इंदौर पुलिस या रील प्रोडक्शन हाउस? कैमरा ऑन... गुंडों हाथ-पैर ब्रोकन, कैमरा ऑफ... फिट एंड फाइन!

इंदौर में आरोपियों के जुलूस के बाद जेल गेट पर पट्टियां खुलने का वायरल वीडियो और पुलिसकर्मियों से मारपीट की घटना ने पुलिस की कार्रवाई, कमिश्नरी व्यवस्था और कानून-व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस संपादकीय में इन्हीं मुद्दों पर तीखा विश्लेषण किया गया है।

इंदौर पुलिस या रील प्रोडक्शन हाउस? कैमरा ऑन... गुंडों हाथ-पैर ब्रोकन, कैमरा ऑफ... फिट एंड फाइन!

आज सुबह अखबार के पहले कुछ पन्नों पर छपी दो खबरों ने सिर्फ घटनाओं की जानकारी नहीं दी, बल्कि इंदौर की कानून-व्यवस्था पर कई असहज सवाल भी खड़े कर दिए।

पहली खबर हीरानगर पुलिस की थी। मेडिकल दुकान के बाहर हुए विवाद में गिरफ्तार आरोपियों का पुलिस ने शहर में हाथ-पैर पर पट्टियां बांधकर जुलूस निकाला। कुछ ही घंटों बाद सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में वही आरोपी जेल गेट के बाहर पट्टियां खोलते नजर आए। 

दूसरी खबर कनाड़िया थाना क्षेत्र की थी, जहां देर रात शराब पीकर कार चला रहे युवकों ने चालान काटने पर पुलिसकर्मियों से ही मारपीट कर दी। तीन पुलिसकर्मी घायल हुए और आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करनी पड़ी।

इन दोनों खबरों को अलग-अलग पढ़ा जा सकता है, लेकिन जब इन्हें साथ रखकर देखा जाता है तो एक बड़ा सवाल सामने आता है—क्या इंदौर में कानून का डर कमजोर पड़ रहा है, या फिर कानून का प्रदर्शन ज्यादा और असर कम रह गया है?

इंदौर में कानून चल रहा है... या कंटेंट क्रिएशन?

पहले अपराधियों के हाथ-पैर में पट्टी बांधो। फिर शहर में जुलूस निकालो। कैमरे बुलाओ। फोटो खिंचवाओ। सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटो।

फिर जेल गेट के बाहर... पट्टी खोल दो।

अगर वायरल वीडियो सही है तो सवाल सिर्फ इतना नहीं कि पट्टी क्यों खुली? सवाल यह है कि पूरे शहर को बेवकूफ क्यों बनाया गया?

क्या ये कानून था... या कैमरे के लिए शूट किया गया एक रील सीन?

और यहीं कहानी खत्म नहीं होती।

उसी दिन दूसरी खबर आती है।

शराब पीकर कार चला रहे लोग पुलिसवालों को ही पीट देते हैं। चालान काटने पर वर्दी पर हाथ उठा देते हैं। नौकरी खा जाने की धमकी देते हैं। पुलिसकर्मी अस्पताल पहुंच जाते हैं।

अब दोनों खबरें साथ रखिए।

एक तरफ पुलिस अपराधियों का "रौब वाला" जुलूस निकाल रही है।

दूसरी तरफ अपराधी पुलिस को ही सड़क पर पीट रहे हैं।

तो आखिर सच कौन सा है?

पुलिस इतनी ताकतवर है कि अपराधियों को शहर में घुमाती है... या इतनी कमजोर कि वही अपराधी उसे पीटकर निकल जाते हैं?

दोनों बातें एक साथ सच नहीं हो सकतीं।

किससे करें सवाल..?

सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से है।

मुख्यमंत्री जी, मध्य प्रदेश में कानून का राज चल रहा है या कैमरे का राज?

और डीजीपी साहब… इंदौर के पुलिस कमिश्नर साहब…

अगर जुलूस निकालना ही कानून का संदेश है तो जनता को ये भी बता दीजिए—

पिछले एक महीने में इंदौर में जिन-जिन अपराधियों के जुलूस निकाले गए, उनकी आज हालत क्या है?

  • क्या पुलिस उन सभी आरोपियों की तस्वीरें सार्वजनिक करेगी?
  • क्या उनका मेडिकल रिकॉर्ड जारी करेगी?
  • क्या बताएगी कि जिनके हाथ-पैर बांधकर शहर में घुमाया गया था, वे जेल तक उसी हालत में पहुंचे थे या रास्ते में सब सामान्य हो गया?
  • या फिर जनता सिर्फ वही देखे जो कैमरा दिखाए?

क्या ये पहला मामला है..?

असल सवाल यह है कि...

क्या यह पहली बार पकड़ा गया मामला है... या पहली बार कैमरे ने पर्दा हटा दिया है?

क्योंकि अगर जेल के बाहर पट्टियां खुल सकती हैं, तो जनता को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि कहीं पिछले तमाम जुलूस भी सिर्फ "पब्लिक परफॉर्मेंस" तो नहीं थे?

  • अगर ऐसा नहीं है तो पुलिस रिकॉर्ड सामने रखे।
  • अगर ऐसा है तो फिर पूरा सिस्टम जनता से माफी मांगे।

आज इंदौर में लगभग हर दूसरे-तीसरे दिन किसी न किसी आरोपी का जुलूस निकलता है।

लेकिन क्या उससे अपराध कम हुए?

अगर जुलूस ही इलाज है तो अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं?

  • क्यों पुलिस पर हमला करने की हिम्मत बढ़ रही है?
  • क्यों शराबी कार सवार वर्दी को पीटने की हिम्मत जुटा लेते हैं?
  • क्यों लगता है कि अपराधियों को पता है— थोड़ा कैमरा झेल लो... बाकी सब मैनेज हो जाएगा। 

कमिश्नरी सिस्टम लागू हुआ था ताकि पुलिस का डर बढ़े। लेकिन जमीन पर तस्वीर उल्टी दिख रही है।

पुलिस जुलूस निकाल रही है… अपराधी पुलिस को पीट रहे हैं...

और जनता पूछ रही है— डर आखिर किसे किससे लगना चाहिए?

रहम करो सरकार… इस शहर पर…

इंदौर पुलिस को फैसला करना होगा।

वो कानून लागू करेगी... या कानून की रील बनाएगी?

क्योंकि जनता अब फोटो नहीं देख रही… वीडियो भी देख रही है।

और वीडियो एक ऐसी चीज है जो प्रेस नोट से नहीं डरता।

अगर पुलिस की कार्रवाई सिर्फ कैमरे तक सीमित है, तो यह कानून का प्रदर्शन है, कानून का शासन नहीं।

और अगर वायरल वीडियो झूठा है, तो पुलिस पूरी टाइमलाइन, सीसीटीवी, मेडिकल रिकॉर्ड और प्रक्रिया सार्वजनिक करे।

क्योंकि अब सवाल सिर्फ एक पट्टी का नहीं है। सवाल पूरी पुलिसिंग की विश्वसनीयता का है।

आज इंदौर पूछ रहा है— कानून सच में जिंदा है... या सिर्फ कैमरा ऑन होने तक?