MP Teacher Award 2026: मप्र के शिक्षा सिस्टम की खुली पोल! सवा चार लाख शिक्षकों की फौज में सिर्फ 33 निकले ‘बेस्ट’

सवा 4 लाख शिक्षकों वाले मध्य प्रदेश में आखिर ऐसा क्या हुआ कि राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार के लिए सिर्फ 33 नाम ही चुने गए और 77 कुर्सियां खाली रह गईं? 38 दिन चली चयन प्रक्रिया के बाद सामने आए आंकड़े चौंकाने वाले हैं—भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर समेत 33 जिले पूरी तरह शून्य रहे। जानिए इस चयन सूची ने मप्र के शिक्षा सिस्टम पर कौन से बड़े सवाल खड़े कर दिए।

MP Teacher Award 2026: मप्र के शिक्षा सिस्टम की खुली पोल! सवा चार लाख शिक्षकों की फौज में सिर्फ 33 निकले ‘बेस्ट’
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विमर्श पोर्टल से शुरू हुई 38 दिनों की चयन प्रक्रिया के बाद खुली पोल, 110 में से 77 कुर्सियां रह गईं खाली, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर समेत 33 जिलों से एक भी शिक्षक नहीं बना पाया जगह

भोपाल। स्पेशल रिपोर्ट

शिक्षक दिवस पर अपनी पीठ थपथपाने वाले मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग के दावों की हवा उसके अपने ही एक आधिकारिक आदेश ने निकाल दी है। केंद्र सरकार के नेशनल एजुकेशन पोर्टल (UDISE+) के आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में करीब 4.2 लाख (सवा चार लाख) शिक्षक पदस्थ हैं।

करोड़ों रुपए का सालाना बजट, निष्ठा और दीक्षा जैसी डिजिटल ट्रेनिंग और बैठकों में गुणवत्ता सुधार के लंबे-चौड़े दावों के बावजूद स्थिति यह है कि 'राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार - 2026' के लिए विभाग को पूरे 55 जिलों में से महज 33 शिक्षक ही मानकों पर खरे मिले।

लोक शिक्षण संचालनालय (DPI), मध्य प्रदेश द्वारा जारी चयन सूची के आंकड़ों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रदेश का एजुकेशन सिस्टम बुनियादी मानकों पर पिछड़ चुके शिक्षकों के भरोसे चल रहा है?

27 जुलाई को जारी हुआ था आदेश, 38 दिनों तक चली त्रिस्तरीय छंटनी

लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा जारी आदेश के अनुसार, इस पूरी चयन प्रक्रिया की नींव 27 जुलाई 2026 को जारी आदेश तहत रखी गई थी।

करीब 38 दिनों तक चली यह चयन प्रक्रिया तीन कड़े चरणों से गुजरी:

1. विमर्श पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन

27 जुलाई के सर्कुलर के आधार पर प्रदेशभर के शिक्षकों से विभागीय 'विमर्श पोर्टल' पर ऑनलाइन आवेदन और स्व-नामांकन मंगाए गए।

2. जिला स्तरीय चयन समिति की स्क्रूटनी

प्रत्येक जिले में कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) की अगुवाई वाली चयन समिति ने शिक्षकों के सेवा रिकॉर्ड, पिछले 5 वर्षों के बोर्ड व वार्षिक परीक्षा परिणाम, 90% ऑनलाइन ई-हाजिरी और नवाचारों के दावों का भौतिक सत्यापन किया। मेरिट के आधार पर सीमित नाम राज्य स्तर को भेजे गए।

3. भोपाल में राज्य स्तरीय प्रेजेंटेशन और इंटरव्यू

जिला स्तर से छंटकर आए शिक्षकों को भोपाल में राज्य स्तरीय चयन समिति के सामने पेश होना पड़ा। यहां उनका व्यक्तिगत पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन (PPT) और साक्षात्कार हुआ।

इसके बाद कड़े गुणांक (Merit Score) के आधार पर प्रशासनिक अनुमोदन लेकर अंतिम 33 नामों की सूची जारी की गई।

110 का तय कोटा, पर 77 कुर्सियां रह गईं खाली

स्कूल शिक्षा विभाग की व्यवस्था के अनुसार प्रदेश के सभी 55 जिलों से दोनों श्रेणियों में 1-1 शिक्षक चुनकर कुल 110 शिक्षकों को यह राज्य स्तरीय पुरस्कार दिया जाना था।

110 के तय कोटे के सामने केवल 33 शिक्षकों का चुना जाना यह साबित करता है कि 77 पदों के लिए विभाग को योग्य दावेदार ही नहीं मिले।

श्रेणीवार स्थिति: उच्चतर स्तर पर हालात सबसे ज्यादा खराब

कक्षा 1 से 8: 37 जिलों का खाता नहीं खुला

55 जिलों में से सिर्फ 18 जिलों के 18 शिक्षक ही पात्रता व प्रेजेंटेशन की बाधा पार कर सके। बाकी 37 जिलों से एक भी शिक्षक इस श्रेणी में स्थान नहीं बना पाया।

कक्षा 9 से 12: 40 जिलों का पूरी तरह सफाया

9वीं से 12वीं की पढ़ाई कराने वाले शिक्षकों की स्थिति और भी शर्मनाक रही। 55 जिलों में से महज 15 जिलों के 15 शिक्षक/प्राचार्य ही पुरस्कार के पात्र मिले। यानी 40 जिलों का इस श्रेणी में पूरी तरह सफाया हो गया।

