मुरैना में एक्सप्रेस-वे की मिट्टी में मिला चांदी का ‘खजाना’? खबर फैली तो खुरपी-हंसिया लेकर पूरा गांव टूट पड़ा
सोचिए… सड़क की मिट्टी खोदते ही चांदी का सिक्का निकल आए! मुरैना में एक सिक्का मिला तो पूरा गांव टूट पड़ा—खुरपी, हंसिया, सरिया लेकर लोग मिट्टी छानने लगे। फिर 1913 के सिक्के मिले तो मामला खजाने से निकलकर 113 साल पुराने रहस्य तक पहुंच गया।
एक सिक्का मिला तो शुरू हुई खुदाई, फिर कई और सिक्के मिलने का दावा; 1913 की तारीख ने बढ़ाया रहस्य, अब 113 साल पुराने राज पर पुरातत्व विभाग की नजर
मुरैना ब्यूरो।
मुरैना में ग्वालियर-आगरा के बीच बन रहे ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे पर अचानक ऐसा हंगामा मचा कि जिसने देखा, वह हैरान रह गया। सड़क निर्माण के लिए बिछाई गई मिट्टी से पुराने चांदी के सिक्के निकलने की खबर क्या फैली, पूरा गांव एक्सप्रेस-वे की तरफ दौड़ पड़ा।
बच्चे हों या बुजुर्ग… महिलाएं हों या युवा… किसी के हाथ में खुरपी थी, किसी के हाथ में हंसिया। कोई लकड़ी लेकर पहुंचा तो कोई सरिया। मकसद एक ही था—
मिट्टी के नीचे दबा अगला चांदी का सिक्का किसके हाथ लगेगा?
और इसी बीच कहानी में ऐसा ट्विस्ट आया जिसने मामले को और रहस्यमय बना दिया।
मिलने वाले कुछ सिक्कों पर साल 1913 लिखा होने की बात सामने आई है।
यानी मामला सिर्फ चांदी के सिक्कों का नहीं, करीब एक सदी पुराने इतिहास का भी हो सकता है।
पहले एक सिक्का मिला... फिर तीन-चार और निकल आए
मामला माता बसैया थाना क्षेत्र के डोंगरपुर लोधा गांव का है।
करीब तीन दिन पहले गांव का एक युवक निर्माणाधीन एक्सप्रेस-वे से गुजर रहा था। इसी दौरान उसकी नजर मिट्टी में दबे एक पुराने सिक्के पर पड़ी।
उसने सिक्का उठाया और घर चला गया।
लेकिन घर पहुंचते ही उसके मन में सवाल उठा—
अगर एक सिक्का यहां दबा है, तो क्या और भी हैं?
अगले दिन वह कुछ दोस्तों को लेकर उसी जगह पहुंचा। मिट्टी कुरेड़नी शुरू की गई तो तीन-चार और चांदी के सिक्के मिलने का दावा किया गया।
इसके बाद दो दिन तक कुछ युवक कथित तौर पर चुपचाप उसी जगह खुदाई करने आते रहे।
लेकिन मंगलवार सुबह यह राज गांवभर में फैल गया। फिर जो हुआ, उसने एक्सप्रेस-वे का पूरा नजारा बदल दिया।
खबर फैली और पूरा गांव ‘खजाना’ खोदने पहुंच गया
चांदी के सिक्के मिलने की खबर आग की तरह फैली। देखते ही देखते निर्माण स्थल पर ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई।
खुरपी चली। हंसिया चला। लकड़ी और सरिया तक मिट्टी में घुसा दिए गए।
बच्चे भी मिट्टी कुरेद रहे थे और बुजुर्ग भी। महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। हर कोई उम्मीद लगाए था कि पता नहीं अगली खुदाई में क्या निकल आए।
ग्रामीणों के अलग-अलग दावों में अब तक 8 से 10 और 12 से 15 तक सिक्के मिलने की बात सामने आई है। हालांकि सिक्कों की वास्तविक संख्या की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
वीडियो वायरल... ‘देखो, सिक्का मिला है!’
मामला अब गांव की चौपाल तक सीमित नहीं रहा।
खुदाई के वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल होने लगे। एक वीडियो में युवक को मिट्टी खोदने के दौरान चांदी का सिक्का मिलने का दावा किया जा रहा है।
इसी के साथ गांव में सिक्कों की चर्चा और तेज हो गई।
कुछ ग्रामीणों ने यह आरोप भी लगाया कि एक्सप्रेस-वे निर्माण में लगी मशीनों से खुदाई के दौरान भी बड़ी संख्या में सिक्के निकले थे और मशीन चालक कथित तौर पर उन्हें लेकर चले गए।
हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
पुलिस पहुंची तो भागे लोग... पुलिस गई तो फिर शुरू हुई खुदाई!
