संविधान से विधानसभा तक... 77 साल बाद मध्य प्रदेश में UCC पर लगी मुहर
मध्य प्रदेश विधानसभा से UCC विधेयक पारित होने के साथ 77 साल पुराने संवैधानिक सफर का नया अध्याय शुरू हुआ। जानिए अनुच्छेद-44, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, केंद्र की रणनीति, उत्तराखंड मॉडल और MP तक पहुंचे Uniform Civil Code की पूरी कहानी।
अनुच्छेद-44 से शुरू हुआ सफर, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार याद दिलाया, केंद्र ने बनाया एजेंडा... अब मोहन सरकार ने कानून की दिशा में बढ़ाया सबसे बड़ा कदम
भोपाल।
मध्य प्रदेश विधानसभा ने भारी हंगामे के बीच समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पारित कर दिया। लेकिन यह केवल एक राज्य का कानून नहीं, बल्कि लगभग 77 साल पुरे संवैधानिक, न्यायिक और राजनीतिक सफर का नया पड़ाव है। संविधान सभा की बहसों से लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों, भाजपा के राष्ट्रीय एजेंडे और उत्तराखंड मॉडल तक की पूरी प्रक्रिया के बाद अब मध्य प्रदेश दूसरा बड़ा राज्य बन गया है जिसने UCC को कानून का रूप देने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया है।
यह सिर्फ MP का कानून नहीं, 77 साल पुराने संवैधानिक वादे की अगली कड़ी है
UCC को केवल विधानसभा में पास हुए एक विधेयक के रूप में देखना अधूरी तस्वीर होगी। इसकी जड़ें 1946 की संविधान सभा तक जाती हैं। बीच में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इसकी जरूरत बताई, केंद्र सरकार ने इसे राजनीतिक एजेंडा बनाया और आखिरकार राज्यों के जरिए इसे लागू करने का मॉडल तैयार हुआ।
यानी...
"संविधान ने रास्ता दिखाया, सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया, केंद्र ने राजनीतिक एजेंडा बनाया... और मध्य प्रदेश ने उसे कानून में बदल दिया।"
1946-49 | संविधान सभा में हुई शुरुआत
जब संविधान बनाया जा रहा था, तब सवाल उठा कि क्या पूरे देश में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में एक समान कानून होना चाहिए।
लंबी बहस के बाद इसे मौलिक अधिकार नहीं बनाया गया, बल्कि अनुच्छेद-44 के तहत राज्य के नीति निदेशक तत्व (Directive Principles) में शामिल किया गया।
यानी संविधान ने राज्यों को भविष्य में UCC लागू करने का लक्ष्य दिया, लेकिन इसे तत्काल लागू करना अनिवार्य नहीं बनाया।
1950 से 1985 | संविधान में लिखा रहा, जमीन पर लागू नहीं हुआ
संविधान लागू होने के बाद—
- हिंदू कानूनों में सुधार हुए।
- मुस्लिम, ईसाई, पारसी समेत विभिन्न समुदायों के अपने-अपने Personal Laws जारी रहे।
- UCC केवल संवैधानिक लक्ष्य बनकर रह गया।
1985 | शाह बानो केस ने बदल दी बहस
सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो केस में फैसला सुनाते हुए पहली बार स्पष्ट कहा कि देश में Uniform Civil Code की जरूरत है।
यहीं से यह मुद्दा सामाजिक बहस से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन गया।
सुप्रीम Court ने कई बार दिलाई याद
शाह बानो के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में UCC लागू करने की आवश्यकता पर टिप्पणी की।
- Shah Bano (1985)
- Sarla Mudgal (1995)
- Paulo Coutinho (2019)
हर बार अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-44 की भावना पर आगे बढ़ने की जरूरत है।
BJP के राष्ट्रीय एजेंडे में कैसे आया?
1990 के दशक से भाजपा ने UCC को अपने तीन प्रमुख वैचारिक एजेंडों में शामिल किया—
- राम मंदिर
- अनुच्छेद-370
- समान नागरिक संहिता (UCC)
राम मंदिर और अनुच्छेद-370 पर फैसलों के बाद UCC अगला बड़ा एजेंडा बन गया।
केंद्र सरकार की भूमिका क्या रही?
यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है।
मध्य प्रदेश का UCC अचानक लिया गया फैसला नहीं है। इसके पीछे केंद्र सरकार की दीर्घकालिक नीति भी रही।
केंद्र ने क्या किया?