राजधानी भोपाल समेत 33 जिले पूरी तरह शून्य

इस चयन सूची ने उन संभागों और बड़े जिलों की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार किया है जो खुद को शिक्षा का हब बताते हैं।

शून्य रहने वाले प्रमुख जिले

राजधानी भोपाल, संस्कारधानी जबलपुर, ऐतिहासिक शहर ग्वालियर, रीवा और सागर जैसे बड़े संभागीय मुख्यालयों से दोनों श्रेणियों में एक भी शिक्षक जगह नहीं बना सका।

इसके अलावा देवास, धार, खरगोन, खंडवा, सीहोर, विदिशा, मुरैना, भिंड, शिवपुरी, टीकमगढ़ और शहडोल समेत कुल 33 जिलों की झोली पूरी तरह खाली रही।

इंदौर की स्थिति: हायर सेकेंडरी में बची लाज, मिडिल में सन्नाटा

आर्थिक राजधानी इंदौर की बात करें तो कक्षा 1 से 8 (मिडिल स्तर) में जिले का खाता तक नहीं खुला।

हालांकि कक्षा 9 से 12 (हायर सेकेंडरी स्तर) में शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बुरानखेड़ी के प्राचार्य श्री अरुण कुमार मित्तल का चयन हुआ, जिससे इंदौर का नाम सूची में दर्ज हो सका।

अगर यह एक नाम न होता, तो इंदौर भी शून्य वाले 33 जिलों की कतार में खड़ा नजर आता।

चयनित शिक्षकों की जिलेवार सूची

मांक

कक्षा 1 से 8 (माध्यमिक)

कक्षा 9 से 12 (उच्चतर)

1

आगर मालवा — श्री शिवलाल दांगी (मा.शि.)

बालाघाट — सुश्री पूनम मिश्रा (उ.मा.शि.)

2

बालाघाट — श्री धन्नालाल बिसेन (मा.शि.)

छतरपुर — श्री बिहारी लाल प्रजापति (उ.मा.शि.)

3

बैतूल — श्री रितेश कुमार पथाडे (प्रा.शि.)

छिंदवाड़ा — श्री अरुण कुमार भादे (मा.शि.)

4

दमोह — श्री सुखनंदन साहू (प्रा.शि.)

दमोह — श्री बलीराम अहिरवार (मा.शि.)

5

गुना — श्री नरेन्द्र कुमार भारद्वाज (मा.शि.)

गुना — श्री मुकेश कुमार शर्मा (मा.शि.)

6

होशंगाबाद — श्री ओमप्रकाश विश्वकर्मा (मा.शि.)

इंदौर — श्री अरुण कुमार मित्तल (प्राचार्य)

7

कटनी — श्री महेन्द्र सिंह ठाकुर (स.शि.)

मंदसौर — श्री मुकेश कुमार प्रजापति (उ.मा.शि.)

8

मंदसौर — श्री राकेश कुमार गुप्ता (प्रा.शि.)

नरसिंहपुर — श्री मनीष तिवारी (मा.शि.)

9

नरसिंहपुर — सुश्री शिखा शर्मा (मा.शि.)

निवाड़ी — श्री अजय कुमार मिश्रा (उ.मा.शि.)

10

नीमच — श्री महेन्द्र सिंह पंवार (मा.शि.)

राजगढ़ — श्री मुकेश नागर (मा.शि.)

11

निवाड़ी — सुश्री ज्योति पाठक (प्रा.शि.)

रतलाम — श्री राजेश माहेश्वरी (उ.मा.शि.)

12

रायसेन — श्री राकेश कुमार वर्मा (मा.शि.)

सतना — श्री मोहित कुमार गर्ग (उ.मा.शि.)

13

राजगढ़ — श्री सुरेशचंद्र सोनी (प्रा.शि.)

सिवनी — सुश्री पूजा पाण्डेय (मा.शि.)

14

रतलाम — सुश्री शर्मिला उपाध्याय (प्रा.शि.)

सीधी — श्री सतीश कुमार पाण्डेय (मा.शि.)

15

सिवनी — सुश्री रीना देवी कटरे (प्रा.शि.)

उज्जैन — सुश्री श्वेता तिवारी (मा.शि.)

16

शाजापुर — श्री हेमंत कुमार वैद्य (मा.शि.)

17

सीधी — श्री राकेश कुमार द्विवेदी (मा.शि.)

18

उज्जैन — सुश्री सीमा परमार (प्रा.शि.)

सवाल: क्या नाकाबिल सिस्टम के भरोसे है मध्य प्रदेश का भविष्य?

आदेश के अनुसार, चयनित 33 शिक्षकों को 4 सितंबर शाम 5 बजे तक भोपाल के एमपी नगर स्थित होटल प्लेजर इन में रिपोर्ट करने को कहा गया है। 5 सितंबर (शिक्षक दिवस) को प्रशासन अकादमी के 'स्वर्ण जयंती ऑडिटोरियम' में इन्हें सम्मानित किया जाएगा।

मंच सजेगा और तालियां भी बजेंगी, लेकिन 4.2 लाख शिक्षकों के बीच 77 सीटों का खाली रह जाना और 33 जिलों का शून्य पर सिमटना सीधे तौर पर स्कूल शिक्षा विभाग के चेहरे पर तमाचा है।

यह स्थिति दो ही बातें साबित करती है—या तो लाखों शिक्षक छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और परिणाम देने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं, या फिर विभाग की जटिल ऑनलाइन प्रक्रिया और लचर प्रबंधन के चलते जमीनी स्तर पर काम करने वाले शिक्षक इस दौड़ से खुद को अलग रख रहे हैं।