Mirzapur The Movie Review: 3 घंटे का भौकाल या खिंचा हुआ ड्रामा? बड़े पर्दे पर कालीन भैया और मुन्ना का स्वैग

Mirzapur The Movie में कालीन भैया का भौकाल, मुन्ना भैया की वापसी और रवि किशन का नया अंदाज बड़े पर्दे पर कितना धमाल मचाता है? क्या 3 घंटे 15 मिनट की यह फिल्म सच में पैसा वसूल है या लंबा रनटाइम बन गया इसका सबसे बड़ा विलेन? जानिए बिना स्पॉइलर पूरा रिव्यू और Expose Live की रेटिंग।

Mirzapur The Movie Review: 3 घंटे का भौकाल या खिंचा हुआ ड्रामा? बड़े पर्दे पर कालीन भैया और मुन्ना का स्वैग
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पंकज त्रिपाठी और दिव्येंदु ने फिर जमाया रंग, रवि किशन ने लूटी महफिल; लेकिन 3 घंटे 15 मिनट की लंबाई और सुस्त स्क्रीनप्ले ने बिगाड़ा खेल 

रेटिंग: ⭐⭐⭐☆☆ (3/5)

शैली (Genre): क्राइम थ्रिलर / एक्शन

निर्देशक: गुरमीत सिंह

लेखक: पुनीत कृष्णा

मुख्य कलाकार: पंकज त्रिपाठी, दिव्येंदु शर्मा, अली फज़ल, रवि किशन, जितेंद्र कुमार, रसिका दुग्गल, श्वेता त्रिपाठी

रनटाइम: 3 घंटे 15 मिनट

क्विक टेक (Quick Take):

ओटीटी के सबसे चहेते देसी गैंगस्टर ड्रामे को 70mm स्क्रीन पर उतारने का दांव आधा सफल और आधा भारी पड़ता दिखता है। पंकज त्रिपाठी का गहरा ठहराव, दिव्येंदु का चिर-परिचित बेपरवाह अंदाज और रवि किशन का देसी स्वैग फिल्म की रीढ़ हैं। लेकिन 3 घंटे 15 मिनट की भारी-भरकम लंबाई और बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले इसे एक ऑल-टाइम कल्ट क्लासिक बनने की दौड़ में पीछे छोड़ देता है।

क्या है कहानी का प्लॉट? (Storyline)

'मिर्ज़ापुर: द मूवी' की कहानी दर्शकों को वापस उसी दौर में ले जाती है जहाँ से पूर्वांचल के बाहुबल, कट्टा-तमंचों और कालीन के कारोबार का खूनी खेल शुरू हुआ था। मिर्ज़ापुर की गद्दी पर अखंडानंद त्रिपाठी यानी 'कालीन भैया' (पंकज त्रिपाठी) का एकछत्र राज है, और मुन्ना भैया (दिव्येंदु) हमेशा की तरह अपने पिता के साए से बाहर निकलकर खुद को पूर्वांचल का नया बेताज बादशाह साबित करने की फिराक में हैं।

इस बीच, पूर्वांचल के सत्ता गलियारों में एंट्री होती है 'बब्बन यादव' (रवि किशन) की, जो कालीन भैया के सिंडिकेट में सीधी सेंध लगाने की ताकत रखता है। उधर गुड्डू (अली फज़ल) और बबलू (जितेंद्र कुमार) पंडित अपने वजूद और वर्चस्व की खूनी जंग में उतर चुके हैं। सत्ता, बंदूक, पारिवारिक रंजिश और बदले की यह त्रिकोणीय लड़ाई 70mm के पर्दे पर कैसे आकार लेती है, फिल्म इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।

स्क्रीनप्ले और लेखन (Screenplay & Writing):

पुनीत कृष्णा की कलम पूर्वांचली बोली, ठसक और सीटीमार वन-लाइनर्स के मामले में पूरी तरह फॉर्म में है। डायलॉग्स इतने देसी और धारदार हैं कि कई सीन्स में सिनेमाहॉल तालियों और सीटियों से गूंज उठता है।

हालाँकि, स्क्रीनप्ले के स्तर पर फिल्म लड़खड़ाती है। 10 एपिसोड वाली वेब सीरीज के फैलाव को एक सवा तीन घंटे की फीचर फिल्म में समेटने की कोशिश में राइटर और डायरेक्टर ने बहुत सारे सब-प्लॉट्स एक साथ खोल दिए हैं। पहले हाफ में पेसिंग (रफ्तार) काफी सुस्त है और कहानी रफ्तार पकड़ने में बहुत वक्त लेती है। इसके अलावा, एक गंभीर क्राइम ड्रामा के बीच कमर्शियल फिल्मों की तर्ज पर गानों को ठूंसना स्क्रीनप्ले के ग्रिप को कमजोर कर देता है।

एक्टिंग परफॉर्मेंस (Acting Performances):

पंकज त्रिपाठी (कालीन भैया)

पंकज त्रिपाठी एक बार फिर साबित करते हैं कि बिना आवाज़ ऊंची किए सिर्फ आँखों और बॉडी लैंग्वेज से खौफ कैसे पैदा किया जाता है। उनका ठहराव फिल्म का सबसे बड़ा एंकर है।

दिव्येंदु शर्मा (मुन्ना भैया)

मुन्ना त्रिपाठी के रूप में दिव्येंदु जैसे ही स्क्रीन पर आते हैं, फिल्म में जान आ जाती है। उनका वही बेपरवाह, सनकी और लाउड अंदाज बड़े पर्दे पर दोगुने प्रभाव के साथ लौटता है।

