्फ यह मत सोचिए कि व्यूज कितने मिलेंगे। एक बार यह भी सोचिए कि जिस शहर की आबोहवा में आप सांस ले रहे हैं, क्या आप उस शहर की मिट्टी के सम्मान के लायक भी हैं या सिर्फ एक सस्ते वायरल तमाशे का जरिया?