अब कोर्ट में AI की एंट्री! क्या जज की जगह ले लेगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस? सरकार ने खुद बताया पूरा प्लान

भारत की अदालतों में AI की एंट्री हो चुकी है। ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के तीसरे चरण में सरकार ने 53.57 करोड़ रुपये की लागत से AI आधारित टूल विकसित किए हैं, जो जजों को कानूनी रिसर्च, दस्तावेज़ विश्लेषण, वॉयस-टू-टेक्स्ट और आदेश लिखने में मदद करेंगे। जानिए क्या AI जज की जगह लेगा या सिर्फ न्याय प्रक्रिया को तेज़ बनाएगा।

अब कोर्ट में AI की एंट्री! क्या जज की जगह ले लेगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस? सरकार ने खुद बताया पूरा प्लान
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53.57 करोड़ का AI मिशन... अदालतों में शुरू होने जा रही है ऐसी डिजिटल क्रांति, जिसे जानकर आप कहेंगे—'ओ तेरी... अब ये भी!'

नई दिल्ली | एक्सपोज़ ब्यूरो

ज़रा सोचिए...

आप कोर्ट में खड़े हैं। सामने जज हैं... लेकिन उनके साथ एक और "दिमाग" भी काम कर रहा है। ऐसा दिमाग जो लाखों पन्नों की फाइलें मिनटों में पढ़ सकता है, पुराने फैसले ढूंढ सकता है और सेकंडों में बता सकता है कि किस कानून में क्या लिखा है।

नहीं... ये कोई साइंस फिक्शन फिल्म नहीं है।

भारत की अदालतों में अब AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की एंट्री हो चुकी है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की ई-समिति के साथ मिलकर ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के तीसरे चरण में AI को शामिल करने का फैसला लिया है। इसके लिए 53.57 करोड़ रुपये भी तय कर दिए गए हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल...

क्या अब AI ही सुनाएगा फैसला?

सीधा जवाब—नहीं।

अगर आपको लग रहा है कि अब रोबोट जज की कुर्सी पर बैठ जाएगा, तो ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला।

फैसला आज भी जज देंगे... और आगे भी जज ही देंगे।

AI सिर्फ उनका सुपर असिस्टेंट बनेगा।

मतलब, अदालत में कौन सही है और कौन गलत, किसे सजा मिलेगी या किसे राहत—ये फैसला इंसान ही करेगा। AI केवल जज का समय बचाने, जानकारी जल्दी जुटाने और तकनीकी काम आसान करने के लिए इस्तेमाल होगा। यानी फैसला अदालत का होगा, AI सिर्फ उसकी रफ्तार बढ़ाने में मदद करेगा।

AI करेगा क्या-क्या?

सरकार ने फिलहाल दो खास AI टूल तैयार किए हैं। इनका मकसद जजों और न्यायिक अधिकारियों का काम आसान बनाना है, ताकि वे फाइलों में उलझने के बजाय कानूनी पहलुओं पर ज्यादा समय दे सकें।

1. लीगल रिसर्च एनालिसिस असिस्टेंट

नाम थोड़ा भारी है... लेकिन काम बेहद आसान।

मान लीजिए किसी केस से जुड़े हजारों पुराने फैसले और कानून खोजने हैं। पहले इसमें घंटों या कई बार दिन लग जाते थे।

अब यही काम AI कुछ ही मिनटों में करके जज के सामने रख सकेगा।

यह टूल अलग-अलग अदालतों के पुराने फैसलों, कानूनों और कानूनी दस्तावेज़ों का तेजी से विश्लेषण करेगा। इससे जजों को किसी मामले से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय, कानूनी धाराएं और जरूरी संदर्भ ढूंढने में काफी कम समय लगेगा। आसान शब्दों में कहें तो यह जज के लिए एक बेहद तेज़ रिसर्च असिस्टेंट की तरह काम करेगा।

2. डिजिटल कोर्ट्स 2.1

ये सिर्फ एक सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि कोर्ट का स्मार्ट कंट्रोल रूम है।

इसमें...

  • जज जो बोलेंगे, वो अपने आप टेक्स्ट बन जाएगा।
  • दस्तावेज़ों का अनुवाद आसान होगा।
  • केस की पूरी जानकारी एक ही स्क्रीन पर मिलेगी।
  • आदेश और फैसले तैयार करने में तकनीकी मदद मिलेगी।

यानी कोर्ट भी अब धीरे-धीरे स्मार्ट कोर्ट बनने की दिशा में बढ़ रहा है।

सोचिए, अगर सुनवाई के दौरान जज कोई आदेश बोल रहे हैं, तो उसे अलग से टाइप करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। AI उसे तुरंत लिख देगा। अगर किसी दस्तावेज़ का दूसरी भाषा में अनुवाद चाहिए, तो उसमें भी तकनीकी सहायता मिलेगी। एक ही प्लेटफॉर्म पर केस से जुड़ी सभी जरूरी जानकारी उपलब्ध होने से अदालत का काम पहले से ज्यादा व्यवस्थित और तेज़ हो सकेगा।

अभी पूरे देश में लागू नहीं हुआ

अगर आपको लग रहा है कि सोमवार से देश की हर अदालत AI से चलने लगेगी, तो ऐसा नहीं है।

फिलहाल दोनों AI सिस्टम टेस्टिंग फेज़ में हैं।

यानी अभी इनका ट्रायल चल रहा है। अलग-अलग स्तर पर यह देखा जा रहा है कि ये टूल कितने सटीक, सुरक्षित और उपयोगी साबित होते हैं। अगर परीक्षण सफल रहता है, तभी भविष्य में इन्हें देशभर की अदालतों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।

फिर भी एक सवाल रहेगा...

अगर AI रिसर्च करेगा...

ड्राफ्ट तैयार करेगा...

दस्तावेज़ पढ़ेगा...

तो क्या भविष्य में अदालतों का काम पूरी तरह बदल जाएगा?

तकनीक जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह सवाल बिल्कुल स्वाभाविक है। आज AI सिर्फ मदद कर रहा है, लेकिन आने वाले वर्षों में न्याय व्यवस्था के कई तकनीकी काम इसी तरह डिजिटल हो सकते हैं। हालांकि कानून की व्याख्या, सबूतों का मूल्यांकन और अंतिम फैसला अभी भी इंसान के हाथ में ही रहेगा।

सरकार क्या कहती है?

सरकार ने साफ किया है कि AI सिर्फ एक तकनीकी सहायक होगा।

किसी भी मामले में अंतिम फैसला इंसान यानी न्यायाधीश ही देंगे। AI को लेकर नियम भी सुप्रीम कोर्ट और संबंधित हाई कोर्ट तय करेंगे।

यानी AI कब, कैसे और कितनी सीमा तक इस्तेमाल होगा, इसका फैसला भी न्यायपालिका ही करेगी। इसका उद्देश्य अदालतों में इंसानी फैसलों की जगह मशीनों को बैठाना नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया को ज्यादा तेज़, आधुनिक और प्रभावी बनाना है।

Expose Take 

जिस तरह AI ने मोबाइल, ऑफिस, मीडिया और पढ़ाई की दुनिया बदल दी... अब उसकी दस्तक अदालतों तक पहुंच गई है।

सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि AI कोर्ट में आया है।

असल सवाल ये है कि क्या आने वाले 10 साल में भारत की न्याय व्यवस्था पूरी तरह डिजिटल हो जाएगी?