अली फज़ल (गुड्डू पंडित)

अली फज़ल का raw अग्रेशन और स्क्रीन प्रेजेंस कमाल है। एक्शन सीन्स में गुड्डू पंडित का जुनून साफ झलकता है।

रवि किशन (बब्बन यादव - शोस्टॉपर)

फिल्म का असली ट्रंप कार्ड रवि किशन हैं। 'बब्बन यादव' के किरदार में उनका देसी लहजा, स्वैग और डायलॉग डिलीवरी इतनी दमदार है कि वे कई सीन्स में बाकी सब पर भारी पड़ते हैं।

जितेंद्र कुमार (बबलू पंडित)

जितेंद्र कुमार ने बबलू के शांत और दिमागदार किरदार में पूरी ईमानदारी से काम किया है। हालांकि, ओरिजिनल सीरीज में विक्रांत मैसी द्वारा बनाई गई गहरी छाप और गुड्डू-बबलू की पुरानी ट्यूनिंग को पूरी तरह मैच करना उनके लिए एक कठिन चुनौती साबित हुआ है।

सपोर्टिंग कास्ट

रसिका दुग्गल (बीना त्रिपाठी) और श्वेता त्रिपाठी (गोलू गुप्ता) को सीमित स्क्रीन टाइम मिला है, लेकिन जितने भी सीन्स उनके हिस्से आए हैं, उन्होंने प्रभावित किया है।

डायरेक्शन और टेक्निकल आस्पेक्ट्स (Direction & Technical Aspects):

निर्देशन (Direction)

डायरेक्टर गुरमीत सिंह मिर्ज़ापुर की दुनिया की नब्ज को बखूबी पहचानते हैं। उन्होंने बड़े पर्दे के हिसाब से इसके कैनवास और स्केल को काफी भव्य बनाया है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी चूक एडिटिंग टेबल पर हुई है, जहाँ वे फिल्म के भटकाव और अतिरिक्त फुटेज पर कैंची चलाने में नाकाम रहे।

सिनेमैटोग्राफी (Cinematography)

संजय कपूर का कैमरा वर्क शानदार है। बनारस और मिर्ज़ापुर की संकरी गलियां, गंगा के घाट और धूल-मिट्टी से भरे बीहड़ बड़े पर्दे पर बेहद सिनेमैटिक और रियलिस्टिक लगते हैं।

बैकग्राउंड स्कोर व म्यूजिक (BGM & Sound)

जॉन स्टीवर्ट एडुरी का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की जान है। हर एक्शन सीक्वेंस और थ्रिलिंग मोमेंट पर बजने वाला लाउड बीजीएम थिएटर्स में रोंगटे खड़े करने का काम करता है।

एक्शन कोरियोग्राफी (Action)

फिल्म का एक्शन ओटीटी सीरीज से कहीं ज्यादा रॉ, खूनी और 70mm स्क्रीन के अनुकूल डिजाइन किया गया है।

क्या है खास? (The Positives):

  1. मुन्ना भैया और कालीन भैया की आइकॉनिक जुगलबंदी की बड़े पर्दे पर वापसी।
  2. बब्बन यादव के रोल में रवि किशन की महफिल लूटने वाली परफॉर्मेंस।
  3. सीटीमार डायलॉग्स और थिएटर को हिला देने वाला बैकग्राउंड स्कोर (BGM)।
  4. रॉ और बिना समझौते वाला देसी एक्शन।

कहाँ चूक गई फिल्म? (The Negatives):

1. 3 घंटे 15 मिनट की अत्यधिक लंबाई:

फिल्म कम से कम 25 से 30 मिनट छोटी और क्रिस्प होनी चाहिए थी।

2. सुस्त फर्स्ट हाफ:

इंटरवल से पहले कहानी बहुत धीमी गति से आगे बढ़ती है।

3. बेवजह के गानों का तड़का:

गैंगस्टर ड्रामा के थ्रिल और टेंशन के बीच गानों की एंट्री दर्शकों का मूड खराब करती है।

4. अनुमानित टाइमलाइन:

चूंकि यह कहानी पहले के बैकड्रॉप पर आधारित है, इसलिए कई बड़े ट्विस्ट्स का असर पहले से पता होने के कारण फीका पड़ जाता है।

Category Ratings

कैटेगरी

रेटिंग

Story

⭐⭐⭐☆☆

Screenplay

⭐⭐☆☆☆

Direction

⭐⭐⭐☆☆

Acting

⭐⭐⭐⭐☆

Action

⭐⭐⭐⭐☆

Cinematography

⭐⭐⭐⭐☆

BGM

⭐⭐⭐⭐☆

Entertainment

⭐⭐⭐☆☆

Coffee Break Score

⭐⭐⭐☆☆

Gen Z Meter

⭐⭐⭐⯨☆

Final / Expose Live Rating

⭐⭐⭐☆☆ 3 / 5

'Mirzapur: The Movie' एक ऐसा अनुभव है जहाँ पुराने किरदारों का भौकाल और अभिनेताओं का स्वैग फिल्म को थामने की पूरी कोशिश करता है, लेकिन 3 घंटे 15 मिनट का अत्यधिक लंबा रनटाइम, सुस्त फर्स्ट हाफ और बेवजह के गाने इसके असर को थोड़ा कुंद कर देते हैं। अगर आप मिर्ज़ापुर और मुन्ना भैया के कट्टर फैन हैं, तो थिएटर में बड़े पर्दे का यह खूनी खेल एक बार जरूर देखने लायक है।