- UCC को लगातार राजनीतिक एजेंडे में रखा।
- 22वें विधि आयोग के जरिए देशभर से सुझाव मांगे।
- राष्ट्रीय स्तर पर बहस को आगे बढ़ाया।
- उत्तराखंड मॉडल के बाद भाजपा शासित राज्यों को अपने-अपने कानून बनाने का रास्ता मिला।
हालांकि केंद्र ने पूरे देश के लिए कानून नहीं बनाया।
केंद्र ने पूरे देश में UCC कानून क्यों नहीं बनाया?
यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है कि अगर केंद्र सरकार वर्षों से UCC की समर्थक रही है, तो उसने संसद में पूरे देश के लिए एक कानून क्यों नहीं बनाया और राज्यों को अलग-अलग कानून बनाने की छूट क्यों दी?
इसका जवाब भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) और संविधान की सातवीं अनुसूची में छिपा है।
भारत में कानून बनाने के अधिकार तीन सूचियों में बांटे गए हैं—
- संघ सूची (Union List)
- राज्य सूची (State List)
- समवर्ती सूची (Concurrent List)
विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण, भरण-पोषण और पारिवारिक कानून जैसे विषय समवर्ती सूची (Concurrent List) में आते हैं। इसका अर्थ है कि इन विषयों पर केंद्र सरकार भी कानून बना सकती है और राज्य सरकारें भी।
यदि किसी विषय पर केंद्र और राज्य दोनों ने कानून बनाया हो और दोनों में टकराव हो, तो सामान्यतः केंद्र का कानून प्रभावी माना जाता है, हालांकि कुछ परिस्थितियों में राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त राज्य कानून अपने राज्य में लागू रह सकता है।
यही कारण है कि संविधान ने UCC लागू करने के लिए केवल संसद पर निर्भर रहने की बाध्यता नहीं रखी। राज्यों को भी अपने सामाजिक, प्रशासनिक और कानूनी ढांचे के अनुसार कानून बनाने की संवैधानिक शक्ति दी गई।
फिर संसद के बजाय राज्यों का रास्ता क्यों चुना गया?
यहीं से राजनीति और रणनीति दोनों शुरू होती हैं।
संविधान संसद को पूरे देश के लिए UCC बनाने से नहीं रोकता, लेकिन ऐसा कानून पूरे देश के अलग-अलग धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समूहों को एक साथ प्रभावित करेगा। इसलिए इसके राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी प्रभाव भी बहुत व्यापक होंगे।
ऐसे में केंद्र सरकार के सामने दो विकल्प थे—
पहला विकल्प
संसद में एक राष्ट्रीय UCC कानून लाकर पूरे देश में एक साथ लागू कर दिया जाए।
इस स्थिति में पूरे देश में एक ही समय पर समान नियम लागू होते, लेकिन इसके खिलाफ व्यापक राजनीतिक विरोध, सामाजिक बहस और संवैधानिक चुनौतियों की संभावना भी अधिक रहती।
दूसरा विकल्प
भाजपा शासित राज्यों को उनके संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए अपना-अपना UCC कानून बनाने दिया जाए।
केंद्र ने फिलहाल इसी मॉडल को अपनाया है। इस रणनीति से हर राज्य अपने सामाजिक ढांचे, प्रशासनिक जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कानून तैयार कर सकता है।
उत्तराखंड क्यों बना पहला प्रयोग?
उत्तराखंड को कई राजनीतिक विश्लेषक "Pilot Model" मानते हैं।
राज्य ने सबसे पहले— अपना UCC कानून बनाया। यहीं से मध्य प्रदेश समेत अन्य राज्यों में भी प्रक्रिया तेज हो गई।
इससे सरकार को यह समझने का अवसर मिला कि—
- प्रशासनिक स्तर पर क्या चुनौतियां आएंगी?
- विवाह पंजीयन कैसे होगा?
- लिव-इन रजिस्ट्रेशन कैसे लागू होगा?
- डिजिटल सिस्टम कैसे तैयार होगा?
- जनता की प्रतिक्रिया कैसी रहेगी?
- न्यायालय में किस प्रकार की कानूनी चुनौतियां सामने आ सकती हैं?
यानी उत्तराखंड केवल पहला राज्य नहीं था, बल्कि एक तरह से UCC का प्रशासनिक परीक्षण (Administrative Test Case) भी बन गया।
फिर मध्य प्रदेश की बारी कैसे आई?