माता बसैया थाना प्रभारी विवेक सिंह तोमर के मुताबिक मंगलवार सुबह करीब साढ़े 10 बजे पुलिस को मामले की जानकारी मिली।
पुलिस मौके पर पहुंची तो कई ग्रामीण निर्माणाधीन एक्सप्रेस-वे की मिट्टी खोद रहे थे। पुलिस ने लोगों को वहां से हटाया। लेकिन कुछ देर बाद जब पुलिस टीम वापस लौटी तो ग्रामीणों के दोबारा खुदाई करने की बात सामने आई।
यानी सिक्कों की तलाश में लोगों का उत्साह इतना बढ़ गया था कि पुलिस की मौजूदगी भी उन्हें ज्यादा देर रोक नहीं सकी।
लेकिन असली रहस्य यहां से शुरू होता है...
अब कहानी का सबसे बड़ा सवाल सामने आया है।
जिस मिट्टी से सिक्के निकल रहे हैं, वह डोंगरपुर की मिट्टी नहीं है।
थाना प्रभारी के मुताबिक शुरुआती पूछताछ में पता चला है कि एक्सप्रेस-वे के लिए यहां डाली गई मिट्टी स्थानीय नहीं है।
यह आसपास के किसी खेत से भी नहीं लाई गई। मिट्टी किसी दूसरी जगह से खोदकर यहां लाई गई है।
बस यही बात पूरे मामले को और रहस्यमय बना देती है। क्योंकि अब सवाल सिक्कों का कम और मिट्टी के स्रोत का ज्यादा है।
आखिर मिट्टी आई कहां से? और वहां क्या दबा था?
अगर 1913 के सिक्के इसी मिट्टी में दबे थे तो सवाल सीधा है—
मिट्टी आखिर कहां से उठाई गई थी?
- उस जगह पर कभी कोई पुरानी बस्ती थी?
- कोई पुराना मकान?
- कोई व्यापारिक रास्ता?
- या फिर जमीन के नीचे किसी पुराने समय की कोई और कहानी दबी थी?
फिलहाल इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है।
1913 की तारीख ने बढ़ा दिया रोमांच
मामले में सामने आई जानकारी के मुताबिक कुछ सिक्कों पर 1913 अंकित होने की बात कही जा रही है।
इन सिक्कों को ब्रिटिश काल का बताया जा रहा है और राजा जॉर्ज पंचम के समय के चांदी के सिक्कों से जोड़ा जा रहा है।
इनमें करीब 91 प्रतिशत तक चांदी होने की बात भी सामने आई है।
लेकिन यहां सबसे जरूरी बात यह है कि सिक्कों की असली उम्र, प्रामाणिकता, धातु संरचना और ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि अभी विशेषज्ञ जांच के बाद ही होगी।
यानी फिलहाल 1913 वाला एंगल सामने आया है, लेकिन अंतिम मुहर लगना बाकी है।
प्रशासन ने संभाला मोर्चा, अब पुरातत्व विभाग खोलेगा राज
मामला सामने आने के बाद प्रशासन भी सक्रिय हो गया है।
अपर कलेक्टर अश्विनी रावत ने एसडीएम रामनिवास सिंह सिकरवार को मामले की सत्यता पता लगाने के निर्देश दिए हैं।
प्रशासन ने कहा है कि यदि सिक्के मिलते हैं तो उन्हें जब्त कर पुरातत्व विभाग को सौंपा जाए।
अब जांच में यह पता लगाया जाएगा कि सिक्के वास्तव में कितने पुराने हैं, कितने सिक्के मिले हैं और सबसे अहम—वे उस मिट्टी में पहुंचे कैसे।
Expose Live Take
सिक्का असली है या नहीं, यह जांच बताएगी। सिक्के कितने हैं, यह भी जांच बताएगी। लेकिन असली सवाल शायद इससे भी बड़ा है—जिस जगह से यह मिट्टी उठाकर एक्सप्रेस-वे पर डाली गई, वहां आखिर क्या था?
क्योंकि अगर 1913 के सिक्के वाकई उसी मिट्टी में दबे थे, तो एक्सप्रेस-वे ने सिर्फ सड़क नहीं बनाई...
उसने शायद जमीन के नीचे दबा एक पुराना राज भी बाहर निकाल दिया है।
अब इंतजार उस जांच का है, जो बताएगी—
ये सिर्फ पुराने चांदी के सिक्के हैं... या मुरैना की मिट्टी में छिपी किसी भूली-बिसरी कहानी का पहला पन्ना?
