3.85 करोड़ फूंके, 10 साल तक शहीद पार्क सड़ाया; अब जनता की जेब से वसूली करवाएगा IDA

इंदौर के शहीद स्मारक पार्क पर IDA ने ₹3.85 करोड़ खर्च किए, फिर सालों ताले में सड़ाया और अब 10 साल के ठेके पर निजी हाथों में देने की तैयारी है। सवाल ये है—एंट्री, पार्किंग, कैफे और बुकिंग की वसूली से आखिर बिल किसकी जेब से निकलेगा? जानिए पूरा मामला।

3.85 करोड़ फूंके, 10 साल तक शहीद पार्क सड़ाया; अब जनता की जेब से वसूली करवाएगा IDA

सालों ताले में बंद रखा स्मारक, अब 10 साल के ठेके पर निजी हाथों में सौंपने की तैयारी, एंट्री-पार्किंग फीस से लेकर कैफे और थिएटर बुकिंग तक ठेकेदार वसूलेगा पैसा

‘जैसा है, जहां है’ लो—मरम्मत पर IDA फूटी कौड़ी नहीं लगाएगा, हर महीने चाहिए सिर्फ 75 हजार, बदहाली का खर्च भी जनता की जेब से निकलेगा

इंदौर।

जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से करोड़ों के प्रोजेक्ट खड़े करना, फिर उन्हें लावारिस छोड़ देना और जब बदहाली का भंडाफोड़ होने लगे तो ठेकेदारों के आगे हाथ खड़े कर देना—इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) की इस नाकारा कार्यशैली का सबसे बड़ा और शर्मनाक सबूत सामने आ गया है। प्राधिकरण ने 47 पन्नों का टेंडर जारी कर देश के अमर शहीदों के सम्मान में बने इस 77,500 वर्ग फीट के परिसर को प्राइवेट ठेके पर देने की पूरी तैयारी कर ली है।

स्कीम नंबर 94 (रिंग रोड) स्थित ‘शहीद स्मारक पार्क’ पर अफसरों ने ₹3.85 करोड़ फूंक दिए, लेकिन सालों तक इसे बंद तालों और वीराने की भेंट चढ़ाए रखा। अब अपनी नाकामी छुपाने के लिए प्राधिकरण इस पूरे स्मारक को 10 साल के लिए निजी हाथों में सौंपने की बिसात बिछा चुका है।

यानी जनता के पैसे से बने इस स्मारक को सालों तक सड़ाने के बाद अब इसकी बदहाली का खर्च भी जनता की जेब से निकालने की तैयारी है। पार्क में आने वाले लोगों से एंट्री और पार्किंग फीस वसूली जाएगी, परिसर में कैफे चलेगा और थिएटर व गैलरी की बुकिंग के लिए भी पैसा देना होगा। ठेकेदार को करोड़ों की सरकारी संपत्ति सौंपकर IDA को हर महीने कम से कम ₹75 हजार (+GST) चाहिए।

तैयारी निजीकरण की: शहीदों के स्मारक से निकलेगा ठेकेदार का मुनाफा

टेंडर के पन्नों में जो खाका खींचा गया है, उसने अफसरों की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्क चलाने के नाम पर निजी ऑपरेटर को खुली छूट देने की तैयारी है:

  • एंट्री और पार्किंग का टिकट: पार्क में आने वाले आम नागरिकों, बच्चों और परिवारों से एजेंसी एंट्री फीस और पार्किंग चार्ज वसूलेगी।
  • 1000 वर्ग फीट में कैफे: परिसर के भीतर 1000 वर्ग फीट कवर्ड एरिया में कैफेटेरिया चलाने की हरी झंडी दी जाएगी।
  • थिएटर और गैलरी की बुकिंग: 500 सीटर ओपन एम्फीथिएटर और एग्जीबिशन गैलरी के उपयोग के लिए भी जेब ढीली करनी होगी।
  • IDA का गणित: ठेकेदार से प्राधिकरण को सिर्फ हर महीने कम से कम 75,000 (+GST) और हर साल 10% की बढ़ोतरी चाहिए। यानी करोड़ों की सरकारी संपत्ति थमाकर अफसर सिर्फ चेक वसूलने की भूमिका में आ रहे हैं।

अफसरों का कबूलनामा: 'As Is Where Is'—मरम्मत पर नहीं देंगे फूटी कौड़ी

टेंडर का क्लॉज नंबर 19 अफसरों के नकारापन का सीधा कबूलनामा है। IDA ने साफ लिख दिया है कि पार्क निजी एजेंसी को 'जैसा है जहां है' (As Is Where Is) स्थिति में सौंपा जाएगा।

  • प्राधिकरण हैंडओवर से पहले या पूरे कॉन्ट्रैक्ट के दौरान किसी भी मरम्मत, जीर्णोद्धार या स्ट्रक्चरल सुधार पर एक रुपया खर्च नहीं करेगा।
  • यानी सालों तक बंद रखकर जो फाउंटेन सुखाए गए, लाइटें टूटीं और स्ट्रक्चर बदहाल हुआ, उसे ठीक करने का सारा बोझ ऑपरेटर पर होगा—और जाहिर है, ऑपरेटर यह सारा पैसा इंदौर की जनता की जेब से टिकट के रूप में निकालेगा!

फाइलों में कैद रही अमर जवान ज्योति और इंडिया गेट

बोर्ड संकल्प क्र. 224 (08.12.2014) के तहत इस पार्क को शहर का गौरव बनाने का दावा किया गया था। 7,200 वर्ग मीटर में दिल्ली के इंडिया गेट की प्रतिकृति, तिरंगा रोशनी, अमर जवान ज्योति, 500 सीटर एम्फीथिएटर और प्रदर्शनी केंद्र बनाया गया। लेकिन निर्माण के बाद अफसरों ने इसे जनता के लिए खोलने की जहमत नहीं उठाई। पूर्व सैनिक और शहरवासी सालों तक इस बंद पड़े पार्क को देखकर खून के घूंट पीते रहे।

'एक्सपोज लाइव' के सीधे सवाल:

  1. करोड़ों फूंककर ताला क्यों लगाया?
  2. जब पार्क बनकर तैयार था, तो इसे सालों तक बंद रखकर सरकारी संपत्ति को बर्बाद क्यों होने दिया गया?
  3. जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई कब?
  4. रखरखाव के अभाव में करोड़ों के स्ट्रक्चर को पहुंचे नुकसान की भरपाई उन लापरवाह इंजीनियरों और तत्कालीन अफसरों से क्यों न वसूली जाए?
  5. क्या स्मारक भी अब धंधे का जरिया?
  6. क्या अमर शहीदों के बलिदान को नमन करने और बच्चों को देशभक्ति सिखाने के लिए भी शहर की जनता को अब प्राइवेट ठेकेदार की जेब भरनी होगी?