उत्तराखंड मॉडल के बाद मध्य प्रदेश ने उसी दिशा में आगे बढ़ना शुरू किया।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार ने—
- विशेषज्ञ समिति गठित की।
- विभिन्न वर्गों से सुझाव आमंत्रित किए।
- सरकार के अनुसार लगभग 10 लाख सुझाव प्राप्त हुए।
- मसौदा तैयार कराया।
- कैबिनेट से मंजूरी दिलाई।
- विधानसभा से विधेयक पारित कराया।
हालांकि मध्य प्रदेश का कानून उत्तराखंड की हूबहू प्रति नहीं है। राज्य ने अपनी सामाजिक परिस्थितियों और प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार कुछ प्रावधानों में बदलाव किए हैं।
19 जुलाई 2026 | कैबिनेट की मंजूरी
कैबिनेट ने Uniform Civil Code Bill-2026 को मंजूरी दे दी।
मुख्यमंत्री ने कहा— "राम, रहीम, रविंदर और रॉबिन... सभी के लिए समान अधिकार।"
20 जुलाई | विधानसभा में पेश
मानसून सत्र के पहले दिन विधेयक पेश हुआ।
कांग्रेस ने—
- Select Committee में भेजने की मांग की।
- इसे राज्यों के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया।
- अल्पसंख्यकों और आरक्षण को लेकर सवाल उठाए।
21 जुलाई | विधानसभा से पास
भारी हंगामे और विपक्ष के विरोध के बीच UCC Bill ध्वनिमत से पारित हो गया।
सरकार ने इसे—
- महिला सशक्तिकरण
- सामाजिक समानता
- समान नागरिक अधिकार
की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।
क्या आगे दूसरे राज्यों में भी यही मॉडल अपनाया जाएगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में UCC का क्रियान्वयन सफल रहता है, तो अन्य भाजपा शासित राज्य भी इसी दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।
ऐसी स्थिति में देश में धीरे-धीरे कई राज्यों में UCC लागू हो सकता है।
इसके बाद केंद्र सरकार के पास राज्यों के अनुभव, प्रशासनिक आंकड़े और न्यायिक फैसलों के आधार पर भविष्य में राष्ट्रीय स्तर का कानून बनाने के लिए अधिक मजबूत आधार होगा।
हालांकि अभी तक केंद्र सरकार ने पूरे देश के लिए UCC विधेयक लाने की कोई आधिकारिक समयसीमा घोषित नहीं की है। इसलिए यह कहना कि राज्यों का मॉडल निश्चित रूप से राष्ट्रीय UCC का "पहला चरण" है, एक राजनीतिक विश्लेषण हो सकता है, लेकिन इसे स्थापित तथ्य की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
संवैधानिक विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कई संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि अनुच्छेद-44 राज्य को UCC लागू करने का प्रयास करने के लिए कहता है, लेकिन यह नीति निदेशक तत्व (Directive Principle) है, इसलिए इसे अदालत में लागू कराने का अधिकार नागरिकों को नहीं मिलता।
दूसरी ओर, चूंकि विवाह और उत्तराधिकार जैसे विषय समवर्ती सूची में हैं, इसलिए संसद और राज्य—दोनों को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। यही कारण है कि उत्तराखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों द्वारा बनाया गया UCC संवैधानिक रूप से संभव है।
Expose Live Angle
UCC की कहानी केवल एक कानून की कहानी नहीं है।
यह तीन स्तरों पर चल रही प्रक्रिया है—
- संवैधानिक स्तर पर: अनुच्छेद-44 के जरिए 1950 से मौजूद एक अधूरा लक्ष्य।
- न्यायिक स्तर पर: सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में समय-समय पर इसकी जरूरत पर की गई टिप्पणियां।
- राजनीतिक स्तर पर: भाजपा के लंबे समय से घोषित एजेंडे का राज्यों के माध्यम से चरणबद्ध क्रियान्वयन।
यही वजह है कि मध्य प्रदेश का UCC केवल भोपाल की विधानसभा तक सीमित नहीं है। इसके असर पर अब पूरे देश की नजर रहेगी। यदि इसका क्रियान्वयन सफल रहता है, तो यह अन्य राज्यों के लिए एक संदर्भ मॉडल बन सकता है और भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर UCC की बहस को नई दिशा दे सकता है।